कौन था ‘बुचर ऑफ बंगाल’, टीका खान से लेकर सुहरावर्दी तक की विवादित इतिहास कथा
'बंगाल का कसाई' कहे जाने वाले दो विवादित व्यक्तियों, टिक्का खान और एचएस सुहरावर्दी ने अपने दौर में क्रूरता की सभी हदें पार कर दी थीं। टिक्का खान को 1971 के नरसंहार के लिए जिम्मेदार माना जाता है, जबकि सुहरावर्दी ने 1946 में कलकत्ता में हिंसा भड़काई और न जाने कितने बेगुनाहों की मौत का जिम्मेदार बना। इन दोनों व्यक्तियों को उनकी क्रूरता के लिए जाना जाता है और आज भी बंगाल के इतिहास में काले धब्बे के रूप में याद किए जाता है।

टिक्का खान और सुहरावर्दी का काला इतिहास।
डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। 'बुचर ऑफ बंगाल' यानी बंगाल का कसाई, यह कहावत दक्षिण एशिया के इतिहास में सबसे डरावने चैप्टर से जुड़ी हुई है। अचरज की बात यह है कि यह कहावत एक नहीं बल्कि दो लोगों के लिए इस्तेमाल की जाती है। एक सेना का जनरल और दूसरा राजनेता। इतिहास के पन्नों में चंगेज खान और तैमूरलंग की बर्बरता तो दर्ज है ही लेकिन इन दोनों की बर्बरता की कहानी ने ही इन्हें 'कसाई' की उपाधि दिलाई।
दशकों से अलग इनकी कहानियां आज भी बहस छेड़ती हैं और एक सिहरन पैदा करती हैं। इन दोनों कसाइयों के नाम हैं- टिक्का खान और सुहरावर्दी। इन्हें दुनिया बंगाल का कसाई कहती है। इन लोगों ने बर्बरता की सारी हदें पार करते हुए हजारों-लाखों लोगों को मौत के घाट तो उतारा ही, महिलाओं के साथ भी घनघोर अत्याचार किए। उस दौर के लोग आज भी इनका नाम सुनकर सिहर उठते हैं।
बंगाल के कसाइयों की कहानी
टिक्का खान- नरसंहार का जिम्मेदार जनरल
1971 में जब पूर्वी पाकिस्तान में अशांति बढ़ी तो जनरल टिक्का खान ने सबसे हिंसक ऑपरेशन में से एक को अंजाम दिया। पूर्वी पाकिस्तान के मिलिट्री कमांडर और बाद में गवर्नर के तौर पर टिक्का ने ऑपरेशन सर्चलाइट का नेतृत्व किया, जिसे बंगाली राष्ट्रवादी आंदोलन को कुचलने के लिए डिजाइन किया गया था।
इस ऑपरेशन की वजह से बड़े पैमाने पर हत्याएं हुईं, गांव तबाह हुए और पढ़े-लिखे लोगों, पत्रकारों और छात्रों को निशाना बनाकर हमले किए गए। इस ऑपरेशन में बचे लोग इसे बांग्लादेश लिबरेशन वॉर और उसके बाद हुए नरसंहार के सबसे बुरे दौर में से एक के तौर पर याद करते हैं। इस दौरान टिक्का ने क्रूरता की सभी हदें पार कर दीं, जिसकी वजह से ही उसे 'बंगाल का कसाई' कहा जाता है।
एचएस सुहरावर्दी- कलकत्ता हत्याकांड का दागी नेता
1971 से बहुत पहले एक और क्रूर नेता को 'कसाई' का तगमा मिल चुका है। वो नाम है हुसैन शहीद सुहरावर्दी, जो अविभाजित बंगाल का आखिरी प्रीमियर और बाद में पाकिस्तान का प्रधानमंत्री बना। इस नाम को भी भारतीय इतिहास में काले धब्बे के तौर पर याद किया जाता है।
अगस्त 1946 में कलकत्ता के अंदर वो खूनी खेल खेला गया जिसे ग्रेट कलकत्ता किलिंग्स के नाम से जाना जाता है। पहले कभी भी इस तरह का सांप्रदायिक खून-खराबा नहीं हुआ। शहर में हुए दंगों में हजारों लोग मारे गए। सुहरावर्दी हिंसा को नियंत्रित करने में नाकाम रहा और उसने पुलिस का गलत इस्तेमाल करके तनाव बढ़ने दिया। इन आरोपों के कारण भारत में, विशेषकर पश्चिम बंगाल में कई लोगों ने उसे असली 'बंगाल का कसाई' करार दिया।

इन दोनों नामों को उस दौर के सबसे हिंसक और क्रूर शासकों के रूप में जाना जाता है। इन दो नामों की वजह से बंगाल के अतीत को याद करते हुए उस दौर के लोग सिहर उठते हैं। 'बंगाल का कसाई' नाम आज भी सबसे बुरी यादों की निशानी है। ऐसी यादें जो पूरे दक्षिण एशिया में राजनीतिक बातचीत, ऐतिहासिक कहानियों और लोगों की राय पर असर डालती रहती हैं।

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