स्वामी विवेकानंद: वो 5 जगहें जहां आज भी गूंजती है उनके कदमों की आहट; क्या आपने देखी है 'नरेंद्र' की ये दुनिया?
Swami Vivekananda: 5 Places Echoing His Legacy & Philosophy: 12 जनवरी को स्वामी विवेकानंद की जयंती है, जो हमें उन ऐतिहासिक स्थलों की याद दिलाती है जहा ...और पढ़ें

किताबों में नहीं, इन 5 जगहों पर मिलते हैं असली विवेकानंद; जहां गुरु के एक जवाब ने बदल दी नरेंद्र की दुनिया। फाइल फोटो
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जागरण टीम, नई दिल्ली। कोलकाता की संकरी गलियों में कदम रखते ही अगर कोई स्वर आज भी हवा में घुला महसूस होता है तो वह है- 'उत्तिष्ठत जाग्रत' का आह्वान। यह स्वर किसी स्मारक की दीवारों में कैद नहीं, बल्कि उन स्थानों की मिट्टी में रचा-बसा है, जहां नरेन्द्रनाथ दत्त ने स्वयं को स्वामी विवेकानंद के रूप में पहचाना।
आज यानी 12 जनवरी को स्वामी विवेकानंद की जयंती केवल एक महान संन्यासी की स्मृति नहीं, बल्कि उन स्थलों की यात्रा का निमंत्रण है, जहां भारत ने आधुनिक आत्मविश्वास और सेवा का मार्ग पाया। विवेकानंद को जानना हो तो किताबें पर्याप्त नहीं, उन जगहों तक जाना जरूरी है, जहां विचार जीवन बन गए। कोलकाता और काशी केवल नक्शे पर बिंदु नहीं, बल्कि चेतना के पड़ाव हैं। यहां जाना केवल यात्रा नहीं, स्वयं से संवाद है।
विवेकानंद आज भी युवाओं को आत्मविश्वास, अनुशासन और सेवा का मार्ग दिखाते हैं। उनकी स्मृतियां संग्रहालयों में कैद नहीं, वे गलियों, घाटों और पर्वतों में आज भी सांस लेती हैं। इस 12 जनवरी को स्वामी विवेकानंद को केवल स्मरण न करें, बल्कि उन स्थानों की ओर कदम बढ़ाएं, जहां उनके विचार जन्मे व आज भी जीवित हैं।
कोलकाता: सिर्फ जन्मस्थल नहीं, यह स्वामी के चिंतन की प्रयोगशाला है
कोलकाता केवल विवेकानंद का जन्म स्थल नहीं, बल्कि उनके चिंतन की प्रयोगशाला है। उत्तर कोलकाता का शिमला स्ट्रीट स्थित पैतृक आवास, जोकि आज का स्वामी विवेकानंद सरणी है। उस बालक नरेन्द्र का साक्षी है, जिसने संगीत, दर्शन और विज्ञान को एक साथ साधा। यहां रखी पुस्तकें, पत्र और वायलिन बताते हैं कि विवेकानंद के लिए आध्यात्मिकता पलायन नहीं थी, बल्कि आधुनिकता के साथ संवाद थी।
यह भूमि बताती है कि वह संन्यासी होने से पहले एक जाग्रत नागरिक थे, जिनके प्रश्न तर्क से उपजते थे और उत्तर अनुभूति से दक्षिणेश्वर काली मंदिर विवेकानंद के जीवन का निर्णायक पड़ाव है। रामकृष्ण परमहंस से पूछा गया प्रश्न- 'क्या आपने ईश्वर को देखा है ? ' और फिर मिले सीधे, निर्भीक उत्तर ने उनके जीवन की दिशा बदल दी।

पंचवटी और नहावटखाना आज भी उस क्षण के साक्षी हैं, जब संशय ने सत्य का हाथ थामा। यहीं से विवेकानंद का धर्म अंधविश्वास नहीं, अनुभव और विवेक का पर्याय बन गया। काशीपुर उद्यानबाटी और वराहनगर मठ विवेकानंद के जीवन के सबसे कठोर, पर निर्णायक अध्याय हैं। काशीपुर में गुरु - सान्निध्य ने उन्हें संकेत दिया- तुम्हारा काम बहुत बड़ा है।'
यहीं से लोक जागरण का बीज पड़ा। गुरु के महाप्रयाण के बाद वराहनगर के जर्जर मकान मैं कठोर साधना के बीच रामकृष्ण मिशन का अंकुर फूटा । यह स्थल सिखाता है कि महान संस्थाएं सुविधाओं से नहीं, संकल्प से खड़ी होती हैं। बाग बाजार की गलियों में विवेकानंद को 'दरिद्र नारायण' के दर्शन हुए। यहीं सेवा उनके दर्शन की धुरी बनी- 'मनुष्य की सेवा ही ईश्वर की पूजा है।' यही करुणा उन्हें हिमालय की कंदराओं और फिर पश्चिम के मंचों तक ले गई।
कश्मीर: धरती पर स्वर्ग
स्वामी विवेकानंद के जीवन और उनकी यात्राओं का वर्णन कश्मीर के बिना अधूरा है। सिस्टर निवेदिता से उन्होंने कहा था कि कश्मीर के सिवा किसी और जगह को छोड़ने का उन्हें दुख नहीं हुआ। इस धरती पर यह स्वर्ग है।

अल्मोड़ा : विचारों की साधना
सांस्कृतिक नगरी अल्मोड़ा का प्राकृतिक और आध्यात्मिक वातावरण धर्म, अध्यात्म, कला, साहित्य और संगीत के जिज्ञासुओं को आकर्षित करता रहा है। वर्ष 1890 में पहली बार अल्मोड़ा आगमन के साथ ही स्वामी विवेकानंद का इस नगर से गहरा भावनात्मक जुड़ाव बन गया।
उन्होंने 1890, 1897 और 1898 में यहां की यात्राएं कीं। यह उनके विचारों की साधना का केंद्र रहा है। हिमालयी अल्मोड़ा विवेकानंद की साधना और सृजन का महत्वपूर्ण अध्याय रहा है। 12 जनवरी 1863 को जन्मे नरेन्द्रनाथ की मृत्यु चार जुलाई 1902 को हो गई थी।
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बेलूर मठ : यहीं बीते जीवन के अंतिम दिन
हुगली तट पर स्थित बेलूर मठ विवेकानंद के विचारों का स्थापत्य रूप है। इसके मंदिर में हिंदू, बौद्ध, ईसाई और इस्लामी तत्वों का समन्वय उनके 'सर्वधर्म समभाव' की मौन घोषणा है। यहीं उन्होंने जीवन की अंतिम सांस ली करता मानो गंगा की धारा विलीन होकर भी अनंत काल तक मार्गदर्शक बने रहना चाहते हों।

काशी : इसी नगरी ने स्वामी के भारत बोध को दी धार
विवेकानंद के लिए काशी केवल धार्मिक नगर नहीं, बल्कि भारत का आत्मा था। 1887 से 1902 तक के प्रवासों में काशी ने उनके भारत बोध को धार दी। यहीं शिकागो जाने का संकल्प आकार लेता है - 'आदर्श की रामकृष्ण मिशन जागरण प्राप्ति करूंगा, नहीं तो देह त्याग दूंगा।' दुर्गाकुंड के जंगलों में बंदरों की घटना- रुको, सामना करो'- विवेकानंद का जीवन-सूत्र बन जाती है। काशी में प्रेरित युवाओं द्वारा शुरू 'होम आफ सर्विस' आज भी मानव सेवा की जीवंत मिसाल है।
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(इनपुट- कोलकाता से जयकृष्ण वाजपेयी, वाराणसी से शैलेश अस्थाना, श्रीनगर से नवीन नवाज और अल्मोड़ा से चंद्रशेखर द्विवेदी)

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