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    'पारिवारिक विश्वास की नींव को किया तार-तार', SC ने अपराधी पिता को नहीं दी राहत, इस श्लोक का भी किया जिक्र

    Updated: Wed, 06 Aug 2025 11:21 PM (IST)

    सुप्रीम कोर्ट ने नाबालिग बेटी से दुष्कर्म के मामले में पिता की सजा बरकरार रखते हुए कहा कि माता-पिता द्वारा यौन हिंसा पारिवारिक विश्वास को तोड़ती है। अदालत ने महिलाओं की गरिमा के साथ समझौता न करने की बात कही और हिमाचल प्रदेश को पीड़िता को 10.50 लाख रुपये मुआवजा देने का निर्देश दिया।

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    सुप्रीम कोर्ट ने यौन अपराध के मामले में नहीं दी पिता को राहत।

    पीटीआई, नई दिल्ली। नाबालिग बेटी से दुष्कर्म के लिए एक व्यक्ति की सजा बरकरार रखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि माता-पिता की ओर से यौन हिंसा पारिवारिक विश्वास की नींव तोड़ती है।

    कोर्ट ने कहा कि महिलाओं की गरिमा से कोई समझौता नहीं किया जाना चाहिए और न्याय व्यवस्था सहानुभूति या प्रक्रियागत निष्पक्षता के नाम पर इसमें बार-बार दखलअंदाजी का अनुमति न दे।

    जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस संदीप कुमार की पीठ ने अपने चार अगस्त के आदेश में कहा कि न्याय केवल दोषसिद्धि तक सीमित नहीं होना चाहिए और इसमें क्षतिपूर्ति भी शामिल होनी चाहिए। लिहाजा शीर्ष अदालत ने हिमाचल प्रदेश को मुआवजे के रूप में पीडि़ता को 10.50 लाख रुपये का भुगतान करने का निर्देश भी दिया।

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    किस मामले की सुनवाई कर रही थी पीठ?

    पीठ हिमाचल प्रदेश हाई कोर्ट के उस फैसले के विरुद्ध पिता की अपील पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण अधिनियम, 2012 की धारा-6 (यौन उत्पीड़न) और आइपीसी की धारा-506 (आपराधिक धमकी) के तहत उसकी दोषसिद्धि व सजा को बरकरार रखा गया था।

    अदालत ने आदेश में क्या कहा?

    शीर्ष अदालत ने आदेश में कहा, ''माता-पिता की ओर से की गई यौन हिंसा एक विशिष्ट श्रेणी का अपराध है जो पारिवारिक विश्वास की नींव को तार-तार कर देती है। इसकी बोल और लिखकर दोनों तरह से कड़ी निंदा की जानी चाहिए। घर एक संरक्षण स्थल होना चाहिए, उसे अकथनीय सदमे का स्थान बनने की अनुमति नहीं दी जा सकती। अदालतों को स्पष्ट संकेत देना चाहिए कि ऐसे अपराधों पर समान रूप से कठोर न्यायिक प्रतिक्रिया व्यक्त की जाएगी।''

    पीठ ने कहा, ''जब किसी बच्ची को उसके ही पिता के ऐसे अपराध को सहने के लिए मजबूर होना पड़ता है, तो कानून को दृढ़ और अडिग रुख अपनाना चाहिए। ऐसे अपराधों के लिए सजा में कोई रियायत नहीं दी जा सकती जो सुरक्षित स्थान के रूप में परिवार की अवधारणा को ही नष्ट कर देते हैं। जब एक पिता, जिससे ढाल, संरक्षक व नैतिक दिशानिर्देशक होने की उम्मीद की जाती है, बच्चे की शारीरिक अखंडता व गरिमा को तार-तार करता है, तो यह विश्वासघात सिर्फ व्यक्तिगत नहीं, बल्कि संस्थागत भी होता है। कानून पुनर्वास या सुधार की आड़ में ऐसे कृत्यों को न तो माफ करता है और न ही कर सकता है।''

    कोर्ट ने कहा कि इस तरह के मामले में नरमी बरतने की याचिका पर विचार न केवल अनुचित होगा, बल्कि यह कमजोरों की रक्षा करने के न्यायालय के अपने संवैधानिक कर्तव्य के साथ विश्वासघात होगा। ऐसे अपराध को माफ करना न्याय का उपहास होगा और याचिका पर विचार करने का मतलब देश के हर बच्चे से किए गए संवैधानिक वादे के साथ विश्वासघात होगा। यह नारीत्व की पवित्रता का न्यायिक अपमान होगा और हर उस मां के लिए आघात होगा जो अपने बच्चे को न्याय में विश्वास करना सिखाती है।

    पीठ ने मनुस्मृति के श्लोक का हवाला देते हुए कहा कि जहां स्त्रियों का सम्मान होता है, वहां देवत्व पनपता है और जहां उनका अपमान होता है, वहां सभी कर्म निष्फल हो जाते हैं।

    शीर्ष अदालत ने कहा कि यह श्लोक न केवल एक सांस्कृतिक सिद्धांत, बल्कि एक संवैधानिक दृष्टि को भी दर्शाता है। अदालत ने अंतरिम जमानत की याचिका यह कहते हुए खारिज कर दी, ''हमारा न्यायिक विवेक, दोषसिद्धि के बाद अंतरिम जमानत की याचिका पर लापरवाही बरतने की अनुमति नहीं देता।''

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