हिमालयी क्षेत्र में कम बर्फबारी-बारिश के पीछे क्या है कारण? IIT मंडी के विशेषज्ञों ने बताई वजह, साथ ही दे दी चेतावनी
हिमालय और हिमाचल में कम बारिश-बर्फबारी पर आईआईटी मंडी के विशेषज्ञों ने कारण बताए हैं। डॉ. डेरिक्स पी. शुक्ला के अनुसार, वैश्विक मौसम चक्र और परिसंचरण ...और पढ़ें

हिमाचल प्रदेश के पहाड़ों में नाममात्र बर्फ है। जागरण आर्काइव
जागरण संवाददाता, मंडी। हिमालय सहित हिमाचल प्रदेश में सर्दी के मौसम में बारिश और बर्फबारी न के बराबर हुई है। आखिर मौसम चक्र में कैसे गड़बड़ी हुई है। भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) मंडी के विशेषज्ञों ने इसके पीछे की वजह बताई है। आईआईटी के स्कूल आफ सिविल एंड एनवायरनमेंटल इंजीनियरिंग के एसोसिएट प्रोफेसर डा. डेरिक्स पी शुक्ला ने बताया कि वैश्विक स्तर पर बदलते मौसम चक्र और परिसंचरण चक्र में आई गड़बड़ी प्रमुख कारण है।
अटलांटिक क्षेत्र से हवा का समुचित प्रसार न होने से उत्तर-पश्चिम हिमालयी क्षेत्रों में नमी की आपूर्ति प्रभावित हुई है। इससे लंबे समय से अपेक्षित हिमपात और वर्षा नहीं हो पा रहे हैं। हालांकि, मौसम के संकेतों के अनुसार सप्ताह के अंत तक कुछ क्षेत्रों में वर्षा और ऊंचाई वाले इलाकों में हिमपात की संभावना है।
कैसे सक्रिय होता है पश्चिमी विक्षोभ
डा. शुक्ला के अनुसार अटलांटिक क्षेत्र से आने वाला पश्चिमी विक्षोभ नमी लेकर हिमालय तक पहुंचता है। इस बार अटलांटिक द्वीपों से हवा का सही दिशा और तीव्रता में प्रसार नहीं हो पाया, जिससे नमी का स्तर कम रहा। परिणामस्वरूप पहाड़ी राज्यों में न तो पर्याप्त वर्षा हुई और न ही सामान्य हिमपात।
परिसंचरण चक्र कमजोर हुआ
वायुमंडलीय दबाव प्रणालियों के असंतुलन से परिसंचरण चक्र कमजोर हुआ है, जिसका सीधा असर मौसम पर पड़ा है। ग्लोबल वार्मिंग ही बर्फ के अकाल का सबसे अहम कारण सामने आ रहा है। बढ़ते वैश्विक तापमान से समुद्री सतह का ताप बढ़ा है, जिससे हवा के प्रवाह और नमी वहन करने की क्षमता प्रभावित होती है। इसके साथ ही जेट स्ट्रीम की स्थिति और गति में बदलाव भी देखने को मिल रहा है जो पश्चिमी विक्षोभ की आवृत्ति और प्रभाव को कम कर रहा है।
हिमपात में कमी का पड़ेगा दीर्घकालिक असर
डा. शुक्ला ने चेताया कि हिमपात में कमी का असर जल संसाधनों पर दीर्घकालिक रूप से पड़ेगा। हिमालयी हिमनदों से मिलने वाला पिघला पानी नदियों के प्रवाह, कृषि और पेयजल आपूर्ति के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। यदि यह प्रवृत्ति जारी रहती है तो गर्मियों में जल संकट और बढ़ सकता है। इस बार तेज गर्मी पड़ सकती है। हालांकि राहत की बात यह है कि आगामी दिनों में कुछ सुधार के संकेत मिल रहे हैं।

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