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    पिता राजमिस्त्री, खुद डिलीवरी ब्वॉय: JPSC में 110वीं रैंक लाकर ऐसे डिप्टी कलेक्टर बना झारखंड का सूरज

    Updated: Thu, 21 Aug 2025 03:14 PM (IST)

    गिरिडीह जिले के सूरज यादव ने अपनी दृढ़ इच्छाशक्ति और मेहनत से जेपीएससी परीक्षा में 110वीं रैंक हासिल की है। आर्थिक तंगी के बावजूद उन्होंने डिलीवरी ब्वॉय कॉल सेंटर कर्मचारी और ट्यूशन टीचर के रूप में काम करते हुए पढ़ाई जारी रखी। शाम पांच बजे से रात 10 बजे तक करते थे डिलीवरी ब्वाय शेष समय में बस एक ही काम पढ़ाई। पढ़ें JPSC टॉपर सूरज यादव की प्रेरक कहानी।

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    गिरिडीह में सूरज को सम्मानित करते मुखिया मुकेश यादव।

    ज्ञान ज्योति, जागरण गिरिडीह। बिरनी प्रखंड के कपिलो पंचायत में रहते हैं सूरज यादव। रांची में डिलीवरी ब्वाय रहे सूरज अब डिप्टी कलेक्टर बनेंगे। वर्ष 2024 की जेपीएससी परीक्षा में सूरज ने 110 वां स्थान लाकर बता दिया कि दृढ़ इच्छाशक्ति है तो सफलता कदम चूमेगी। प्रतिकूल परिस्थितियों में भी लक्ष्य साधा जा सकता है। आज सूरज अपने गांव ही नहीं बल्कि पूरे प्रदेश के युवाओं के लिए प्रेरक बन चुके हैं।

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    उनकी इस सफलता के पीछे बड़ा संघर्ष जुड़ा है। उनके परिवार की आर्थिक स्थिति बेहद दयनीय है। पिता द्वारिका यादव राजमिस्त्री थे, मां यशोदा देवी गृहिणी। बावजूद माता-पिता ने खुद अभावों के बीच जीवनयापन कर बेटे की पढ़ाई को बाधित नहीं होने दिया। उसे पढ़ाया।

    सूरज ने भी उनके सपने पूरे कर दिए। सूरज के चार बहनें हैं। पूरा परिवार ही नहीं कपिलो पंचायत भी खुशी से गदगद है। उनको सम्मानित भी किया गया।

    कामयाबी का मंत्र है पढ़ाई में लगन और मेहनत

    सूरज ने बताया कि बचपन से ही प्रशासनिक अधिकारी बनने का सपना था, ताकि गरीबों और वंचित वर्ग के लिए कुछ कर सकूं। परिवार की आर्थिक स्थिति खराब थी, बावजूद हम समझ गए थे कि सफलता के लिए काबिल होना जरूरी है, वह पढ़ाई से ही संभव है। सो, पूरे मनोयोग से पढ़ता रहा। वर्ष 2017 में स्नातक कर लिया। पिता को सहयोग करने के लिए कुछ दिनों के लिए काल सेंटर में भी काम किया। इसी वर्ष शादी भी हो गई।

    पत्नी पूनम को बताया कि प्रशासनिक अधिकारी बनना चाहता हूं। उसने भी हिम्मत दी। कहा कि हमारी जरूरतों की चिंता मत करो। अपनी पढ़ाई पर ध्यान दो। लक्ष्य तय है तो मेहनत सफलता दिलाएगी। उसने अपने पिता से बात की। वे भी खुश हो गए, उन्होंने आर्थिक मदद भी की। तब रांची की एक कोचिंग में जेपीएससी की तैयारी की।

    2020 में गांव लौट आया। उस समय कोरोना काल आ गया था। 2022 में जेपीएससी की परीक्षा दी, बावजूद उसमें सफलता नहीं मिली। मायूस हुआ पर हिम्मत नहीं टूटी। नए सिरे से तैयारी शुरू कर दी। घर की आर्थिक स्थिति के मद्देनजर हजारीबाग जाकर डेढ़ साल तक एक कोचिंग में पढ़ाया। इस बीच सीएनटी एक्ट पर एक पुस्तक भी लिखी। 2024 में फिर जेपीएससी की परीक्षा दी। इसमें पास हो गया।

    ... और बन गया डिलीवरी ब्वाय

    बकौल सूरज हजारीबाग में कोचिंग पढ़ाता था, बाद में वहां काम मिलने में दिक्कत आई तो रांची आ गया। आर्थिक तंगी हालात को खराब कर रही थी। तब दोस्त सूरज और राजेश ने सुझाव दिया कि डिलीवरी ब्वाय बन जाओ। अपना खर्च आराम से निकल आएगा। दोनों दोस्तों को छात्रवृत्ति के पैसे मिले थे, उससे उन्होंने बाइक खरीदकर दी।बस हम डिलीवरी ब्वाय बन गए। शाम पांच बजे से रात 10 बजे तक काम करते थे। शेष समय में बस एक ही काम था, पढ़ाई।

    मां की सीख आई काम

    सूरज का कहना है कि हमारी मां हमेशा कहती हैं कि धैर्यवान इंसान ही सफल होता है। उसमें हर चुनौती से निपटने की क्षमता तैयार हो जाती है। मां की बातों को गांठ बांध लिया था। कठिन परिस्थितियों में धैर्य ही था, जो संबल देता था, बेहतर सोचने समझने की ताकत देता था। देख लीजिए आज लक्ष्य हासिल कर लिया। मां व पिता का मार्गदर्शन ही हमारे आगे बढ़ने का कारण है। वहीं पत्नी का यह कहना कि पढ़ाई जारी रखिए, घर की जिम्मेदारी मैं संभाल लूंगी, ने ऊर्जा का संचार कर दिया। अब मां खुश है, गांववाले और समाज सबलोग सम्मानित कर रहे।

    डिलीवरी ब्वाय के जीवन में समस्याओं का अंबार

    सूरज का कहना है कि डिलीवरी ब्वाय का काम करने वालों के जीवन में अनेक समस्याएं हैं। हमने भी उन्हें करीब से देखा और महसूस किया है। इस वर्ग को सामाजिक सुरक्षा दिलाने का हर प्रयास करेंगे। सड़क पर हादसे न हों, इसके लिए हर कोशिश करूंगा।