सुप्रीम कोर्ट की ओर से दिल्ली-एनसीआर में हरित पटाखों की बिक्री और उन्हें चलाने की सीमित छूट देने के 24 घंटे बाद यह सामने आया कि राजधानी में पारंपरिक पटाखों की भी खुलेआम बिक्री हो रही है। इस पर सुप्रीम कोर्ट ने नाराजगी जताते हुए सरकार को उसके निर्देश का पालन करने को कहा। देखना है कि ऐसा हो पाता है या नहीं, क्योंकि बीते वर्षों में सुप्रीम कोर्ट के ऐसे निर्देशों के बाद भी पटाखा बेचने वाले उनकी येन-केन-प्रकारेण बिक्री कर ही लेते हैं।

वे हरित पटाखों के नाम पर पारंपरिक यानी कहीं अधिक प्रदूषण फैलाने वाले पटाखों की भी बिक्री करते हैं। इसका कारण यह है कि इसके ठोस उपाय नहीं किए जा रहे हैं कि सभी पटाखे हरित ही हों। आम तौर पर लोग दीवाली पर तय समयसीमा की अनदेखी कर देर रात तक पटाखे छोड़ते रहते हैं। यद्यपि हर कोई इससे परिचित है कि पटाखे प्रदूषण बढ़ाते हैं और पिछले कुछ वर्षों में तो दीवाली के बाद दिल्ली-एनसीआर समेत उत्तर भारत के अन्य इलाकों में हवा इतनी विषाक्त हो जाती है कि सांस लेना तक मुश्किल हो जाता है।

बहुत कम लोग हैं, जो पटाखों के इस्तेमाल में संयम दिखाते हैं और केवल हरित पटाखे ही चलाते हैं। यह सही है दीवाली पर पटाखों का इस्तेमाल न जाने कब से होता आ रहा है और वे इस पर्व का एक हिस्सा बन गए हैं, लेकिन उनका उपयोग सीमित करके भी तो उल्लासित हुआ जा सकता है। इसके लिए लोग अपनी गली, मोहल्ले में सामूहिक रूप से किसी खुले स्थान पर पटाखे चला सकते हैं और यह भी सुनिश्चित कर सकते हैं कि हरित पटाखे ही चलाए जाएं। इसमें ही सबका हित है।

बीते दो-तीन दशक में हालात बदल चुके हैं। दिल्ली-एनसीआर समेत उत्तर भारत के एक बड़े क्षेत्र में सर्दियों के आगमन के साथ ही सिर उठाने वाला वायु प्रदूषण दीवाली बाद यकायक बहुत बढ़ जाता है। ऐसे में सभी को अपने हिस्से की जिम्मेदारी निभानी चाहिए। समस्या यह है कि औसत लोग जैसे इसकी परवाह नहीं करते कि पुराने वाहन चलाने, पराली अथवा कूड़ा-करकट जलाने, धूल उड़ाने वाला निर्माण कार्य कराने से प्रदूषण बढ़ता है, वैसे ही मनचाहे तरीके से पटाखे चलाने से सांसों के लिए संकट पैदा होता है।

इससे भी बड़ी समस्या यह है कि सरकार का प्रदूषण रोधी तंत्र भी अपने हिस्से की जिम्मेदारी सही तरह निभाने के बजाय खानापूरी ही अधिक करता है। वह तब चेतता है, जब प्रदूषण गंभीर रूप ले लेता है। यह समझा जाए कि सेहत के लिए घातक संकट पैदा करने वाले प्रदूषण से तभी निपटा जा सकता है, जब सरकारी तंत्र के साथ आम जनता भी उसकी रोकथाम के उपायों पर सही से अमल करने को लेकर सजग रहे। यह सजगता दिल्ली-एनसीआर समेत उत्तर भारत के शासन-प्रशासन और लोगों को भी दिखानी होगी।