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    Magh Mela 2026: संगम में लगाने जा रहे हैं आस्था की डुबकी, तो देखना न भूलें प्रयागराज की 5 जगहें

    Updated: Tue, 06 Jan 2026 11:58 AM (IST)

    Magh Mela 2026 शुरू हो चुका है। साल 2025 के महाकुंभ की भव्यता के बाद, प्रयागराज एक बार फिर आध्यात्मिक ऊर्जा से सराबोर है। 45 दिनों तक चलने वाला यह पाव ...और पढ़ें

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    Magh Mela 2026: संगम की लहरों के साथ-साथ प्रयागराज में और क्या कुछ है खास? (Image Source: AI-Generated) 

    स्मार्ट व्यू- पूरी खबर, कम शब्दों में

    लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। इन दिनों अगर आप भी माघ मेले (Magh Mela 2026) के लिए प्रयागराज आए हैं या यहां आने का प्लान बना रहे हैं, तो जाहिर है कि आपका खास मकसद त्रिवेणी संगम में पवित्र डुबकी लगाना होगा, लेकिन क्या आपको मालूम है कि पूजा-पाठ और स्नान के बाद भी इस शहर में देखने के लिए बहुत कुछ है- जैसे कि ऐतिहासिक मंदिर, मुगलकालीन स्मारक और स्वतंत्रता संग्राम की कहानियां सुनाते हुए बगीचे। आइए जानते हैं संगम के अलावा शहर की उन 5 जगहों (Places to visit in Prayagraj during Magh Mela) के बारे में जो आपकी ट्रिप को यादगार बना देंगी।

    Magh Mela 2026 Prayagraj

    (Image Source: AI-Generated) 

    लेटे हुए हनुमान जी

    संगम क्षेत्र के पास स्थित 'लेटे हुए हनुमान जी' का मंदिर प्रयागराज के सबसे अनोखे और पवित्र स्थलों में से एक है। यह मंदिर भगवान हनुमान की एक दुर्लभ मूर्ति के लिए प्रसिद्ध है जो लेटी हुई मुद्रा में है। मान्यता है कि यह मूर्ति स्वयं प्रकट हुई थी।

    Reclining Hanuman Temple

    (Image Source: Instagram) 

    भक्तों का मानना है कि यह मूर्ति समय के साथ धीरे-धीरे जमीन में धंसती जाती है और मानसून के दौरान नदी के प्रवाह के साथ फिर से ऊपर आ जाती है। यह मंदिर आस्था और सुरक्षा का प्रतीक है। माघ मेले के दौरान, विशेषकर स्नान के दिनों में यहां भक्तों की भारी भीड़ होती है, क्योंकि संगम में डुबकी लगाने के बाद यहां दर्शन करना बेहद जरूरी माना जाता है।

    इलाहाबाद का किला और अक्षयवट

    यमुना नदी के किनारे स्थित इलाहाबाद का किला (जिसे अकबर का किला भी कहा जाता है) 1583 में बादशाह अकबर द्वारा बनवाया गया था। इसे मुगल बादशाह द्वारा बनाया गया सबसे बड़ा किला कहा जाता है। हालांकि, अब यह भारतीय सेना के नियंत्रण में है और पर्यटकों के लिए इसका एक बहुत ही सीमित क्षेत्र खुला है। इसके अंदर आप जनाना, जोधाबाई महल, तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व का अशोक स्तंभ और सरस्वती कूप (एक कुआं जिसके नीचे सरस्वती नदी बहने की मान्यता है) देख सकते हैं।

    Allahabad Fort And Akshayavat

    (Image Source: X)

    किले के अंदर एक और प्रसिद्ध स्थल 'अक्षयवट' है, जो एक प्राचीन बरगद का पेड़ है। इसे अमर वृक्ष माना जाता है। किंवदंतियों के अनुसार, भगवान राम, सीता और लक्ष्मण ने इस पेड़ की छांव में विश्राम किया था। ऐसा भी कहा जाता है कि इस पेड़ को नष्ट करने की सभी कोशिशें नाकाम रही हैं।

    आनंद भवन

    Places to visit in Prayagraj during Magh Mela

    (Image Source: X)

    यह विशाल हवेली कभी नेहरू परिवार का निवास स्थान हुआ करती थी। अब इसे एक संग्रहालय में बदल दिया गया है, जहां भारत के स्वतंत्रता संग्राम से जुड़ी कलाकृतियां, तस्वीरें और दस्तावेज प्रदर्शित किए गए हैं। इसके पास ही 'स्वराज भवन' स्थित है, जो नेहरू परिवार का पूर्व निवास था। बाद में इसे भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के मुख्यालय में बदल दिया गया, जिसके बाद आनंद भवन का निर्माण किया गया।

    खुसरो बाग

    Khusro Bagh

    (Image Source: X)

    यह शहर के सबसे प्रसिद्ध पर्यटन स्थलों में से एक है। खुसरो बाग एक सुंदर मुगल उद्यान है, जहां बादशाह जहांगीर के परिवार के सदस्यों के मकबरे हैं। इसमें उनके सबसे बड़े बेटे राजकुमार खुसरो, उनकी माँ सुल्तान बेगम और उनकी बहन निथार के मकबरे शामिल हैं। यहां के मकबरे अपनी मुगल वास्तुकला और नक्काशी के लिए जाने जाते हैं, जिन्हें भारत की बेहतरीन कलाकृतियों में गिना जाता है।

    अलोपी देवी मंदिर

    Alopi Devi mandir

    (Image Source: Instagram)

    यह शक्तिपीठ बहुत ही अनोखा है क्योंकि इस मंदिर में कोई मूर्ति नहीं है, बल्कि केवल एक पालना है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, यह वह स्थान है, जहां सती का दाहिना हाथ गिरा था और गायब हो गया था। चूंकि यह गिरने और लुप्त होने वाला अंतिम अंग था, इसलिए यहां की देवी को 'अलोपी' (लुप्त होने वाली) देवी कहा जाता है। यहां साल भर भक्तों का तांता लगा रहता है, लेकिन कुंभ और माघ मेले के दौरान यहां की रौनक और भी बढ़ जाती है।

    चंद्रशेखर आजाद पार्क

    Chandra Shekhar Azad Park

    (Image Source: Incredible India)

    प्रयागराज के सिविल लाइन्स में स्थित यह 133 एकड़ में फैला एक शांत पार्क है। 27 फरवरी, 1931 को इसी स्थान पर क्रांतिकारी चंद्रशेखर आजाद ने ब्रिटिश सेना से लड़ते हुए अपने प्राणों की आहुति दी थी। देश की आजादी के दीवानों के लिए यह एक तीर्थ के समान है।

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