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    Gita Updesh: जिंदगी को बेहतर बना सकते हैं गीता के ये उपदेश, दिखाते हैं नई राह

    Updated: Wed, 28 May 2025 04:57 PM (IST)

    श्रीमद्भगवत गीता का ज्ञान सर्वश्रेष्ठ माना गया है। गीता के उपदेशों द्वारा ही भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को कर्म और कर्तव्य का बोध कराया था। गीता के उपदेश व्यक्ति का मार्गदर्शन करते हैं और उसे जीवन सफल व बेहतर बनाने में भी सहायता करते हैं। ऐसे में चलिए जानते हैं गीता के कुछ ऐसे ही उपदेश।

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    जिंदगी को बेहतर बनाने के लिए गीता उपदेश (Picture Credit: Freepik)

    धर्म डेस्क, नई दिल्ली। भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को युद्ध की भूमि में गीता के उपदेश दिए थे, जिनकी प्रासंगिकता आज भी बनी हुई है। आज के समय में कई लोग गीता का पाठ करते हैं, जो लाभकारी सिद्ध होता है। आज हम आपको गीता के कुछ ऐसे श्लोक बताने जा रहे हैं, जो आपको जीवन में एक नही राह दिखा सकते हैं। 

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    गीता में कही गई हैं ये बात

    1. न हि कश्चित्मक्षमपि जातु तिष्ठत्यकर्मकृतृ

    गीता के इस श्लोक में कर्म के महत्व को बताया गया है। इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि कोई भी प्राणी क्षणभर के लिए भी बिना कर्म किए नहीं रह सकता। कर्म करना ही प्रकृति का ही नियम है और इसका विरोध नहीं किया जा सकता।

    यदि हम शरीर से कोई कर्म न भी करें, तब भी हम मन और बुद्धि से क्रियाशील बने रहते हैं। ऐसे में कर्म का सर्वथा त्याग करना अंभव है, क्योंकि यह प्रकृति के नियम के विरुद्ध है।

    (Picture Credit: Freepik)

    2. "कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन ।

    मा कर्मफलहेतुर्भुर्मा ते संगोऽस्त्वकर्मणि ।।"

    गीता के इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को समझाते हुए कहते हैं कि मनुष्य का अधिकार केवल कर्म पर ही है, उसके फलों में कभी नहीं। इसलिए हे पार्थ (अर्जुन) तुम केवल कर्म करों और फल की चिंता मत करो। इसका अर्थ यह है कि व्यक्ति केवल अपने कर्म पर ही नियंत्रण कर सकता है, न कि उससे प्राप्त होने वाले फल पर। ऐसे में व्यक्ति को फल की चिंता किए बिना केवल अपना कर्म करते रहना चाहिए।

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    3. श्रद्धावान्ल्लभते ज्ञानं तत्पर: संयतेन्द्रिय:।

    ज्ञानं लब्ध्वा परां शान्तिमचिरेणाधिगच्छति॥

    इस श्लोक का अर्थ है कि श्रद्धा रखने वाले मनुष्य और अपनी इन्द्रियों पर संयम रखने वाले मनुष्य को ज्ञान की प्राप्ति होती है। ज्ञान मिल जाने पर परम शांति की प्राप्ति होती है। 

    4. उद्धरेदात्मनाऽऽत्मानं नात्मानमवसादयेत्।

    आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः।।6.5।।

    इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं कि व्यक्ति को खुद ही अपना उद्धार करना चाहिए, न कि पतन। क्योंकि मनुष्य स्वयं ही अपना मित्र भी होता है और शत्रु भी। अगर आप गीता की इन सीख को अपने जीवन में उतारेंगे को आपको बेहतर परिणाम देखने को मिल सकते हैं। 

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    अस्वीकरण: इस लेख में बताए गए उपाय/लाभ/सलाह और कथन केवल सामान्य सूचना के लिए हैं। दैनिक जागरण तथा जागरण न्यू मीडिया यहां इस लेख फीचर में लिखी गई बातों का समर्थन नहीं करता है। इस लेख में निहित जानकारी विभिन्न माध्यमों/ज्योतिषियों/पंचांग/प्रवचनों/मान्यताओं/धर्मग्रंथों/दंतकथाओं से संग्रहित की गई हैं। पाठकों से अनुरोध है कि लेख को अंतिम सत्य अथवा दावा न मानें एवं अपने विवेक का उपयोग करें। दैनिक जागरण तथा जागरण न्यू मीडिया अंधविश्वास के खिलाफ है।