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    100 साल पुराना विष्णु मंदिर, जहां कछुए अर्पित करने से पूरी होती है मन्नत, बौद्ध धर्म से है गहरा कनेक्शन

    Updated: Fri, 09 Jan 2026 12:05 PM (IST)

    असम के हाजो में स्थित हयग्रीव माधव मंदिर में भगवान विष्णु को कछुए चढ़ाने की परंपरा है। जानिए इस 100 साल से भी पुराने मंदिर का बौद्ध धर्म से क्या कनेक्श ...और पढ़ें

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    100 साल पुराना विष्णु मंदिर (Shree Hayagriva Madhav Temple)

    स्मार्ट व्यू- पूरी खबर, कम शब्दों में

    धर्म डेस्क, नई दिल्ली। भारत के असम राज्य में कामरूप जिले के हाजो (Hajo) में स्थित श्री हयग्रीव माधव मंदिर न केवल अपनी वास्तुकला बल्कि अपनी अनोखी परंपराओं के लिए भी विश्व प्रसिद्ध है। मणिकूट पर्वत पर बना यह मंदिर सदियों से हिंदू और बौद्ध धर्म के लोगों के लिए आस्था का एक बड़ा केंद्र रहा है। यहां की सबसे खास बात यह है कि यहां श्रद्धालु भगवान विष्णु को प्रसन्न करने के लिए कछुए का चढ़ावा करते हैं।

    क्या आप जानते हैं मंदिर का पौराणिक महत्व?

    हयग्रीव माधव मंदिर का इतिहास अत्यंत प्राचीन है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, यहां भगवान विष्णु के 'हयग्रीव' अवतार (घोड़े के सिर वाले अवतार) की पूजा की जाती है। कहा जाता है कि भगवान विष्णु ने इसी स्थान पर मधु और कैटभ नाम के दोनों राक्षसों का वध किया था।

    इतिहासकारों के अनुसार, वर्तमान मंदिर का निर्माण 1583 में कोच राजा रघुदेव नारायण द्वारा कराया गया था। हालांकि, कुछ लोग इसे 100 साल से भी ज्यादा प्राचीन काल के ध्वस्त मंदिर का पुनर्निर्मित रूप मानते हैं। यह मंदिर पत्थरों से बना है और इसकी दीवारों पर हाथियों और अन्य पौराणिक आकृतियों की सुंदर नक्काशी भी की गई है।

    turtle importance

    (Image Source: AI-Generated)

    कछुए अर्पित करने की अनूठी परंपरा

    इस मंदिर की सबसे चर्चित विशेषता यहां का 'माधव पुखुरी' (तालाब) है। इस तालाब में सैकड़ों की संख्या में दुर्लभ प्रजाति के कछुए रहते हैं। यहां परंपरा है कि भक्त अपनी मनोकामना पूरी होने पर या भगवान को श्रद्धा अर्पित करने के लिए कछुओं को भोजन कराते हैं या तालाब में कछुए छोड़ते हैं। इन कछुओं को भगवान का ही एक रूप माना जाता है (विष्णु के 'कूर्म' अवतार के प्रतीक के रूप में)। स्थानीय लोग इन कछुओं की सुरक्षा का विशेष ध्यान रखते हैं और इन्हें कभी नुकसान नहीं पहुंचाते।

    बौद्ध धर्म से खास जुड़ाव

    हयग्रीव माधव मंदिर की एक और खासियत यह है कि यहां केवल हिंदू ही नहीं, बल्कि भारी संख्या में बौद्ध अनुयायी भी आते हैं। तिब्बती बौद्धों का मानना है कि यह वही स्थान है जहां भगवान बुद्ध ने निर्वाण (मोक्ष) प्राप्त किया था। इसी वजह से वे इस मंदिर को बहुत पवित्र मानते हैं और इसे 'महामुनि' का मंदिर कहते हैं।

    श्री हयग्रीव माधव मंदिर धर्म, संस्कृति और वन्यजीव संरक्षण का एक अनूठा उदाहरण है। यहां की शांति और सदियों पुरानी परंपराएं इसे भारत के अन्य मंदिरों से अलग बनाती हैं। अगर आप असम की यात्रा पर हैं, तो हाजो के इस चमत्कारी मंदिर के दर्शन करना एक यादगार अनुभव हो सकता है।

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    अस्वीकरण: इस लेख में बताए गए उपाय/लाभ/सलाह और कथन केवल सामान्य सूचना के लिए हैं। दैनिक जागरण तथा जागरण न्यू मीडिया यहां इस लेख फीचर में लिखी गई बातों का समर्थन नहीं करता है। इस लेख में निहित जानकारी विभिन्न माध्यमों/ज्योतिषियों/पंचांग/प्रवचनों/मान्यताओं/धर्मग्रंथों/दंतकथाओं से संग्रहित की गई हैं। पाठकों से अनुरोध है कि लेख को अंतिम सत्य अथवा दावा न मानें एवं अपने विवेक का उपयोग करें। दैनिक जागरण तथा जागरण न्यू मीडिया अंधविश्वास के खिलाफ है।