'राष्ट्रपति ने सलाह मांगी तो दिक्कत क्या', प्रेसीडेंशियल रिफरेंस पर सुनवाई करते हुए SC ने सरकार की दलीलों पर क्या कहा?
सुप्रीम कोर्ट में प्रेसीडेंशियल रिफरेंस पर सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार ने विधेयकों पर राज्यपाल के अधिकारों का समर्थन किया। कोर्ट ने पूछा कि क्या निर्वाचित सरकारें गैर-निर्वाचित राज्यपालों पर निर्भर हैं। सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने राज्यपाल की शक्तियों का बचाव किया जबकि कोर्ट ने संविधान निर्माताओं की अपेक्षाओं पर सवाल उठाया। मेहता ने कहा कि राज्यपाल विधेयकों को रोक सकते हैं।

जागरण ब्यूरो, नई दिल्ली। प्रेसीडेंशियल रिफरेंस पर चल रही सुनवाई के दौरान वैसे तो केंद्र सरकार की ओर से विधेयकों पर मंजूरी और उन्हें रोकने के राज्यपाल के विवेकाधिकार और शक्तियों पर पूरी पुख्तगी से पक्ष रखा गया लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने भी कुछ सवाल पूछे।
जब केंद्र की ओर से ये कहा गया कि राज्यपाल को किसी भी विधेयक को स्थाई तौर पर रोक लेने का अधिकार है तो कोर्ट ने सवाल किया कि अगर बिल वापस किए बगैर हमेशा के लिए रोके जा सकते हैं तो क्या निर्वाचित सरकारें गैर निर्वाचित राज्यपाल की मर्जी पर नहीं निर्भर होंगी।
क्या देश संविधान निर्माताओं की उन अपेक्षाओं पर खरा उतरा है: कोर्ट
इसी तरह जब केंद्र की पैरोकारी कर रहे सालिसिटर जनरल तुषार मेहता ने राज्यपाल की नियुक्ति, संवैधानिक शक्तियों और अधिकारों का जिक्र करते हुए संबंधित संवैधानिक प्रविधानों पर संविधान सभा में हुई बहस का जिक्र किया तो शीर्ष अदालत ने पूछा कि क्या देश संविधान निर्माताओं की उन अपेक्षाओं पर खरा उतरा है, कि राज्यपाल और राज्य सरकार के बीच सामंजस्य होगा और क्या सामंजस्य है।
सॉलिसिटर जनरल सवाल को यह कह कर टाल गए कि वह इन प्रविधानों का जिक्र दूसरे संदर्भ में कर रहे हैं। मेहता ने विधेयकों पर निर्णय लेने के राज्यपाल के विवेकाधिकार पर जोर देते हुए कहा कि इस शक्ति के बगैर राज्यपाल का पद घट कर पोस्टमैन के समान रह जाएगा। हालांकि कोर्ट ने सुनवाई के दौरान ये भी कहा कि किसी भी संवैधानिक अथारिटी को शक्ति दी जाती हैं तो ये माना जाता है कि वे उसका ठीक से पालन करेंगीं।
सॉलिसिटर जनरल ने कहा कि हां वह शक्तियों का इस्तेमाल मनमाने ढंग से नहीं करेगी। लेकिन सीजेआइ ने फिर कहा कि मनमाने ढंग से भी काम करे तो भी इस आधार पर प्रविधान को चुनौती नहीं दी जा सकती। सीजेआइ ने कहा कि इसीलिए उन्होंने शुरुआत में ही कहा था कि इस मामले में राजनीति नहीं होनी चाहिए कोर्ट संविधान की व्याख्या करेगा।
मामले में गुरुवार को भी बहस जारी रहेगी। प्रधान न्यायाधीश बीआर गवई की अध्यक्षता वाली पांच न्यायाधीशों की संविधान पीठ प्रेसीडेंशियल रिफरेंस पर सुनवाई कर रही है। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने प्रेसीडेंशियल रिफरेंस भेजकर 14 संवैधानिक सवालों पर सुप्रीम कोर्ट से राय मांगी है। सालिसिटर जनरल तुषार मेहता ने केंद्र का पक्ष रखते हुए राज्यपाल के अधिकारों और शक्तियों का जिक्र करते हुए कहा कि राज्यपाल को किसी भी विधेयक को स्थाई रूप से रोक लेने का अधिकार है।
हालांकि इस अधिकार का उपयोग बहुत ही कम होना चाहिए। जब कोई विधेयक राज्यपाल के पास मंजूरी के लिए भेजा जाता है तो उनके पास चार विकल्प होते हैं। या तो विधेयक को मंजूरी दें, रोक लें, या फिर सदन को पुनर्विचार के लिए वापस भेज दें अथवा राष्ट्रपति को विचारार्थ भेज दें। सदन विधेयक पर पुनर्विचार करके उसे फिर मंजूरी के लिए भेजता है तब राज्यपाल उसे नहीं रोक सकते।
मेहता ने कहा कि राज्यपाल को विधेयक रोकने की एक स्थाई शक्ति है और एक अस्थाई शक्ति है। स्थाई शक्ति में राज्यपाल विधेयक स्थाई तौर पर रोक सकते हैं जिससे वह विधेयक स्वत: समाप्त हो जाएगा। राज्यपाल के गैर निर्वाचित होने की पीठ की टिप्पणी पर मेहता ने कहा कि राज्यपाल कोई डाकिया नहीं है बल्कि वह भारत सरकार का प्रतिनिधित्व करते हैं, उन्हें राष्ट्रपति द्वारा नियुक्त किया जाता है।
राष्ट्रपति मंत्रिपरिषद की सलाह पर काम करते हैं जो कि संसद के प्रति उत्तरदायी होती है। राज्यपाल के विवेकाधिकार पर मेहता ने कहा कि कई बार बिल ऐसा हो सकता है जिसे मंजूरी नहीं दी जा सकती हो।
उदाहरण के लिए अगर देश तय करता है कि वह किसी देश से व्यापार और ट्रेड नही करेगा लेकिन अगर कोई राज्य विधानसभा बिजनेस और ट्रेड से संबंधित बिल पास करती है तो यह विषय राज्य सूची का है लेकिन मामला विदेश मंत्रालय के अधिकार क्षेत्र में आता है। तो ऐसे बिल को राज्यपाल मंजूरी नहीं दे सकते।
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