1690 में हुआ था इस वाद्य यंत्र का आविष्कार, भारत में शादियों से है खास कनेक्शन
आपने वाद्य यंत्र क्लैरिनेट का नाम तो सुना ही होगा, लेकिन क्या आप जानते हैं इसका आविष्कार कैसे हुआ था? दरअसल, इसे 14 जनवरी 1690 में बनाया गया था और इसम ...और पढ़ें
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भारत कैसे पहुंचा क्लैरिनेट? (Picture Courtesy: Freepik)
लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। संगीत की दुनिया में कुछ वाद्ययंत्र अपनी खास आवाज के लिए पहचाने जाते हैं, और क्लैरिनेट उन्हीं में से एक है। देखने और सुनने में यह भारतीय वाद्ययंत्र शहनाई से काफी मेल खाता है, लेकिन इसका इतिहास और विकास की कहानी बेहद दिलचस्प है।
आइए जानें कैसे हुआ क्लैरिनेट का आविष्कार, यह भारत कैसे पहुंचा और दुनिया भर में कैसे यह संगीत की दुनिया में अपनी पहचान बना चुका है।
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(Picture Courtesy: Freepik)
1690 में हुआ था आविष्कार
क्लैरिनेट का जन्म आज से लगभग 336 साल पहले 14 जनवरी 1690 को हुआ था। इसका आविष्कार जर्मनी के न्यूरेंबर्ग शहर में एक कुशल कारीगर जोहान क्रिस्टोफ डेन्नर ने किया था। डेन्नर ने एक पुराने लोक वाद्य यंत्र 'चालूमियो' (Chalumeau) में कई तकनीकी बदलाव किए, जिसके बाद क्लैरिनेट का जन्म हुआ। इस नए यंत्र की सबसे बड़ी खासियत यह थी कि यह पुराने वाद्यों की तुलना में ज्यादा साफ और ऊंचे सुर निकालने में सक्षम था।
300 से ज्यादा किए गए सुधार
शुरुआत में क्लैरिनेट आज जैसा नहीं दिखता था। जब डेन्नर ने इसे बनाया, तब इसमें केवल दो की थीं। लेकिन संगीतकारों की जरूरतों को देखते हुए समय के साथ इसमें कई प्रयोग किए गए। आपको जानकर हैरानी होगी कि क्लैरिनेट के मौजूदा स्वरूप तक पहुंचने के लिए इसमें 300 से ज्यादा सुधार और बदलाव किए गए। इन सुधारों ने इसे तकनीकी रूप से मजबूत बनाया, जिससे यह शास्त्रीय संगीत से लेकर आधुनिक 'जैज' म्यूजिक तक का अहम हिस्सा बन गया।
भारत कैसे पहुंचा क्लैरिनेट
भारत में क्लैरिनेट का प्रवेश 19वीं सदी के बाद ब्रिटिश शासन के दौरान हुआ। यह मुख्य रूप से ब्रिटिश सेना के बैंड और चर्च के संगीत के साथ भारत पहुंचा। जब भारतीयों ने पहली बार इसकी आवाज सुनी, तो उन्हें यह पराया नहीं लगा। इसकी भावनात्मक आवाज और सुर हमारी अपनी शहनाई से बहुत मिलते-जुलते थे। यही वजह थी कि यह वाद्य भारतीय कानों को जल्द ही भा गया।

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आज की लोकप्रियता
अपनी तकनीकी मजबूती और सुरीली आवाज के कारण आज क्लैरिनेट न केवल अंतरराष्ट्रीय मंचों पर लोकप्रिय है, बल्कि भारत के स्कूलों, कॉलेजों और ऑर्केस्ट्रा बैंडों का भी एक अहम हिस्सा बन चुका है। जो सफर जर्मनी की एक छोटी-सी लैब से शुरू हुआ था, वह आज दुनियाभर में संगीत की एक सुरीली पहचान बन चुका है।

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