'आतंक और अराजकता की गिरफ्त में बांग्लादेश'; शेख हसीना का बड़ा खुलासा- यूनुस राज में क्यों जल रहा देश?
Sheikh Hasina exclusive Interview: बांग्लादेश की अपदस्थ पीएम शेख हसीना ने दैनिक जागरण को ऑनलाइन इंटरव्यू दिया। इस दौरान उन्होंने अंतरिम सरकार पर तीख ...और पढ़ें

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जयप्रकाश रंजन, नई दिल्ली। पिछले 17 महीनों से बांग्लादेश की अपदस्थ प्रधानमंत्री शेख हसीना भारत में किसी अज्ञात स्थान पर हैं। इस दौरान वह चुपचाप देख रही हैं कि जिस देश को आर्थिक विकास की एक नई राह पर वह ले कर गईं, वह धीरे-धीरे अराजकता व अतिवादियों की गिरफ्त में फंस चुका है।
मोहम्मद यूनुस की अंतरिम सरकार बांग्लादेश की आर्थिक, सामाजिक और कूटनीतिक नीतियों में 360 डिग्री का बदलाव ला चुकी हैं। भारत के साथ बांग्लादेश के रिश्ते लगातार खराब हो रहे हैं। पड़ोसी देश में चल रही इस उथल-पुथल के बीच शेख हसीना ने दैनिक जागरण को ऑनलाइन इंटरव्यू दिया, जिसमें वह साफ कहती हैं कि बांग्लादेश में आतंक के जरिए डराने व धमकाने की राजनीति का बोलबाला है।
पढ़ें शेख हसीना से बातचीत के मुख्य अंश...
सवाल- शरीफ उस्मान हादी की हत्या की जांच और उसके बाद कानून -व्यवस्था को लेकर अंतरिम सरकार की भूमिका को आप कैसे देखती हैं?
जवाब- शरीफ उस्मान हादी की हत्या पर अंतरिम सरकार की प्रतिक्रिया इस बात का प्रमाण है कि यूनुस के नेतृत्व में बांग्लादेश में कानून-व्यवस्था पूरी तरह चरमरा चुकी है। हादी की मृत्यु बीएनपी, जमात और एनसीपी के बीच चुनावी प्रतिद्वंद्विता से उपजे संघर्ष का दुखद परिणाम थी।
मुझे अपने देश में फैल रही इस अराजकता से गहरा आघात पहुंचा है। ये घटनाएं एक ऐसी अलोकतांत्रिक सरकार का स्वाभाविक और भयावह नतीजा हैं, जिसने चरमपंथियों को ताकत दी है।
मैं हादी की हत्या की कड़ी निंदा करती हूं और उसके बाद में हुई हिंसा की भी भर्त्सना करती हूं। जो समय शोक और संवेदना का होना चाहिए था, उसे चरमपंथियों ने हमारे लोकतांत्रिक संस्थाओं को नष्ट करने के बहाने के रूप में इस्तेमाल किया।
इसमें देश के दो सबसे बड़े मीडिया संस्थानों पर हमले शामिल हैं, जिससे न केवल पत्रकारों की जान खतरे में पड़ी, बल्कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और स्वतंत्र मीडिया जैसे मूल्यों पर भी आघात हुआ।
हमारी सरकार के कार्यकाल में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का स्वागत किया गया। अखबार और पत्रकार बिना डर और हस्तक्षेप के काम करते थे। असहमति की आवाजों को दबाया नहीं गया, बल्कि सुना गया। हादी की स्मृति का सम्मान मीडिया पर हिंसक दमन या हमारे सबसे करीबी अंतरराष्ट्रीय सहयोगी के खिलाफ जहरीले भाषणों से नहीं किया जा सकता।

सवाल: अंतरिम सरकार ने हिंसा और राजनीतिक साजिश के आरोपों को कैसे डील किया है, इससे स्थिरता बनाए रखने की उसकी क्षमता के बारे में क्या पता चलता है?
जवाब- जब किसी सरकार के पास वैधता नहीं होती तो सामान्य कानून-व्यवस्था की समस्याएं भी राष्ट्रीय संकट बन जाती हैं। हालात को शांत करने, देश को एकजुट करने और तेज व विश्वसनीय जांच कराने के बजाय अंतरिम सरकार ने संदेह और गुस्से को बढ़ने दिया है। यह ऐसी सरकार है जो बुनियादी व्यवस्था भी कायम नहीं रख पा रही है।
इसी सरकार ने भयानक हिंसा के दोषियों को 'जुलाई योद्धा' कहकर महिमामंडित किया और उन्हें पूरी छूट दे दी, जिससे पीड़ितों और उनके परिवारों को न्याय नहीं मिल सका। फिर जब वही आतंकी सच लिखने वाले पत्रकारों के दफ्तरों में तोड़फोड़ और आगजनी करते हैं और सरकारी अर्धसैनिक बल मूकदर्शक बने रहते हैं तो किसी को हैरानी नहीं होनी चाहिए। यह शासन नहीं हैं, यह आतंक के जरिये डराने-धमकाने की राजनीति है।
सवाल: एक और छात्र नेता को गोली मारे जाने से क्या मौजूदा प्रशासन में लक्षित हिंसा के किसी पैटर्न का संकेत मिलता है, अल्पसंख्यकों की सुरक्षा की स्थिति का कैसे आकलन करती हैं आप?
जवाब- यह साफ है कि बांग्लादेश आज चरमपंथी ताकतों के रहमोकरम पर है, जिनका एकमात्र उद्देश्य अराजकता फैलाना और राजनीतिक विभाजन को गहरा करना है। पिछले 18 महीनों में हम एक पूरी तरह अलोकतांत्रिक सरकार के हाथों कभी स्थिर रहे एक देश को व्यवस्थित रूप से बर्बाद होते देख रहे हैं।
आज बांग्लादेश में रोजाना अमानवीय हिंसा आम बात हो गई है। अधिकारी या तो आंख मूंद लेते हैं या फिर इन अत्याचारों को खुला समर्थन देते हैं। यूनुस अवामी लीग पर अस्थिरता फैलाने का आरोप लगाते हैं, जबकि खुद उनकी सरकार ने दोषी आतंकवादियों को रिहा किया, वैध विपक्षी दलों पर प्रतिबंध लगाया, सैकड़ों निर्दोष लोगों को झूठे मामलों में गिरफ्तार किया और धार्मिक अल्पसंख्यकों, वकीलों और पत्रकारों के खिलाफ हिंसा को बढ़ावा दिया।
मेरी सरकार के समय अल्पसंख्यकों की सुरक्षा एक संवैधानिक जिम्मेदारी थी और हमें इस बात पर गर्व था कि हम एक विभाजित क्षेत्र में धर्मनिरपेक्षता का उदाहरण थे। बार-बार अंतरिम सरकार ने साबित किया है कि उसे धार्मिक अल्पसंख्यकों की परवाह नहीं। हिंदुओं, बौद्धों, ईसाइयों और अहमदिया मुसलमानों पर हमले आम हो चुके हैं, लेकिन सरकार या तो इनकार करती है या इन्हें कमतर दिखाती है।
वह इन्हें रोकने में पूरी तरह विफल रही है। इस तरह की हिंसा न केवल देश को अंदर से अस्थिर करती है, बल्कि भारत जैसे पड़ोसी देशों के साथ हमारे अंतरराष्ट्रीय रिश्तों को भी नुकसान पहुंचाती है, जिन्हें हमने बड़ी मेहनत से बनाया था।

सवाल: हालिया प्रदर्शनों में भारत-विरोधी नारों और भारतीय उच्चायोग की ओर मार्च को आप कैसे देखती हैं?
जवाब- यह दुश्मनी उन चरमपंथियों द्वारा गढ़ी गई है, जिन्हें यूनुस ने सत्ता में बैठाया और संरक्षण दिया। ये घटनाएं खतरनाक और गैर-जिम्मेदाराना हैं और बांग्लादेश के लोगों के हितों के बजाय एक कट्टरपंथी सरकार की वैचारिक कल्पनाओं को पूरा करती हैं।
कोई भी जिम्मेदार सरकार राजनयिक मिशनों की सुरक्षा करती है और अपने सबसे पुराने सहयोगियों को धमकी नहीं देती। लेकिन यह सरकार जिम्मेदार नहीं हैं, यह एक अलोकतांत्रिक तानाशाही है, जिसके पास न अनुभव है और न ही विदेश नीति बदलने का कोई जनादेश।जब बांग्लादेश के लोग स्वतंत्र रूप से मतदान कर पाएंगे, तब हमारी विदेश नीति चरमपंथियों के हाथों से निकलकर फिर से राष्ट्रीय हितों की सेवा करेगी।

सवाल: भारत-विरोधी भावनाएं द्विपक्षीय संबंधों को कैसे प्रभावित कर रही हैं और इन्हें कौन बढ़ावा दे रहा है?
जवाब- भारत हमारा सबसे करीबी पड़ोसी और सबसे महत्वपूर्ण रणनीतिक साझेदार है। दोनों देशों के बीच दशकों से बना विश्वास किसी भी अस्थायी सरकार से कहीं अधिक मजबूत है। हमारे शासनकाल में हमने 'सबसे दोस्ती, किसी से दुश्मनी नहीं' के सिद्धांत पर काम किया, जिससे क्षेत्रीय सहयोग मजबूत हुआ।
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यूनुस के सहयोगियों की आक्रामक भाषा बांग्लादेश के हितों को स्थायी नुकसान पहुंचाएगी और दशकों की मेहनत से बने रिश्तों को कमजोर करेगी। ये विचार जनता की इच्छा नहीं दर्शाते, क्योंकि यूनुस के पास कोई लोकतांत्रिक समर्थन नहीं है।
इन्हें उन चरमपंथी ताकतों और राजनीतिक अवसरवादियों द्वारा बढ़ावा दिया जा रहा है, जो अराजकता और टकराव से फायदा उठाते हैं। ऐसी सरकार जो इस तरह की बयानबाजी को सहन करती है या उसका इस्तेमाल करती है, वह देश की संप्रभुता, सुरक्षा और अंतरराष्ट्रीय प्रतिष्ठा की रक्षा करने में पूरी तरह असफल है।

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