ग्रीन फाइल सीक्रेट: बंगाल में सियासी हलचल तेज, क्या है दीदी बनाम ED की जंग का 2026 चुनाव कनेक्शन?
ममता बनर्जी की 'ग्रीन फाइल' को लेकर बंगाल में राजनीतिक भूचाल आ गया है। ईडी ने आई-पैक पर छापा मारा, जिस दौरान ममता बनर्जी ने हस्तक्षेप किया। ईडी ने कोय ...और पढ़ें
स्मार्ट व्यू- पूरी खबर, कम शब्दों में
जयकृष्ण वाजपेयी, कोलकाता। बंगाल की राजनीति के केंद्र में इस वक्त केवल एक ही रंग की चर्चा है- हरा। लेकिन यह तृणमूल कांग्रेस के झंडे वाला हरा नहीं, बल्कि मुख्यमंत्री ममता बनर्जी (दीदी) के हाथ में दिखी वह ‘ग्रीन फाइल’ है, जिसे लेकर देश की राजनीति में भूचाल आ गया है। विधानसभा चुनाव में महज तीन-चार माह ही बचा है और कोलकाता की सड़कों से लेकर दिल्ली की अदालत तक इस वक्त ‘दीदी बनाम ईडी’ की जंग छिड़ी हुई है।
तृणमूल की चुनावी रणनीतिकार संस्था आई-पैक (इंडियन पालिटिकल एक्शन कमेटी) के दफ्तर पर पड़े छापों ने एक ऐसी चिंगारी सुलगा दी है, जिससे 2026 के चुनावी समर की दिशा और दशा दोनों बदलने वाली है। बंगाल का राजनीतिक इतिहास गवाह रहा है कि यहां चुनाव से ठीक पहले कोई न कोई बड़ा धमाका जरूर होता है।
साल 2016 में नारद स्टिंग था। साल 2021 से पहले कोयला-मवेशी तस्करी और 2026 के मुहाने पर आई-पैक प्रकरण ने सियासी बिसात बिछा दी है। इस बार का घटनाक्रम पहले के तमाम विवादों से कहीं अधिक गंभीर और अभूतपूर्व है। भारतीय राजनीति के इतिहास में शायद यह पहला मौका है, जब किसी राज्य की मुख्यमंत्री ने ईडी की छापेमारी के दौरान स्वयं मौके पर पहुंचकर हस्तक्षेप किया हो।
कोलकाता के लाउड स्ट्रीट स्थित आई-पैक के सह संस्थापक प्रतीक जैन के आवास हो या फिर साल्टलेक स्थित बिल्डिंग की 11वीं मंजिल पर स्थित दफ्तर, जब ईडी की टीम वहां दस्तावेजों की खाक छान रही थी, तब मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का अपने पूरे लाव-लश्कर के साथ वहां पहुंचना और फिर एक लैपटाप तथा रहस्यमयी ‘ग्रीन फाइल’ लेकर बाहर निकलना, किसी हाई-वोल्टेज थ्रिलर फिल्म जैसा दृश्य था।
इस छह घंटे के ड्रामे ने न केवल जांच एजेंसी को बैकफुट पर धकेला, बल्कि एक ऐसा नैरेटिव सेट कर दिया जिसने केंद्र और राज्य के बीच संवैधानिक टकराव को चरम पर पहुंचा दिया है। ममता बनर्जी का तर्क बिलकुल सीधा है- वे इसे अपनी पार्टी की गोपनीयता और चुनावी रणनीति पर हमला बता रही हैं।
ममता ने क्या आरोप लगाया?
उनका कहना है कि भाजपा, ईडी के कंधे पर बंदूक रखकर तृणमूल की 2026 की चुनावी प्लानिंग चुराना चाहती है। शुक्रवार को कोलकाता की सड़कों पर ममता का पैदल मार्च और दिल्ली में तृणमूल सांसदों का गृह मंत्रालय के सामने प्रदर्शन इसी रणनीति का हिस्सा था। ममता की छवि हमेशा से एक ‘जुझारू’ और ‘संघर्षशील’ नेता की रही है, लेकिन विपक्ष इसे अलग चश्मे से देख रहा है।

भाजपा ने क्या आरोप लगाया?
भाजपा का आरोप है कि मुख्यमंत्री ने एक निजी कंसल्टेंसी फर्म के लिए कानून हाथ में लिया और सबूतों को नष्ट किया। भाजपा सांसद संबित पात्रा का यह बयान कि ‘ममता ने बंगाल को भारत के कानूनों से बाहर कर दिया है’, साफ संकेत देता है कि भाजपा इस बार ‘भ्रष्टाचार और अराजकता’ को ही अपना मुख्य हथियार बनाएगी। कानूनी मोर्चे पर यह लड़ाई अब सुप्रीम कोर्ट की दहलीज तक जा पहुंची है।
ईडी ने कलकत्ता हाई कोर्ट की सुनवाई का इंतजार किए बिना अनुच्छेद 32 के तहत सीधे शीर्ष अदालत का दरवाजा खटखटाया है। ईडी का आरोप है कि कोयला तस्करी की काली कमाई के 20 करोड़ रुपये हवाला के जरिए आई-पैक तक पहुंचे, जो 2022 के गोवा चुनाव में खर्च किए गए।
ईडी का क्या कहना है?
ईडी का आरोप है कि राज्य मशीनरी ने उन्हें जांच करने से रोका, जबकि बंगाल सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में कैविएट दाखिल कर अपना पक्ष सुने जाने की मांग की है। दूसरी ओर, कोलकाता और विधाननगर पुलिस ने ममता बनर्जी की शिकायत पर ईडी अधिकारियों के खिलाफ ही ‘डाटा चोरी’ की एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू कर दी है।
यह पूरी तरह से एक संवैधानिक गतिरोध है, जहां एक तरफ केंद्रीय जांच एजेंसी है और दूसरी तरफ राज्य की पूरी पुलिसिया शक्ति। सियासी गलियारों में सबसे बड़ा सवाल यह है कि इस धमाके से चुनावी फायदा किसे होगा? इस बार भाजपा सतर्क है। वह ममता के बजाय उनकी सरकार के भ्रष्टाचार, महिला सुरक्षा और प्रशासनिक विफलता को निशाना बना रही है। इस मुद्दे पर धुर विरोधी माकपा और भाजपा एक सुर में बोल रहे हैं।
माकपा मिला रही भाजपा से सुर
माकपा प्रदेश सचिव मोहम्मद सलीम का यह सवाल कि ‘एक निजी कंपनी के लिए मुख्यमंत्री को सड़क पर उतरने की क्या जरूरत थी’, ममता की छवि पर प्रहार करता है, लेकिन ममता भी कच्ची खिलाड़ी नहीं हैं। वे अच्छी तरह जानती हैं कि जब-जब उन पर हमला होता है, वे उसे ‘बंगाल की बेटी’ और बंगाली अस्मिता पर हमले के रूप में पेश कर सहानुभूति बटोरने में माहिर हैं।

फिलहाल, बंगाल में ‘ग्रीन फाइल’ और ‘डाटा चोरी’ का शोर थमने वाला नहीं है। आई-पैक प्रकरण ने ममता को एक बार फिर फ्रंटफुट पर खेलने का मौका दे दिया है, जहां वे खुद को केंद्र के ‘अत्याचार’ के खिलाफ लड़ती हुई अकेली योद्धा के रूप में पेश कर रही हैं।
यदि वे जनता को यह समझाने में सफल रहीं कि यह छापेमारी तृणमूल को हराने की साजिश थी, तो उन्हें भारी फायदा हो सकता है, लेकिन यदि भाजपा और वामपंथी दल यह साबित करने में सफल रहे कि ‘ग्रीन फाइल’ में भ्रष्टाचार के राज दफन थे, तो ममता के लिए 2026 की राह कांटों भरी हो सकती है।
फिलहाल, हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट का फैसला और आइ-पैक की डिजिटल फाइलों से निकलने वाले तथ्य ही बंगाल की राजनीति का ऊंट किस करवट बैठेगा, यह तय करेंगे।
यह भी पढ़ें- 'आइ-पैक राजनीतिक फर्म या TMC का गुप्त धन जुटाने का अड्डा'? भाजपा का ममता पर तीखा वार

कमेंट्स
सभी कमेंट्स (0)
बातचीत में शामिल हों
कृपया धैर्य रखें।