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    'दबाव में व्यापार ठीक नहीं', ट्रंप के टैरिफ के बाद मोहन भागवत का बड़ा बयान; संघ प्रमुख बोले- किसी के उकसावे में न आएं

    राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख मोहन भागवत ने अमेरिकी टैरिफ के बाद स्वदेशी अपनाने का आग्रह किया है। उन्होंने सरकार को किसी के उकसावे में न आने की सलाह दी और ट्रंप को दबाव में व्यापार न करने की नसीहत दी। भागवत ने विज्ञान भवन में आयोजित 100 वर्ष की संघ यात्रा - नए क्षितिज कार्यक्रम को संबोधित किया।

    By Digital Desk Edited By: Swaraj Srivastava Updated: Wed, 27 Aug 2025 08:30 PM (IST)
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    विज्ञान भवन में आयोजित है तीन दिवसीय कार्यक्रम (फोटो: @RSSorg)

    डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख मोहन भागवत ने अमेरिकी टैरिफ के बाद स्वदेशी के लिए पहल करने की अपील की और सरकार को सलाह दी कि किसी के उकसावे में न आएं। भागवत ने ट्रंप को भी नसीहत देते हुए कहा कि दबाव में व्यापार नहीं किया जाता।

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    दरअसल भागवत नई दिल्ली स्थित विज्ञान भवन में आयोजित राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के तीन दिवसीय कार्यक्रम '100 वर्ष की संघ यात्रा - नए क्षितिज' को संबोधित कर रहे थे। इस दौरान उन्होंने लोगों से बाहर के बने उत्पादों की बजाय घर के बने पेय और खाद्य पदार्थों का इस्तेमाल करने की अपील की।

    आत्मनिर्भरता पर दिया जोर

    भागवत ने कहा, 'आत्मनिर्भरता को अपने घर से शुरू करें। जब स्वदेशी की बात करते हैं तो लगता है कि विदेशों से संबंध नहीं रहेंगे। ऐसा नहीं है। अंतरराष्ट्रीय व्यापार तो होगा, लेकिन इसमें दबाव नहीं, स्वेच्छा होना चाहिए। इसलिए स्वदेशी का पालन करना है। अपने घर की चौखट के अंदर अपनी भाषा और अपनी वेशभूषा चाहिए। भाषा, भूषा, भजन, भोजन अपने घर के अंदर अपना, अपनी परंपरा का चाहिए। जहां आवश्यक है, अपनी भाषा के शब्द प्रयोग करो।'

    उन्होंने कहा, 'आज देश के लिए चौबीस घंटे जीने की आवश्यकता है। इसी तरह छोटी-छोटी बातों का ध्यान रखना होगा। यह सोचें कि मुझसे, मेरे घर से शुरू होगा तो देश में जाएगा, तब दुनिया को भारत में दिखेगा। इन सभी पर विचार चल रहा है। निर्णय प्रतिनिधि सभा में होना है, लेकिन इनमें से पंच परिर्वतन तो होना ही होना है। दुनिया अपनेपन से चलती है, सौदे से नहीं चल सकती। यह करना है तो इक्के-दुक्के का काम नहीं, एक पूरा राष्ट्र इसमें लगना चाहिए।'

    जो दूरियां बनी हैं, उन्हें पाटने के लिए दोनों तरफ से कुछ करने की आवश्यकता है। वह होने के लिए संवाद बने, परस्पर अविश्वास को पाटकर निशंक होकर सब एक राष्ट्र के अंग के नाते अपनी विविधता के बावजूद आगे बढ़ें। उसके लिए भी हम संभल-संभल कर कदम बढ़ाने की बात कर रहे हैं। ऐसा विचार कर रहे हैं। स्थानीय स्तर पर ऐसे प्रतिमान बन रहे हैं, लेकिन उसके आधार पर राष्ट्रीय स्तर पर ऐसा चिंतन बनाना है। मनुष्य को धर्म के लिए त्याग करना होता है और धर्म की रक्षा करने से सबकी रक्षा होती है।

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