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    बाढ़ का खतरा इस बार टला, अगली बार लील लेगा हमें, डरे-सहमे बोले- कश्मीर घाटी में दरिया झेलम किनारे बसे लोग

    Updated: Fri, 29 Aug 2025 07:10 PM (IST)

    वर्ष 2014 की बाढ़ के बाद झेलम नदी की सफाई के लिए आवंटित 399 करोड़ रुपये के बावजूद नदी में गाद जमा है जिससे बाढ़ का खतरा बना हुआ है। प्रशासनिक चुप्पी और अधूरे कार्यों ने लोगों में दहशत पैदा कर दी है। विशेषज्ञ गाद जमा होने और अवैध निर्माण को बाढ़ का मुख्य कारण मानते हैं जिससे घाटी की जल वहन क्षमता घट गई है।

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    श्रीनगर धन आवंटन के बाद भी झेलम नदी में बाढ़ का खतरा बरकरार।

    रजिया नूर, जागरण श्रीनगर। जम्मू और कश्मीर में 2014 की बाढ़ के बाद, केंद्र ने घाटी में बाढ़ का सब से बड़ा स्रोत कहलाए जाने वाली झेलम नदी से गाद निकालने और उसकी सफाई के लिए 399 करोड़ रुपये आवंटित किए जाने के दस वर्ष बाद भी गाद से भरी झेलम नदी लोगों के लिए बराबर खतरा बनी हुई है।

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    नदी की सफाई परियोजना के लिए आवंटित इस रकम पर सवाल उठने के साथ लोग बाढ़ की आशंका में जीवन व्यतीत कर रहे हैं। नदी की साफ सफाई के लिए आवंटित उस रकम का क्या हुआ,रकम कहां खर्च हो गई,इस पर प्रशासनिक अधिकारी मौन रखे हुए हैं।

    आपको जानकारी हो कि जम्मू और कश्मीर में 2014 जैसी विनाशकारी बाढ़ को रोकने के लिए, केंद्र की भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) सरकार ने झेलम नदी की गाद निकालने और उसकी सफाई करने तथा उसकी जल क्षमता बढ़ाने के लिए उसके बाढ़ रिसाव चैनल का विस्तार करने के लिए 399 करोड़ रुपये की परियोजना को मंजूरी दी थी।

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    जमीनी स्तर पर झेलम में कोई बदलाव नहीं आया

    अलबत्ता दस वर्ष गुजरने के बाद भी जमीनी स्तर पर झेलम दरिया की हालत में कोई बदलाव नहीं आया। झेलम की कितनी साफ सफाई हुई, इसका अंदाजा गत दिनों तब हुआ जब मूसलाधार बारिश और दक्षिणी कश्मीर में शेषनाग के निकट बादल फटने से वैषव व लिदर नाला (झेलम के मुख्यस्रोत) में बढ़े जलस्तर ने झेलम को भी उफान पर ला दिया। परिणामस्वरूप दक्षिणी कश्मीर के अनंतनाग समेत श्रीनगर के कई इलाके विशेषकर झेलम किनारे आबाद कुर्सू, पादशाहीबाग, मजहूर नगर, नटीपोरा, लसजन, सोनरकोल नवाब बाजार व अन्य इलाको को जलमगन कर दिया।

    पानी घुसने से संपत्ति को पहुंचा नुकसान

    प्रशासन के युद्धस्तर पर किए गए प्रयासों और तुरंत की गई बचाव कार्रवाई से बाढ़ ग्रस्त इलाकों में कोई जानी नुकसान तो नहीं हुआ। अलबत्ता रिहायशी व व्यवासायिक ढांचों में झेलम का पानी घुस जाने से इन इलाकों में रहने वाले लोगों की करोड़ों रुपयों की संपत्ति का नुकसान हो गया। हालांकि मौसम में हुए सुधार ने झेलम समेत सभी जलस्रोतों के जलस्तर को नियंत्रित कर बाढ़ का खतरा टाल दिया है।

    अगले चंद दिन प्रदेश के लिए संवेदनशील

    मौसम विभाग द्वारा इस भविष्यवाणी कि मौसम के लिहाज से अगले चंद दिन जम्मू कश्मीर प्रदेश के लिए काफी संवेदनशील हैं और इस बीच मौसम के मिजाज फिर से तीखे हो जाएंगे,ने इस बात के संकेत दिए हैं कि प्रदेश में बाढ़ का खतरा फिलहाल टल गया है,ख्तम नही हुआ है। ऐसे में लोगों के मन में एक ही सवाल है कि उन्हें इस खतरे के साए में कब तक जीना होगा और यह कि झेलम नदी की सफाई का क्या हुआ? बाढ़ चैनल की जल क्षमता क्यों नहीं बढ़ाई गई? पैसा कहाँ गया?

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    बारिश शुरू होते ही झेलम पर अटक जाती हैं आंखें

    झेलम किनारे आबाद श्रीनगर के लालचौक के साथ सटे आबीगुजर इलाके के एक निवासी अब्दुल करीम जठ ने कहा, 2014 से हम लोग दहशत में जी रहे हैं। जब भी एक दो दिन बारिश होती है। तो हम सब की निगाहों का केंद्र झेलम और इसमें बढ़ते पानी के स्तर पर होता है। हम अपने मकानों की खिकड़िकयों से झेलम को तकते रहते है इस आशंका के साथ कि कहीं यह अपने बांध तोड़ कर हमारे घरों में न घुस आए। जिस तरह 2014 में नदी हमारे घरों से होकर गुजरी थी।

    2014 की बाढ़ को याद कर अभी भी सिहर उठते हैं लोग

    जठ ने कहा, उस बाढ़ ने हमारे सारे आबीगुगर इलाके को लील लिया था। हमारे मकान,दुकानें,घरों का साजोसामान सब कुछ अपने साथ बहा के ले गई थी। उस दिन हम बाल बाल बच गए थे। इस बार भी किसमत महरबान रही हम बच गए। प्रांगनों में थोड़ा पानी घुस आया। लेकिन शुक्र है कि इस बार मकानों में नही घुस गया। अलबत्ता किसमत बार बार साथ नहीं देती। सरकार जिस तरह से इस खतरनाक मुद्दे को ले रही है, उससे लगता है कि अगली बार यह नदी सब कुछ तबाह कर देगी।

    व्यवस्था में सुधार से जलभराव को रोका जा सकता था

    खिसजर मोहम्मद खान नामक एक अन्य स्थानीय व्यक्ति ने जठ की बात से सहमती जताते हुए कहा, बाढ़ नियंत्रण और सिंचाई व्यवस्था में सुधार से इस तरह के जलभराव को रोका जा सकता था। लेकिन यह विभाग भी जैसे सोया रहता है। यह विभाग तब नींद से जाग जाता है जब यह नदी उफान पर अपने बांध तोड़ने की कोशिश करती है। खान ने कहा, 2014 की बाढ़ के बाद हमें यह खुशखबरी सुनाई गई थी कि अब यह नदी उफान पर नहीं आएगी। दिनों बारिश के बाद भी यह शांति से बहेगी। इसका पानी हमारे घरों में नहीं घुसेगा। क्योंकि सेंट्रल गर्वनमेंट ने इसकी साफ सफाई के लिए करोड़ों की रकम मुहैया की है।

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    प्रशासन बताए कहां गई करोड़ों रुपये की राशि

    खान ने कहा, यह सुन हमने भी राहत की सांस ली थी कि चलो हमारी यह परेशानी अब दूर हो जाएगी। लेकिन यह सब हमारी खुशफहमी ही साबित हुई। मुहैया की गई रकम कहां गई, किसने करोड़ों रुपये की हेराफेरी की? कौन लोग अपनी जेबें भरने के लिए हम गरीब और आम लोगों की जिंदगियों के साथ खेल रहे हैं ? इन सवालों के हमें जवाब चाहिए।

    चुप्पी साधे है बाढ़ नियंत्रण विभाग

    इस संबंध में जब जागरण ने बाढ़ नियंत्रण एवं सिंचाई विभाग से संपर्क किया तो वर्तमान में विभाग के साथ जुड़े किसी भी अधिकारी ने इस संबंध में कोई प्रतक्रिया नही की। अलबत्ता विभाग के एक सेवानवृत्त अधिकारी ने अपना नाम न प्रकाशित करने की शर्त पर कहा कि झेलम की साफसफाई के लिए आवंटित रकम कहां इस्तेमाल की गई, इसके बारे में तो पता नही लेकिन इतना जरूर कह सकता हूं कि उस समय झेलम नदी पर बाढ़ प्रबंधन कार्यों के लिए एक व्यापक योजना के अंतर्गत 399.29 करोड़ रुपये भी स्वीकृत किए गए थे। इस राशि में से 140 करोड़ रुपये बाढ़ मार्गों के विस्तार के लिए भूमि अधिग्रहण के लिए, 40 करोड़ रुपये दो पुलों के निर्माण के लिए और शेष राशि झेलम नदी की ड्रेजिंग के लिए निर्धारित की गई थी।

    फंड के अभाव में रोक दी गई ड्रेजिंग

    अधिकारी ने कहा कि तमाम आवश्यक औपचारिकताएं पूरी होने के बाद सरकार ने फरवरी 2016 में नदी की ड्रेजिंग शुरू की, जिसका उद्देश्य झेलम नदी की जल वहन क्षमता को 45,000 क्यूसेक तक बढ़ाना था। अधिकारी ने कहा, कोलकाता स्थित निजी कंपनी रीच ड्रेजिंग लिमिटेड – जिसे मार्च 2016 में इस परियोजना के लिए अनुबंधित किया गया था, ने अप्रैल 2017 में ड्रेजिंग यह कर कर रोक दी थी कि इस कार्य के लिए अधिक धनराशि की दरकार है लेकिन ततकालीन राज्य सरकार ने इस मांग को अस्वीकार कर दिया था। अधिकारी ने कहा फर्म को उस साल 31 मार्च तक श्रीनगर में पंथा चौक से वुलर झील तक नदी के 25 किलोमीटर लंबे हिस्से की खुदाई करनी थी। लेकिन वह प्रक्रिया जारी नहीं कर पाई। अधिकारी ने कहा, उसके बाद क्या हुआ, इसकी मुझे कोई जानकारी नहीं है।

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    विशेषज्ञों ने बताया क्या रहे 2014 में बाढ़ के कारण

    आपको बता दें कि 7 सितंबर, 2014 को झेलम नदी का जलस्तर सारे रिकॉर्ड तोड़ गया। उस वर्ष दक्षिण कश्मीर के अनंतनाग में नदी का जलस्तर संगम में 33 फीट और श्रीनगर के राम मुंशी बाग में 23 फीट के पार हो गया जिससे घाटी में विनाशकारी बाढ़ आ गई। विशेषज्ञों का मानना है कि बाढ़ का मुख्य कारण झेलम नदी में गाद के जमा होने से इसका जल वहन काफी हद तक कम हो गया था। विशेषज्ञों के अनुसार लगभग 30 वर्षों से, झेलम और उसके सहायक चैनल की सफाई नहीं की गई थी, जिससे इसकी जल वहन क्षमता 17,000 क्यूसेक से घटकर 3,531 क्यूसेक रह गई।

    निर्माण नियमों का धड़ल्ले से हुआ उल्लंघन

    एक सरकारी पैनल ने सुझाव दिया था कि घाटी की भौगोलिक स्थिति के कारण, नदी की जल वहन क्षमता कम होने और बाढ़ रिसाव चैनल सिकुड़ने के अलावा, यह विनाशकारी बाढ़ के लिए प्रवण है। एक पर्यावरण विशेशज्ञ ने भी अपना नाम न छापने की शर्त पर कहा, वर्ष 2014 की बाढ़ के बाद झेलम की साफ सफाई की प्रक्रिया तो हमें कहीं नजर नही आई। अलबत्ता इस बीच यहां झेलम की फल्ड चैनलों पर कनस्ट्रक्शन का खुलेआम उल्लंघन किया गया। विशेषज्ञ ने कहा, लोगों को फल्ड चौनलों पर कनस्ट्रकशन की इजाजत कौन देता है, इसके विस्तार करना जरूरी नही सब जानते हैं।

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    आने वाले दिनों में दो दिन की बारिश भी नहीं झेल पाएगी घाटी

    हां उदाहरण के लिए, एक के बाद एक सरकारों ने बेमिना में बाढ़ के बेसिन को भर दिया, जो पहले दलदली भूमि हुआ करती थी और शिकार के लिए जानी जाती थी। विशेषज्ञ ने कहा, मैं इतना जरूर कहूंगा कि जो लोग इस अवैध कार्य के पीछे हैं, उनकी बदौलत घाटी में एेसी स्थिति उत्पन्न हो गई है कि यह जल्द ही ऐसी स्थिति में आ जाएगा कि भविष्य में घाटी, विशेषकर श्रीनगर के निचले इलाके दो दिन की बारिश भी नहीं झेल पाएंगे क्योंकि आप झेलम में गाद जमा होने से नहीं रोक पा रहे। जब तक बाढ़ के चैनलों को अवैध निर्माणों से मुक्त नहीं किया जाता, तब तक खुदाई या गाद निकालने से कोई फायदा नहीं होगा।