Gita Updesh: आपके जीवन को नई दिशा दे सकता है गीता का कर्मयोग सिद्धांत, जानें इसके बारे में
भगवान श्रीकृष्ण द्वारा अर्जुन को गीता के उपदेश दिया गया था जिसने अर्जुन को अपने कर्तव्य पालन के लिए प्रेरित किया। यह ज्ञान श्रीमद्भगवत गीता में उल्लेखित है जिसे सर्वश्रेष्ठ ज्ञान में शामिल किया जाता है। आज न केवल भारत बल्कि विदेशों में भी लोग गीता का पाठ करते है।

धर्म डेस्क, नई दिल्ली। गीता उपदेश व्यक्ति के जीवन को एक नई दिशा दे सकते हैं। ऐसे में आज हम आपको श्रीमद्भगवत गीता में वर्णित कर्मयोग सिद्धांत के बारे में बताने जा रहे हैं, जो भगवान श्रीकृष्ण द्वारा अर्जुन को दिया गया एक महत्वपूर्ण उपदेश है। ऐसे में अगर आप इस सिद्धांत को समझकर अपने जीवन में उतारते हैं, तो इससे आपको सकारात्मक परिणाम देखने को मिल सकते हैं।
हो सकती है निराशा
यह आदत लगभग हर इंसान में पाई जाती है कि वह कोई भी काम करने से पहले या उसके बाद उस काम से मिलने वाले परिणामों के बारे में सोचने लगता है। अगर उस काम का परिणाम उसके मनमुताबिक न हो तो, ऐसे में यह निराशा का कारण बन सकता है।
श्रीमद्भगवत गीता में इसे लेकर एक श्लोक मिलता है, जिसमें कर्मयोग के बारे में बताया गया है। अगर आप इसके अर्थ को गहराई से समझ लेगें, तो जीवन की कई परेशानियों से आपको मुक्ति मिल जाएगी।
कर्मयोग का अर्थ
कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।
मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि॥
इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि तुम्हारा अधिकार केवल अपने कर्मों पर है, न कि कर्मों के फल पर, इसलिए तुम फल की इच्छा छोड़ दो और केवल कर्म करते रहो।
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(Picture Credit: Freepik)
कर्मयोग का सार
भगवद्गीता में वर्णित "कर्मयोग" इसका सार यह है कि फल की इच्छा किए बिना व्यक्ति को निस्वार्थ भाव से कर्म करना चाहिए। इसी के साथ गीता में कर्म-फल में आसक्ति का भाव न रखते हुए अपने कर्तव्यों का पालन करने की बात कही गई है। ऐसे में अगर आप इस ज्ञान को अपने जीवन में अपनाते हैं, तो निश्चित तौर पर निराशा के भाव से बच सकते हैं। साथ ही यह आपको सफलता की ओर ले जाने में भी सहायक है।
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