Rahu Ketu Review: कमजोर कहानी में हिट हैं 'राहु-केतू', क्या 'फुकरे' की तरह हंसा पाई ये फिल्म?
Rahu-Ketu Movie Review: 'फुकरे' जैसी सफल फ्रेंचाइजी के बाद एक बार फिर से पुलकित सम्राट और पुलकित सम्राट की जोड़ी एक बार फिर से कॉमेडी फैंटेसी ड्रामा फि ...और पढ़ें
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राहु-केतू मूवी रिव्यू/ फोटो- Youtube
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प्रियंका सिंह, मुंबई। फुकरे फिल्म की लेखक और कलाकारों की तिकड़ी फैंटेसी कॉमेडी फिल्म 'राहु केतु' में लौटी है। हालांकि फुकरे वाली बात इस फिल्म में नहीं।
क्या है राहु-केतू की कहानी?
कहानी शुरू होती है हिमाचल के कसौल में रहने वाले लेखक चूरु लाल शर्मा (मनु ऋषि चड्ढा) से, जिनके पास फूफा (पीयूष मिश्रा) की दी हुई, अनोखी कहानियों की एक जादुई किताब होती है। उसमें जो लिखा जाता है, वह सच हो जाता है। हिमाचल से भ्रष्टाचार खत्म करने के लिए चूरू दो पात्र राहु (वरुण शर्मा) और केतु (पुलकित सम्राट) को लिखता है, ताकि वह भ्रष्टाचारियों को ढूंढकर उनका खात्मा कर सकें। मनाली में राहु केतु आ तो जाते हैं, लेकिन वह लोगों की जिंदगी में मनहूसियत लाते हैं, जिसकी वजह से उन्हें कोई पसंद नहीं करता। फिर वह जादुई किताब मीनू टैक्सी (शालिनी पांडे) के हाथों में लगती है, जो खुद ड्रग माफिया के मुखिया मोर्देचाई (चंकी पांडे) से उधार लेकर बैठी है।
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हिंदी सिनेमा में फैंटेसी को कॉमेडी के साथ मिलाकर कहानियां कम ही बनती हैं, ऐसे में विपुल विग की सराहना बनती है, जिन्होंने इस कहानी को लिखने का प्रयास किया। खासकर बच्चों के लिए उन्होंने राहु केतु जैसा दिलचस्प पात्र लिखा है, जो अच्छाई का बीज बोने से ही सुकून की फसल उगती है... जैसे संवादों के जरिए अच्छाई के रास्ते पर चलने की सीख देगा। लेकिन कागज पर अच्छी लिखी गई इस कहानी को उसी प्रभाव के साथ पर्दे पर दिखाने में विपुल चूक गए हैं। वह इसे और बेहतर लिखा सकते थे, क्योंकि फुकरे जैसी फिल्म लिखने के बाद उनसे उम्मीद बड़ी होती हैं।
कई सीन एकदम सपाट चले जाते हैं, जबकि उसमें हास्य पैदा करने की काफी गुंजाइश थी। मध्यांतर के बाद कुछ सीन हालांकि अच्छे बने हैं। फैंटेसी फिल्मों में बैकग्राउंड स्कोर और विजुअल इफेक्ट सबसे अहम होते हैं, इस मामले में भी फिल्म कमजोर है। हालांकि, सिनेमैटोग्राफर मनोज सोनी ने अपने कैमरे से कई विजुअल्स को संभाल लिया है। फिल्म का क्लाइमेक्स अच्छा है, जिसमें राहु केतु मोर्देचाई को उसके पापों की सजा देते हैं। फिल्म का टाइटल गाना राहु केतु... कई अहम सीन को सपोर्ट करते हैं। अंत में सीक्वल का संकेत है।
पुलकित-वरुण की जोड़ी ने छोड़ी छाप
बात करें अगर अभिनय की तो फुकरे फिल्म की जोड़ी पुलकित और वरुण इस फिल्म में भी साथ सहज नजर आते हैं। दोनों की केमेस्ट्री और दोस्ती फिल्म को संभाले रखती है। शालिनी पांडे सुंदर भले लगी हैं, लेकिन उनका पात्र ही इतना भटका हुआ सा लिखा गया, जिसमें उन्हें परफॉर्म करने का मौका ही नहीं मिलता है। कहानियां सुनाने और कठपुतली का रोल दिखाने वाले फूफा के रोल में पीयूष मिश्रा अपने आसपास रहस्य बनाए रखते हैं।
साहो फिल्म में चंकी पांडे ने निगेटिव रोल से चौंकाया था, हालांकि इसमें वह न डरा पाते हैं, न ही कॉमेडी कर पाते हैं। पुलिस अफसर दीपक शर्मा के रोल में अमित सियाल ने कॉमेडी में हाथ आजमाया है, लेकिन छाप नहीं छोड़ पाते हैं। वहीं पुलिस में काम करने वाले और मीनू के दोस्त बंसी के रोल में सुमित गुलाटी का और लेखक के रोल में मनु ऋषि चड्ढा का काम ठीक है।

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