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    पांच परिवार जोगी गेट से खाली हाथ लौटे, नहीं मिली अस्थियां, मन में रह गई टीस,

    Updated: Fri, 29 Aug 2025 05:33 PM (IST)

    जम्मू के जोगी गेट श्मशान घाट में पांच चिताएं बुझने के बाद परिवारों को बुधवार को अस्थियां उठाने के लिए कहा गया। लेकिन तवी नदी में बाढ़ आने से श्मशान घाट दलदल में बदल गया। अस्थियां उठाने पहुंचे परिजन निराश हो गए क्योंकि वे श्मशान घाट तक नहीं पहुंच सके। अब परिवार चांदी के फूल बनवाकर हरिद्वार जाएंगे।

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    परिजनों का मानना है कि कुदरत के आगे किसी की नहीं चलती, शायद यही उनके प्रियजनों की अंतिम इच्छा थी।

    अशोक शर्मा, जम्मू। सोमवार की शाम थी बादल छाए हुए थे। हल्की बूंदाबांदी हो रही थी। एक दिन पहले जम्मू में रिकार्ड 190.4 मीमी वर्षा हो चुकी थी। तवी का जल स्तर बढ़ा हुआ था। लेकिन उस दिन एक ऐसी घटना हुई जिसने साबित किया कि मृत्यु के बाद भी इंसान अंतिम कर्मों को पूरी करने की कोशिश करता है। लेकिन कभी-कभी, उस आखिरी विदाई पर भी मुहर कुदरत ही लगाती है।

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    पुराने जम्मू शहर के श्मशान घाट जोगी गेट में पांच चिताएं एक-एक कर बुझ रही थीं। धुएं की लकीरों में बिछड़ते चेहरों की परछाइयां थीं और हर परिवार की आंखों में आंसुओं के साथ एक विश्वास था कि यह यात्रा हरिद्वार जाकर पूरी होगी। संस्कार खत्म होते ही जोगी गेट वाले बाबा जी ने हमेशा की तरह परिजनों को समझाया मंगलवार का दिन अस्थियां उठाने के लिए ठीक नहीं होता।

    बुधवार को आना, वह परिवार के दूसरे सदस्यों को समझा रहे थे कि अस्थियां उठाने की क्या विधि हाेती है। एक बार फिर दोहराते हुए बुधवार समय पर आ जाना। परिवारों ने सिर झुकाकर हामी भरी। यह परंपरा थी, और परंपरा पर सवाल कौन करता है। घर लौटते समय जतिन गुप्ता अपनी 99 वर्षीय दादी वीरां वाली की तस्वीर को ताकते रहे। उन्होंने मन ही मन तय कर लिया था बुधवार को दादी की अस्थियां लेकर हरिद्वार जाएंगे, जैसे परिजन उनके दादा और दूसरे बुजुर्गोंं के समय गए थे।

    राख, लकड़ी और फूल मिट्टी सब गाद में बदल गए

    इधर, निखिल पुरी और उनके परिवार ने शाम को ही चर्चा शुरू कर दी थी। हरिद्वार कब जाना है। अस्थियां उठाने के समय कौन से विधि विधान होंगे। लेकिन रात और सुबह के बीच कहीं, तवी ने अपना रंग बदल लिया। मंगलवार का सूरज निकला तो सूर्य पुत्री तवी उफान पर थी। पानी श्मशान घाट तक चढ़ आया। राख, लकड़ी और फूल मिट्टी सब गाद में बदल गए। मानो कुदरत ने खुद अंतिम फैसला सुनाया हो।

    श्मशान घाट दलदल बन चुका था

    सेवा समिति के सदस्यों, कर्मचारियों ने जैसे-तैसे फोन किए। हालांकि उनके कार्यालय तक पहुंचना भी मुश्किल था लेकिन उन्होंने अपनी जिम्मेवारी निभाई और सभी के घरों में फोन किए अगर अस्थियां उठानी हैं तो जल्दी आइए, पानी बढ़ रहा है। परिवार दौड़े-दौड़े घाट पहुंचे। लेकिन जो देखा, उससे दिल बैठ गया। श्मशान घाट अब घाट नहीं रहा था। दलदल बन चुका था। जहां कल पांच चिताएं जल रही थीं, वहां आज सिर्फ गाद और बहते पानी की आवाज थी।

    कुदरत के आगे किस की चलती है

    श्मशान घाट तक पहुंच पाना असंभव था। जतिन गुप्ता की आंखों में दादी का चेहरा तैर रहा था। ऐसे ही सभी लोग जो अस्थियां उठाने का प्रयास करने आए थे। वहां तक भी नहीं पहुंच पाए यह अतिम संस्कार हुआ था। सभी के मन में एक निराशा है कि वह अपने प्रियजनों की अस्तियां भी नहीं उठा पाए। सांस भरते हुए कहते हैं। कुदरत के आगे किस की चलती है। उसे जो मंजूर हो वही होता है। अब चांदी के फूल बनवाकर ही हरिद्वार जाएंगे।

    मन में कसक है कि परंपरा अधूरी रह गई

    निखिल पुरी और उनकी मां प्रवीण पुरी वहीं खड़े रह गए। मन में कसक है कि परंपरा अधूरी रह गई। प्रीतम चंद के पुत्र राजीव कुमार कहते हैं कि प्रकृति के आगे किसकी चलती है? शायद यही पिता जी की अंतिम इच्छा रही हो। प्रवीन पुरी कहती हैं हम चाह कर भी कुछ नहीं कर पाए और आंखें पोंछ लेती हैं। अब इन परिवारों ने तय किया है कि जब मौसम थमेगा, वे चांदी के फूल हरिद्वार लेकर जाएंगे। शायद वही फूल उनके प्रियजनों की आत्मा तक संदेश पहुंचा दें कि उन्होंने हर कोशिश की थी, पर प्रकृति की राह में सब असहाय थे।