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    Mauni Amavasya 2026: मौनी अमावस्या पर पूजा के समय करें इस चालीसा का पाठ, बरसेगी पितरों की कृपा

    Updated: Wed, 14 Jan 2026 10:30 PM (IST)

    18 जनवरी के दिन मौनी अमावस्या (Mauni Amavasya 2026) है। इस अवसर पर प्रयागराज स्थित त्रिवेणी घाट पर बड़ी संख्या में साधक गंगा नदी में आस्था की डुबकी लगा ...और पढ़ें

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    मौनी अमावस्या पर क्या करें और क्या न करें?

    धर्म डेस्क, नई दिल्ली। वैदिक पंचांग के अनुसार, रविवार 18 जनवरी को मौनी अमावस्या मनाई जाएगी। इस शुभ अवसर पर बड़ी संख्या में साधक गंगा समेत पवित्र नदियों में आस्था की डुबकी लगाएंगे। साथ ही पूजा, जप-तप और दान-पुण्य करेंगे। मौनी अमावस्या के दिन पितरों का भी तर्पण किया जाता है।

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    धार्मिक मत है कि मौनी अमावस्या के दिन गंगा स्नान कर भगवान शिव और विष्णु जी की पूजा करने से साधक की हर मनोकामना पूरी होती है। साथ ही सभी प्रकार के संकटों से मुक्ति मिलती है। साथ ही पितरों की भी कृपा बरसती है। अगर आप भी पितरों को प्रसन्न करना चाहते हैं, तो मौनी अमावस्या के दिन पूजा के समय विष्णु चालीसा का पाठ अवश्य करें।


    विष्णु चालीसा

    ॥ दोहा ॥

    विष्णु सुनिए विनय,सेवक की चितलाय।
    कीरत कुछ वर्णन करूँ,दीजै ज्ञान बताय॥

    ॥ चौपाई ॥

    नमो विष्णु भगवान खरारी। कष्ट नशावन अखिल बिहारी॥
    प्रबल जगत में शक्ति तुम्हारी। त्रिभुवन फैल रही उजियारी॥
    सुन्दर रूप मनोहर सूरत। सरल स्वभाव मोहनी मूरत॥
    तन पर पीताम्बर अति सोहत। बैजन्ती माला मन मोहत॥
    शंख चक्र कर गदा बिराजे। देखत दैत्य असुर दल भाजे॥
    सत्य धर्म मद लोभ न गाजे। काम क्रोध मद लोभ न छाजे॥
    सन्तभक्त सज्जन मनरंजन। दनुज असुर दुष्टन दल गंजन॥
    सुख उपजाय कष्ट सब भंजन। दोष मिटाय करत जन सज्जन॥
    पाप काट भव सिन्धु उतारण। कष्ट नाशकर भक्त उबारण॥
    करत अनेक रूप प्रभु धारण। केवल आप भक्ति के कारण॥
    धरणि धेनु बन तुमहिं पुकारा। तब तुम रूप राम का धारा॥
    भार उतार असुर दल मारा। रावण आदिक को संहारा॥
    आप वाराह रूप बनाया। हिरण्याक्ष को मार गिराया॥
    धर मत्स्य तन सिन्धु बनाया। चौदह रतनन को निकलाया॥
    अमिलख असुरन द्वन्द मचाया। रूप मोहनी आप दिखाया॥
    देवन को अमृत पान कराया। असुरन को छबि से बहलाया॥
    कूर्म रूप धर सिन्धु मझाया। मन्द्राचल गिरि तुरत उठाया॥
    शंकर का तुम फन्द छुड़ाया। भस्मासुर को रूप दिखाया॥
    वेदन को जब असुर डुबाया। कर प्रबन्ध उन्हें ढुँढवाया॥
    मोहित बनकर खलहि नचाया। उसही कर से भस्म कराया॥
    असुर जलंधर अति बलदाई। शंकर से उन कीन्ह लड़ाई॥
    हार पार शिव सकल बनाई। कीन सती से छल खल जाई॥
    सुमिरन कीन तुम्हें शिवरानी। बतलाई सब विपत कहानी॥
    तब तुम बने मुनीश्वर ज्ञानी। वृन्दा की सब सुरति भुलानी॥
    देखत तीन दनुज शैतानी। वृन्दा आय तुम्हें लपटानी॥
    हो स्पर्श धर्म क्षति मानी। हना असुर उर शिव शैतानी॥
    तुमने धुरू प्रहलाद उबारे। हिरणाकुश आदिक खल मारे॥
    गणिका और अजामिल तारे। बहुत भक्त भव सिन्धु उतारे॥
    हरहु सकल संताप हमारे। कृपा करहु हरि सिरजन हारे॥
    देखहुँ मैं निज दरश तुम्हारे। दीन बन्धु भक्तन हितकारे॥
    चहत आपका सेवक दर्शन। करहु दया अपनी मधुसूदन॥
    जानूं नहीं योग्य जप पूजन। होय यज्ञ स्तुति अनुमोदन॥
    शीलदया सन्तोष सुलक्षण। विदित नहीं व्रतबोध विलक्षण॥
    करहुँ आपका किस विधि पूजन। कुमति विलोक होत दुख भीषण॥
    करहुँ प्रणाम कौन विधिसुमिरण। कौन भाँति मैं करहुँ समर्पण॥
    सुर मुनि करत सदा सिवकाई। हर्षित रहत परम गति पाई॥
    दीन दुखिन पर सदा सहाई। निज जन जान लेव अपनाई॥
    पाप दोष संताप नशाओ। भवबन्धन से मुक्त कराओ॥
    सुत सम्पति दे सुख उपजाओ। निज चरनन का दास बनाओ॥
    निगम सदा ये विनय सुनावै। पढ़ै सुनै सो जन सुख पावै॥

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