शिंदे को चुनौती और बीजेपी से सीधा मुकाबला... BMC में हार के बाद क्या होगा उद्धव का अगला कदम?
मुंबई बीएमसी पर नियंत्रण खोने के बावजूद शिवसेना (यूबीटी) ने 74 सीटें जीतकर अपनी प्रासंगिकता बरकरार रखी है। उद्धव ठाकरे ने एकनाथ शिंदे और बीजेपी की चुन ...और पढ़ें

बीएमसी हाथ से गई, लेकिन मुंबई में उद्धव ठाकरे की पकड़ बरकरार (फाइल फोटो)
डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। मुंबई की सबसे अमीर नगर निगम बीएमसी पर शिवसेना (UBT) का कंट्रोल खत्म हो गया है, लेकिन इसके बावजूद उद्धव ठाकरे की राजनीति खत्म नहीं हुई है। बीएमसी चुनाव में शिवसेना (यूबीटी) ने अब तक 74 सीटें जीतकर यह दिखा दिया है कि मुंबई में मराठी मानूस की राजनीति का चेहरा अब भी वही हैं। बीजेपी की कड़ी चुनौती और एकनाथ शिंदे की कोशिशों के बीच उद्धव ठाकरे ने अपनी प्रासंगिकता बनाए रखी है।
मुंबई में एकनाथ शिंदे ने कुछ इलाकों में सेंध जरूर लगाई, लेकिन इससे ठाकरे परिवार की पकड़ कमजोर नहीं हुई। मराठी मानूस के सवाल पर शिवसेना (यूबीटी) आज भी बड़ी ताकत के रूप में उभरी है। वहीं, उद्धव ठाकरे के सहयोगी कांग्रेस ने अकेले चुनाव लड़ने का फैसला किया, जिससे ठाकरे गुट को अपने पारंपरिक वोट बैंक को मजबूत करने का मौका मिला।
शिवसेना के गढ़ माने जाने वाले इलाकों में मराठी वोटरों ने उद्धव ठाकरे पर भरोसा जताया। नतीजों में यह साफ दिखा कि शिवसेना (यूबीटी) ने सम्मानजनक प्रदर्शन किया है और पार्टी पूरी तरह हाशिये पर नहीं गई है।
बीएमसी हार का असर
बीएमसी पर नियंत्रण खोना शिवसेना (यूबीटी) के लिए बड़ा झटका है। पार्टी की शुरुआत से ही बीएमसी उसकी सबसे बड़ी ताकत और सत्ता का केंद्र रही है। शिवसेना हमेशा यह कहती रही है कि उसके गठबंधन की नींव ही बीएमसी पर पकड़ रही है।
हालांकि, एकनाथ शिंदे भले ही बड़ी संख्या में पार्षदों को अपने साथ ले गए हों, लेकिन इस चुनाव में उद्धव ठाकरे ने यह साबित कर दिया कि मुंबई में बाल ठाकरे की विरासत पर उनका ही नियंत्रण है। मुंबई की राजनीति में यह विरासत अब भी अहम मानी जाती है। नतीजों ने यह भी दिखाया कि शिंदे गुट की शिवसेना, शिवसेना (यूबीटी) से ज्यादा सीटें नहीं जीत पाई। इससे उद्धव ठाकरे की स्थिति मजबूत हुई है।
कांग्रेस के कमजोर प्रदर्शन के बाद उद्धव ठाकरे खुद को मुंबई में विपक्ष के मुख्य चेहरे के रूप में पेश कर पा रहे हैं। अब शिवसेना (यूबीटी) विपक्ष की भूमिका में सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी है।
इन नतीजों से मुंबई में बीजेपी और शिवसेना (यूबीटी) के बीच सीधा मुकाबला तय होता दिख रहा है। शिवसेना (यूबीटी) खुद को बीजेपी की तुलना में ज्यादा समावेशी हिंदुत्व की राजनीति करने वाली पार्टी बताती है, जबकि बीजेपी पर वह 'हार्डलाइन हिंदुत्व' का आरोप लगाती रही है।
राज ठाकरे की एमएनएस फिलहाल सीमित असर वाली पार्टी बनी हुई है। ऐसे में उद्धव ठाकरे के सामने सबसे बड़ी चुनौती अपनी पार्टी का विस्तार करना है। पहले 'मी मुंबईकर' जैसे अभियानों से उद्धव ठाकरे ने दिखाया है कि शिवसेना मुंबई में अपने पारंपरिक वोट से आगे भी बढ़ सकती है।
विस्तार की संभावना
कांग्रेस के कमजोर होने के बाद उद्धव ठाकरे के सामने अपना समर्थन आधार बढ़ाने का मौका है। इसमें मुस्लिम वोट एक अहम भूमिका निभा सकता है। आने वाले समय में यही रणनीति शिवसेना (यूबीटी) की राजनीति की दिशा तय कर सकती है।

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