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    झारखंड हाई कोर्ट का आदेश, छठे वेतनमान की सिफारिश के अनुसार प्रशिक्षित शिक्षकों को दें वेतन

    Updated: Sun, 30 Nov 2025 12:32 PM (IST)

    झारखंड हाई कोर्ट ने राज्य सरकार को छठे वेतन आयोग के अनुसार प्राथमिक शिक्षकों का वेतन पुन: निर्धारित करने का आदेश दिया है। कोर्ट ने कहा कि 2009 के संकल्प के अनुसार शिक्षकों का वेतन पे बैंड-दो और ग्रेड पे 4200 रुपये में तय होना चाहिए। सरकार को 12 सप्ताह में वेतन पुन: निर्धारित करने और आठ सप्ताह में लाभ देने का निर्देश दिया गया है। याचिकाकर्ताओं ने छठे वेतन आयोग के अनुसार वेतन की मांग की थी।

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    झारखंड हाई कोर्ट

    राज्य ब्यूरो, रांची। झारखंड हाई कोर्ट के जस्टिस दीपक रोशन की अदालत ने सरकार को निर्देश दिया है कि छठे वेतन आयोग की सिफारिशों के आधार पर प्राथमिक स्कूल के प्रशिक्षित शिक्षकों के वेतन का फिर से निर्धारण करे। 

    अदालत ने कहा कि राज्य सरकार का 28 फरवरी, 2009 का संकल्प पहले से ही शिक्षकों के वेतन निर्धारण को स्वीकार किया है, जिसके अनुसार उनका वेतन पे बैंड-दो (9300-34800) और ग्रेड पे 4200 रुपये में तय किया जाना चाहिए। 

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    अदालत ने राज्य सरकार को 12 सप्ताह के भीतर प्रार्थियों के वेतन का पुनर्निर्धारण करने और इसके बाद आठ सप्ताह के भीतर संबंधित लाभ देने का निर्देश दिया।

    25 याचिकाकर्ताओं ने दायर की याचिका

    रांची और लोहरदगा के कुल 25 याचिकाकर्ताओं ने अलग-अलग दो याचिकाएं दायर कर छठे केंद्रीय वेतन आयोग की सिफारिशों के अनुरूप वेतन लाभ दिए जाने की मांग की थी। 

    याचिकाकर्ता प्रशिक्षित प्राथमिक शिक्षक और अन्य सरकारी सेवक हैं, जिन्होंने जनवरी 2006 से पे-बैंड-2 (9300-34800) और ग्रेड पे 4200 रुपये पर वेतन निर्धारण की गुहार लगाई थी, जैसा कि राज्य सरकार ने 28 फरवरी 2009 की संकल्प से स्वीकार किया था।

    संकल्प से मिले लाभ का दावा नहीं

    याचिकाकर्ताओं की ओर से वरीय अधिवक्ता अजीत कुमार और अधिवक्ता तेजस्विता सफलता ने कोर्ट को बताया था कि राज्य सरकार ने 28 फरवरी 2009 की मूल संकल्प में प्रशिक्षित प्राथमिक शिक्षकों के एंट्री-स्केल को 6500-10500 रुपये तथा नए वेतन ढांचे में (9300-34800) के साथ 4200 रुपये ग्रेड पे के रूप में स्वीकार किया है। बाद के संकल्पों को छोड़ भी दें, तब भी मूल संकल्प के आधार पर संशोधित वेतन दिए जाने का उनका अधिकार बरकरार रहता है।

    राज्य की ओर से कहा गया कि याचिकाकर्ताओं ने 11 सितंबर 2014 के पत्र और 26 मार्च 2018 की संकल्प को भी चुनौती दी है, इसलिए वे 13 अगस्त 2014 की संकल्प से मिले लाभ का दावा नहीं कर सकते। 

    राज्य ने यह भी आपत्ति की कि याचिकाकर्ताओं ने अपना मौजूदा वेतन-विवरण स्पष्ट रूप से नहीं दिया है, इस कारण उनसे संबंधित राहत नहीं दी जानी चाहिए।