Trending

    Move to Jagran APP
    pixelcheck
    विज्ञापन हटाएं सिर्फ खबर पढ़ें

    104 साल पहले 'मौत की सजा' थी डायबिटीज; फिर हुआ वो चमत्कार, जिसने करोड़ों को दी नई जिंदगी

    Updated: Sat, 10 Jan 2026 05:00 PM (IST)

    डायबिटीज को काबू करने के लिए आज इंसुलिन इंजेक्शन का इस्तेमाल किया जाता है, जिससे करोड़ों लोगों का जीवन आसान बन रहा है। लेकिन हमेशा से ऐसा नहीं था। आज ...और पढ़ें

    News Article Hero Image

    क्या आप जानते हैं इंसुलिन बनाने की कहानी? (Picture Courtesy: Freepik)

    लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। आज से करीब 104 साल पहले तक, डायबिटीज, खासकर टाइप-1 को एक जानलेवा बीमारी माना जाता था। उस दौर में अगर किसी बच्चे को यह बीमारी हो जाती, तो उसे 'मौत की सजा' की तरह देखा जाता था। बीमार बच्चे कुछ ही महीनों में बेहद कमजोर होकर दम तोड़ देते थे। लेकिन 1922 में चिकित्सा जगत में एक ऐसा चमत्कार हुआ, जिसने करोड़ों लोगों को नई जिंदगी दी।

    दरअसल, यह कहानी है इंसुलिन इंजेक्शन बनाने की, जो आज डायबिटीज से पीड़ित करोड़ों लोगों के लिए वरदान साबित हो रहा है। आइए जानें कैसे बना था दुनिया का पहला इंसुलिन इंजेक्शन।

    कुत्तों और गायों से शुरू हुआ यह सफर

    इंसुलिन की खोज की कहानी कनाडा के टोरंटो से शुरू होती है। साल 1921 में वैज्ञानिक फ्रेडरिक बैटिंग और चार्ल्स बेस्ट ने कुत्तों पर कई प्रयोग किए। उन्होंने यह साबित कर दिखाया कि गाय के पैंक्रियाज से निकाला गया एक खास हार्मोन ब्लड शुगर को कंट्रोल कर सकता है। इसी हार्मोन को आज हम 'इंसुलिन' के नाम से जानते हैं।

    Insulin Injection (1)

    (Picture Courtesy: Freepik)

    लियोनार्ड थॉम्पसन- वह पहला बच्चा जिसे मिला जीवनदान

    11 जनवरी 1922 को टोरंटो जनरल हॉस्पिटल में 14 साल के लियोनार्ड थॉम्पसन को इंसुलिन का पहला इंजेक्शन लगाया गया। लियोनार्ड टाइप-1 डायबिटीज से जूझ रहे थे। हालांकि, पहली कोशिश में इंसुलिन पूरी तरह शुद्ध नहीं था, जिसके कारण लियोनार्ड को एलर्जी हो गई।

    इस समस्या को सुलझाने के लिए टीम के एक और साथी जेम्स कोलिप ने इंसुलिन को शुद्ध करने की विधि विकसित की। 23 जनवरी 1922 को लियोनार्ड को दूसरा इंजेक्शन दिया गया और इस बार यह प्रयोग पूरी तरह सफल रहा। लियोनार्ड की हालत में तेजी से सुधार हुआ, उनका शुगर लेवल सामान्य हो गया और वे कई वर्षों तक जीवित रहे।

    जानवरों से लेकर बैक्टीरिया तक का आधुनिक सफर

    शुरुआती दिनों में इंसुलिन जानवरों के पैंक्रियाज से निकाला जाता था। लेकिन इसकी दो बड़ी समस्याएं थीं- पहली यह कि इसकी आपूर्ति बहुत कम थी और दूसरी यह कि जानवरों से निकले इंसुलिन से मरीजों को अक्सर एलर्जी हो जाती थी।

    इस समस्या का समाधान 1978 में निकला। अमेरिका की कंपनी जेनेंटेक के वैज्ञानिकों ने एक क्रांतिकारी तकनीक विकसित की। उन्होंने मानव इंसुलिन बनाने वाले जीन को ई. कोलाई नाम के बैक्टीरिया में डाल दिया। नतीजा यह हुआ कि बैक्टीरिया ने खुद मानव इंसुलिन बनाना शुरू कर दिया। बाद में यीस्ट से भी इंसुलिन बनाने की तकनीक आई, जिसका इस्तेमाल आज पूरी दुनिया में बड़े पैमाने पर हो रहा है।