पंजाब में बच्चों के खिलाफ हो रहे अपराध पर हाईकोर्ट सख्त, किशोर न्याय अधिनियम लागू करने की मांग
पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय में एक जनहित याचिका दायर की गई है जिसमें पंजाब में बच्चों के खिलाफ हो रहे अपराधों पर चिंता जताई गई है। याचिका में किशोर न्याय अधिनियम 2015 को सख्ती से लागू करने की मांग की गई है। अदालत ने पंजाब सरकार और अन्य संबंधित अधिकारियों को नोटिस जारी कर जवाब तलब किया है।

राज्य ब्यूरो, चंडीगढ़। पंजाब में बच्चों के खिलाफ हो रहे जघन्य अपराधों के मद्देनजर, पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय में एक जनहित याचिका दायर की गई है।
याचिका में राज्य में मासूमों की हत्या, परित्याग और दुर्व्यवहार की हालिया घटनाओं पर चिंता जताई गई है और इन मामलों से निपटने के लिए किशोर न्याय (बच्चों की देखभाल और संरक्षण) अधिनियम, 2015 के सख्त कार्यान्वयन की मांग की गई है।
हाई कोर्ट ने याचिका पर सुनवाई करते हुए पंजाब सरकार, डीजीपी पंजाब व केंद्रीय बाल अधिकार आयोग को नोटिस जारी कर जवाब तलब किया है।
मोहाली निवासी कंवर पाहूल सिंह द्वारा दायर याचिका में कई घटनाओं का उल्लेख किया गया है, जिनमें से एक 3 अक्टूबर 2023 को जालंधर में हुई।
समाचार पत्रों की रिपोर्टों के अनुसार, गरीबी के कारण एक प्रवासी दंपति ने अपनी तीन नाबालिग बेटियों को कथित तौर पर जहर दे दिया और उनके शवों को एक ट्रंक में डाल दिया।
एक अन्य दुखद घटना का भी जिक्र किया गया है, जिसमें 22 मई 2025 को मोहाली के बलौंगी गांव में एक नवजात बच्ची को सड़क किनारे एक बाल्टी में छोड़ दिया गया था।
इसके अलावा, 18 अगस्त 2025 की एक और घटना का हवाला दिया गया है, जिसमें जालंधर में छह महीने की बच्ची की उसके नाना-नानी द्वारा कथित तौर पर गला घोंटकर हत्या कर दी गई थी।
याचिकाकर्ता ने इस बात पर जोर दिया कि ये घटनाएं दर्शाती हैं कि पंजाब में किशोर न्याय अधिनियम, 2015 के परविधान को प्रभावी ढंग से लागू नहीं किया जा रहा है।
याचिका में कहा गया है कि सरकार को अधिनियम के अनुच्छेद 35 के तहत पर्याप्त कदम उठाने चाहिए और इसके परविधानों के बारे में आम जनता, माता-पिता और अभिभावकों के बीच जागरूकता फैलानी चाहिए।
याचिका के अनुसार, इस तरह के अपराधों को रोकने और बच्चों के अधिकारों की रक्षा करने के लिए चाइल्ड वेलफेयर कमेटीज और अन्य संबंधित अधिकारियों को अपनी जिम्मेदारियों का पालन करना चाहिए।
याचिकाकर्ता ने यह भी बताया कि उन्होंने 22 मई 2025 को इन मुद्दों पर अधिकारियों को एक प्रतिनिधित्व भेजा था, लेकिन 60 दिनों की कानूनी समय सीमा बीत जाने के बाद भी कोई कार्रवाई नहीं हुई।
याचिकाकर्ता ने कोर्ट से आग्रह किया है कि वह जीवन और स्वतंत्रता का अधिकार के तहत बच्चों के अधिकारों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए तत्काल उपाय करे।
याचिका में अदालत से निर्देश जारी करने का अनुरोध किया गया है ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि भविष्य में इस तरह के मामले न हों और बच्चों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए सरकार को जवाबदेह ठहराया जा सके।
याची की दलील सुनने के बाद हाई कोर्ट ने सभी प्रतिवादी पक्ष को नोटिस जारी कर जवाब दायर करने का आदेश दिया है।
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