भारत के पहले सहकारी विश्वविद्यालय को लोकसभा की मंजूरी, हर साल आठ लाख प्रशिक्षित पेशेवर होंगे तैयार
लोकसभा ने त्रिभुवन सहकारी विश्वविद्यालय विधेयक को पारित कर दिया है जिससे हर साल आठ लाख प्रशिक्षित पेशेवर तैयार होंगे। यह विश्वविद्यालय सहकारिता क्षेत्र में रोजगार के नए अवसर पैदा करेगा और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूती देगा। गुजरात में स्थित परिसर से पूरे देश की सहकारी संस्थाओं को जोड़ा जाएगा। विश्वविद्यालय में डिग्री डिप्लोमा और पीएचडी कोर्स उपलब्ध होंगे जिससे सहकारी क्षेत्र को प्रशिक्षित युवा मिलेंगे।

जागरण ब्यूरो, नई दिल्ली। देश में प्रशिक्षित श्रमबल के सहयोग से सहकारिता आंदोलन को गति देने का रास्ता प्रशस्त हो गया। लोकसभा में त्रिभुवन सहकारी विश्वविद्यालय विधेयक को चर्चा के बाद ध्वनिमत से पारित कर दिया गया।
सहकारिता मंत्री अमित शाह ने कहा कि विश्वविद्यालय के माध्यम प्रत्येक वर्ष सहकारिता क्षेत्र में आठ लाख प्रशिक्षित प्रोफेशनल तैयार होंगे। यह देश का पहला सहकारिता विश्वविद्यालय होगा, जिससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था आगे बढ़ेगी। स्वरोजगार एवं लघु उद्यमिता का विकास के साथ ही नवाचार के नए मानक स्थापित होंगे।
तीन घंटे तक विधेयक पर हुआ विमर्श
विधेयक पर लोकसभा में तीन घंटे विमर्श हुआ। बाद में जवाब देते हुए अमित शाह ने विश्वविद्यालय की उपयोगिता और काम करने के तरीके को विस्तार से बताया। यह भी स्पष्ट किया कि इसका नाम त्रिभुवन सहकारी विश्वविद्यालय क्यों रखा गया है।
विश्वविद्यालय का प्रारूप बताते हुए सहकारिता मंत्री ने कहा कि परिसर गुजरात में होगा, लेकिन पूरे देश की सहकारी संस्थाओं को इससे संबद्ध किया जाएगा। पहले वर्ष में ही प्रत्येक जिले में कालेज और स्कूल को खोले जाएंगे। नई शिक्षा नीति के मानकों के अनुरूप दसवीं-12वीं के लिए भी कोर्स होंगे। इंजीनिय¨रग के छात्रों के लिए भी कोर्स का डिजाइन किया गया है। साथ ही बड़े पैमाने पर ई-लर्निंग कोर्स भी शामिल किए जाएंगे।
सहकारिता को समर्पित देश का यह पहला विश्वविद्यालय
अमित शाह ने कहा कि आजादी के 75 वर्ष बाद सहकारिता को समर्पित देश का यह पहला विश्वविद्यालय होगा, जहां प्रतिवर्ष आठ लाख से अधिक युवाओं के लिए डिग्री, डिप्लोमा एवं पीएडी के पाठ्यक्रम चलाए जाएंगे। सहकारिता मंत्री ने विश्वविद्यालय की जरूरत भी बताई।
उन्होंने कहा कि देश भर में हजारों की संख्या में सहकारी संस्थाएं हैं, जहां नियुक्तियों का कोई तय मानक नहीं है। पैक्सों में सचिव के पद हों या चीनी मिलों एवं को-आपरेटिव बैंकों में नियुक्तियों का मामला हो, सभी में बिना किसी मान्य डिग्री के नियुक्तियां हो जाती हैं। सहकारी समितियों में प्रभावशाली लोग अपने चट्टे-बट्टे को ही नौकरी देते हैं, क्योंकि सहकारिता के क्षेत्र में अभी तक कोई मान्य डिग्री नहीं होती है, लेकिन अब ऐसा नहीं होगा।
"सहकारिता क्षेत्र के लिए डिग्री, डिप्लोमा और पीएचडी कोर्स बनाए जा रहे हैं। सरकार ने इसकी जरूरत को समझते हुए विश्वविद्यालय की स्थापना से पहले ही सहकारी संस्थाओं के लिए नया कोर्स डिजाइन करना शुरू कर दिया है। यूनिवर्सिटी बनने के बाद अब मानक डिग्री धारकों को ही नौकरी मिलेगी। इससे गरीब बच्चों को फायदा होगा।" अमित शाह, केंद्रीय मंत्री
सहकारी संस्कृति का होगा विकास: अमित शाह
अमित शाह ने कहा कि सहकारिता विश्वविद्यालय के माध्यम से देश में सहकारी संस्कृति और गतिविधियों का विकास होगा। नवाचार को प्रोत्साहन मिलेगा। नई प्रौद्योगिकी का देश को फायदा होगा। जमीन पर मजबूत सहकारी खाका तैयार होगा। ग्रामीण अर्थव्यवस्था को धार मिलेगी।
"सहकारिता क्षेत्र को अच्छे और प्रशिक्षित युवा मिलेंगे। जब प्रतिवर्ष लाखों युवा डिग्री-डिप्लोमा का प्रमाण पत्र लेकर निकलेंगे तो एक देश में सहकारिता की नई संस्कृति का विकास होगा। साढ़े तीन वर्षों में सरकार ने जो खाका तैयार किया है, वह और अधिक मजबूत होगा। एक नया सहकारी कल्चर भी शुरू होगा, जिससे घरेलू के साथ-साथ वैश्विक वैल्यू चैन में भी भारत का बड़ा योगदान होगा।" अमित शाह, केंद्रीय मंत्री
अमित शाह ने कहा कि विश्वविद्यालय का नाम सहकारिता क्षेत्र के आदर्श त्रिभुवन किशिभाई पटेल के नाम पर है, जिन्होंने गुजरात एक कस्बे में अमूल डेयरी की नींव रखी और दुनिया को आश्चर्यचकित कर दिया। उन्होंने कहा कि सहकारिता ऐसा क्षेत्र है, जिससे देश का हर पांचवा व्यक्ति जुड़ा हुआ है। प्रत्येक गांव में कोई न कोई इकाई ऐसी है जो सहकारिता के जरिए कृषि, ग्रामीण विकास और स्वरोजगार से जुड़ी है और देश के विकास में योगदान दे रही है।
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