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    Makar Sankranti 2026: सूर्य देव को जल चढ़ाते समय जपें ये सिद्ध मंत्र, समाज में बढ़ेगा मान-सम्मान

    Updated: Sun, 11 Jan 2026 09:34 PM (IST)

    मकर संक्रांति सूर्य देव के मकर राशि में प्रवेश करने पर मनाई जाती है, जिससे सूर्य उत्तरायण होते हैं। इस शुभ अवसर पर गंगा स्नान, पूजा, जप-तप और दान का व ...और पढ़ें

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    Makar Sankranti 2026: सूर्य देव को कैसे प्रसन्न करें?  

    धर्म डेस्क, नई दिल्ली। Makar Sankranti 2026: हर साल आत्मा के कारक सूर्य देव के मकर राशि में प्रवेश करने की तिथि पर मकर संक्रांति मनाई जाती है। इस दिन से सूर्य देव उत्तरायण (Solar Energy for Success) होते हैं। इस शुभ अवसर पर गंगा स्नान किया जाता है। साथ ही पूजा, जप-तप और दान किया जाता है। इस दिन पितरों का श्राद्ध और तर्पण भी किया जाता है।

    surya dev

    धार्मिक मान्यता है कि मकर संक्रांति तिथि पर भगवान शिव की पूजा करने से जीवन में व्याप्त सभी प्रकार के संकटों से मुक्ति मिलती है। साथ ही सुख, समृद्धि और वंश में वृद्धि होती है। अगर आप भी सूर्य देव की कृपा पाना चाहते हैं, तो मकर संक्रांति के दिन विधि-विधान से भगवान भास्कर की पूजा (Surya Arghya Vidhi and Mantras) करें। साथ ही पूजा के समय इन मंत्रों का जप करें।

    सूर्य मंत्र (Vedic Sun Mantras for Prestige)

    1. जपाकुसुम संकाशं काश्यपेयं महाद्युतिम ।
    तमोsरिं सर्वपापघ्नं प्रणतोsस्मि दिवाकरम ।।

    2. ऊँ आकृष्णेन रजसा वर्तमानो निवेशयन्नमृतं मर्त्यण्च ।
    हिरण्य़येन सविता रथेन देवो याति भुवनानि पश्यन ।।

    3. ऊँ आदित्याय विदमहे दिवाकराय धीमहि तन्न: सूर्य: प्रचोदयात ।।

    4. ग्रहाणामादिरादित्यो लोक लक्षण कारक:।
    विषम स्थान संभूतां पीड़ां दहतु मे रवि।।

    5. ॐ ऐहि सूर्य सहस्त्रांशों तेजो राशे जगत्पते,
    अनुकंपयेमां भक्त्या, गृहाणार्घय दिवाकर:।

    6. गांगं वारि मनोहारि मुरारिचरणच्युतम् ।
    त्रिपुरारिशिरश्चारि पापहारि पुनातु माम् ॥

    7. "ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्।
    उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय माऽमृतात्।।"

    8. ॐ तत्पुरुषाय विद्महे महादेवाय धीमहि तन्नो रुद्रः प्रचोदयात्॥

    9. नमामिशमीशान निर्वाण रूपं विभुं व्यापकं ब्रह्म वेद स्वरूपं।।

    10. सौराष्ट्रे सोमनाथं च श्रीशैले मल्लिकार्जुनम्।

    उज्जयिन्यां महाकालं ओम्कारम् अमलेश्वरम्॥

    परल्यां वैद्यनाथं च डाकिन्यां भीमशङ्करम्।

    सेतुबन्धे तु रामेशं नागेशं दारुकावने॥

    वाराणस्यां तु विश्वेशं त्र्यम्बकं गौतमीतटे।

    हिमालये तु केदारं घुश्मेशं च शिवालये॥

    एतानि ज्योतिर्लिङ्गानि सायं प्रातः पठेन्नरः।।

    सूर्याष्टकम

    आदिदेव नमस्तुभ्यं प्रसीद मम भास्कर।
    दिवाकर नमस्तुभ्यं प्रभाकर नमोऽस्तु ते
    सप्ताश्वरथमारूढं प्रचण्डं कश्यपात्मजम् ।
    श्वेतपद्मधरं देवं तं सूर्यं प्रणमाम्यहम्
    लोहितं रथमारूढं सर्वलोकपितामहम् ।
    महापापहरं देवं तं सूर्यं प्रणमाम्यहम्
    त्रैगुण्यं च महाशूरं ब्रह्मविष्णुमहेश्वरम् ।
    महापापहरं देवं तं सूर्यं प्रणमाम्यहम्
    बृंहितं तेजःपुञ्जं च वायुमाकाशमेव च ।
    प्रभुं च सर्वलोकानां तं सूर्यं प्रणमाम्यहम्
    बन्धुकपुष्पसङ्काशं हारकुण्डलभूषितम् ।
    एकचक्रधरं देवं तं सूर्यं प्रणमाम्यहम्
    तं सूर्यं जगत्कर्तारं महातेजः प्रदीपनम् ।
    महापापहरं देवं तं सूर्यं प्रणमाम्यहम्
    तं सूर्यं जगतां नाथं ज्ञानविज्ञानमोक्षदम् ।
    महापापहरं देवं तं सूर्यं प्रणमाम्यहम्

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