Malegaon blast Case: ट्रायल कोर्ट फैसले के हाईकोर्ट जाने से बच सकती है NIA, कमजोर सबूत हैं अहम कारण
वैसे मालेगांव धमाके में ट्रायल कोर्ट के फैसले के खिलाफ हाईकोर्ट में अपील करने को लेकर एनआइए विधि विशेषज्ञों के साथ राय-मश्विरा कर रही है लेकिन जांच एजेंसी के कई वरिष्ठ अधिकारी हाईकोर्ट जाने के पक्ष में नहीं है। इन अधिकारियों का कहना है कि जिन कमजोर साक्ष्यों और गवाहों के कारण हाईकोर्ट में भी मामला टिक नहीं पाएगा और एजेंसी की नए सिरे से किरकिरी अलग से होगी।

जागरण ब्यूरो, नई दिल्ली। वैसे मालेगांव धमाके में ट्रायल कोर्ट के फैसले के खिलाफ हाईकोर्ट में अपील करने को लेकर एनआइए विधि विशेषज्ञों के साथ राय-मश्विरा कर रही है, लेकिन जांच एजेंसी के कई वरिष्ठ अधिकारी हाईकोर्ट जाने के पक्ष में नहीं है।
हाईकोर्ट में भी मामला टिक नहीं पाएगा
इन अधिकारियों का कहना है कि जिन कमजोर साक्ष्यों और गवाहों के कारण हाईकोर्ट में भी मामला टिक नहीं पाएगा और एजेंसी की नए सिरे से किरकिरी अलग से होगी।
एटीएस की जांच के समय ही वैज्ञानिक तरीके से साक्ष्य नहीं जुटाए गए
एनआइए के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा कि एटीएस की जांच के समय ही वैज्ञानिक तरीके से साक्ष्य नहीं जुटाए गए और गलत तरीके से संगठित अपराध से जुड़े कानून मकोका को लगा दिया।
एनआइए ने उन्हीं साक्ष्यों के आधार पर जांच को आगे बढ़ाया
एनआइए ने उन्हीं साक्ष्यों के आधार पर जांच को आगे बढ़ाया और अदालत में दलीलें पेश की। अधिकारी खुद स्वीकार करते हुए आतंकवाद के खिलाज जांच की प्रीमियम एजेंसी होने के बावजूद इस तरह के कमजोर साक्ष्यों के सहारे अदालत में आरोपों को साबित आसान नहीं था और उन्हें खुद ऐसे फैसले की आशंका पहले से थी।
वरिष्ठ अधिकारी के अनुसार फिलहाल अदालत के फैसले का अध्ययन कराया जा रहा है और विधि विशेषज्ञों की राय के आधार पर ही एजेंसी आगे का कदम उठाएगी।
आरोपियों के खिलाफ पेश किये गए गवाहों बयान साफ नहीं
ध्यान देने की बात है कि अदालत में अपने फैसले में साफ-साफ कहा कि आरोपियों के खिलाफ पेश किये गए गवाहों के बयान धमाके में उनकी संलिप्तता को साबित नहीं करते हैं।
कोर्ट को ठोस सबूत नहीं दिये गए
इसी तरह से बम को मोटरसाइकिल लगाने के भी ठोस सबूत नहीं दिये गए। अदालत ने फैसले में कहा कि बम मोटरसाइकिल पर रखा गया होगा। इसी तरह से आरोपियों के बातचीत के जो नमूने अदालत के सामने पेश किये गए थे, वे भी दोषपूर्ण थे। ट्रायल के दौरान भी एजेंसी की ओर से अदालत के इन सवालों का सटीक जवाब नहीं दिया जा सका था।
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