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    Lohri 2026: पंजाब से लेकर दिल्ली तक, जानें भारत में कैसे और क्यों मनाया जाता है यह फसलों का यह खास पर्व

    Updated: Mon, 12 Jan 2026 02:16 PM (IST)

    लोहड़ी (Lohri 2026) का त्योहार पंजाब और हरियाणा में बड़ी ही धूमधाम से मनाया जाता है। यह त्योहार भारत के और भी कई हिस्सों में मनाते हैं। फसलों की कटाई ...और पढ़ें

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    अलग-अलग राज्यों में कैसे मनाते हैं लोहड़ी? (Picture Courtesy: Freepik)

    लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। भारत त्योहारों का देश है, जहां हर मौसम और फसल का स्वागत बड़े उत्साह के साथ किया जाता है। इन्हीं त्योहारों में से एक है लोहड़ी (Lohri 2026)। यह उत्तर भारत में, खासतौर से पंजाब और हरियाणा का सबसे प्रमुख और लोकप्रिय त्योहार है। 

    मकर संक्रांति से ठीक एक दिन पहले 13 जनवरी को मनाया जाने वाला यह पर्व शीत ऋतु की विदाई और नई फसल के आगमन का प्रतीक है। इसलिए इस त्योहार को बड़ी ही धूमधाम के साथ मनाया जाता है। आइए जानें यह त्योहार कैसे मनाया जाता है (Lohri Celebration)। 

    लोहड़ी कहां-कहां मनाई जाती है?

    लोहड़ी का त्योहार मुख्य रूप से पंजाब और हरियाणा में मनाया जाता है, लेकिन आज यह भारत के कई अन्य हिस्सों में भी बड़े हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है-

    • पंजाब और हरियाणा- यहां लोहड़ी केवल एक त्योहार नहीं, बल्कि एक सांस्कृतिक पहचान है। गांवों से लेकर शहरों तक, हर घर में इसकी रौनक दिखती है।
    • दिल्ली और हिमाचल प्रदेश- पंजाब से सटे होने के कारण दिल्ली और हिमाचल प्रदेश के कुछ हिस्सों में भी इसे बड़े पैमाने पर मनाया जाता है।
    • जम्मू-कश्मीर- जम्मू क्षेत्र में इसे 'डोगरा' संस्कृति के हिस्से के रूप में मनाया जाता है।
    • अन्य राज्य- उत्तर प्रदेश के पश्चिमी भागों और राजस्थान के कुछ इलाकों में भी लोहड़ी की धूम रहती है। इसके अलावा, पश्चिम भारत में सिंधी समुदाय के लोग इसे लाल लोई के रूप में मनाते हैं।
    Lohri
     
    (Picture Courtesy: Freepik)

    लोहड़ी कैसे मनाई जाती है?

    लोहड़ी मनाने का तरीका बेहद सामाजिक और आनंदमयी है। इसकी परंपराएं प्रकृति और भाईचारे से जुड़ी हैं-

    • पवित्र अग्नि जलाना- लोहड़ी की शाम को खुले स्थान पर लकड़ियों और उपलों का ढेर लगाकर पवित्र अग्नि जलाई जाती है। लोग इस अग्नि के चारों ओर घेरा बनाकर बैठते हैं और इसमें तिल, गुड़, रेवड़ी, मूंगफली और मक्के के दाने अर्पित करते हैं। यह अग्नि को सम्मान देने और ठंड को विदा करने का तरीका है।
    • लोक गीत और गिद्दा-भांगड़ा- अग्नि के चारों ओर ढोल की थाप पर पुरुष 'भांगड़ा' और महिलाएं 'गिद्दा' करती हैं। इस दौरान कई लोक गीत गाए जाते हैं, जो 'दुल्ला भट्टी' की कहानी से जुड़े होते हैं।
    • पारंपरिक खान-पान- लोहड़ी का स्वाद सरसों का साग और मक्के की रोटी के बिना अधूरा है। इसके साथ ही तिल-गुड़ के लड्डू, गजक और रेवड़ी भी बांटी जाती है।
    • नवविवाहित जोड़ों और शिशुओं के लिए खास- जिस घर में नई शादी हुई हो या किसी बच्चे का जन्म हुआ हो, वहां लोहड़ी का जश्न दोगुना हो जाता है। इसे 'पहली लोहड़ी' कहा जाता है, जहां रिश्तेदार और पड़ोसी आकर उन्हें आशीर्वाद और उपहार देते हैं।

    लोहड़ी का महत्व

    लोहड़ी का वैज्ञानिक और आध्यात्मिक महत्व भी है। यह पर्व सूर्य के उत्तरायण होने की सूचना देता है, जिससे दिन लंबे और रातें छोटी होने लगती हैं। यह किसानों के लिए खुशी का समय होता है, क्योंकि उनकी फसलें पकने को तैयार होती हैं। यह त्योहार भेदभाव भुलाकर साथ आने, दान करने और जीवन में नई ऊर्जा भरने का संदेश देता है।

    लोहड़ी केवल आग जलाने और नाचने-गाने का पर्व नहीं है, बल्कि यह हमारे किसान भाइयों की मेहनत का सम्मान और आपसी प्रेम का प्रतीक है। इसकी गर्माहट रिश्तों की मिठास को और बढ़ा देती है।