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    Raksha Bandhan 2025: जब प्रेम बन गया रक्षा का वचन, यहां पढ़ें रक्षाबंधन की पौराणिक कथाएं

    Updated: Sat, 09 Aug 2025 09:57 AM (IST)

    रक्षाबंधन (Raksha Bandhan 2025) भाई-बहन के प्यार का त्योहार है। इस दिन बहन भाई की कलाई पर राखी बांधती है जो प्यार और सुरक्षा का प्रतीक है। भाई उसकी रक्षा का वचन देता है। इस साल रक्षाबंधन आज यानी 9 अगस्त को मनाया जा रह रहा है। इस पर्व से जुड़ी कई सारी कथाएं भी प्रचलित हैं आइए उन्हें पढ़ते हैं।

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    Raksha Bandhan 2025: भाई-बहन के अटूट प्रेम का पर्व है रक्षाबंधन।

    दिव्या गौतम, एस्ट्रोपत्री। रक्षाबंधन, जिसे हम राखी भी कहते हैं, भाई-बहन के पवित्र रिश्ते का त्योहार है। यह सिर्फ एक रसम नहीं, बल्कि उस भाव का उत्सव है जहां प्यार, विश्वास और सुरक्षा की भावना होती है। इस दिन बहन अपने भाई की कलाई पर राखी बांधती है। यह धागा उसके प्यार, दुआओं और भरोसे का प्रतीक होता है। भाई उसे उपहार देकर यह वचन देता है कि वह जीवन भर उनकी रक्षा करेगा और हर परिस्थिति में उसके साथ खड़ा रहेगा।

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    यह पर्व हमें यह भी सिखाता है कि सच्चा रिश्ता खून का नहीं, दिल का होता है। जहां भावनाएं सच्ची हों, वहां राखी का बंधन और भी खास हो जाता है। इस साल रक्षाबंधन 9 अगस्त यानी आज मनाया जा रहा है। आइए, इस शुभ अवसर पर रक्षाबंधन से जुड़ी कुछ प्रेरणादायक कथाओं को जानें, जो इस पर्व को और भी भावपूर्ण बना देती हैं।

    माता लक्ष्मी और राजा बलि की कथा

    रक्षाबंधन की सबसे भावुक और गहराई से जुड़ी कथाओं में से एक है देवी लक्ष्मी और राजा बलि की यह कहानी, जिसका उल्लेख भागवत पुराण और विष्णु पुराण में मिलता है। जब भगवान विष्णु ने वामन अवतार लेकर राजा बलि से तीन पग भूमि मांगी और अपनी माया से तीनों लोकों को नाप लिया, तब राजा बलि ने अपना सबकुछ दान कर दिया। अपने वचन के पालन के लिए, राजा बलि ने भगवान विष्णु से आग्रह किया कि वे सदा उसके पास पाताल लोक में निवास करें।

    भगवान विष्णु राजा बलि के प्रेम और भक्ति से प्रभावित होकर उसके साथ रहने चले गए। लेकिन इस निर्णय से माता लक्ष्मी बहुत व्याकुल हो गईं। अपने प्रिय को वापस लाने के लिए उन्होंने एक सुंदर उपाय सोचा। देवी लक्ष्मी एक सामान्य स्त्री के वेश में राजा बलि के महल पहुंचीं। उन्होंने राजा से शरण मांगी और उसे राखी बांधकर अपना भाई बना लिया। राजा बलि इस बहन के प्रेम और सरल भाव से अभिभूत हो गया। जब लक्ष्मी ने अपनी इच्छा प्रकट की कि वे अपने पति विष्णु को वापस ले जाना चाहती हैं, तो बलि ने बिना एक क्षण रुके, उसे सहर्ष स्वीकार कर लिया।

    यह कथा सिखाती है कि सच्चा रिश्ता जन्म से नहीं, भावना से बनता है। यहां रक्षा सिर्फ भाई की नहीं, बहन की प्रार्थना और प्रेम भी उतना ही गहरा होता है।

    यह भी पढ़ें- Raksha Bandhan 2025: राखी बांधते समय क्यों बोला जाता है ये मंत्र, जानिए इससे जुड़ी कथा

    श्रीकृष्ण और द्रौपदी का बंधन

    श्रीकृष्ण और द्रौपदी का रिश्ता एक सामान्य मित्रता नहीं, बल्कि आत्मा से जुड़ा पवित्र बंधन था। इस रिश्ते की शुरुआत तब हुई जब एक बार श्रीकृष्ण को युद्ध करते समय उंगली में चोट लग गई। खून बह रहा था और पास कोई उपचार नहीं था। द्रौपदी ने बिना देर किए अपनी साड़ी का एक टुकड़ा फाड़कर श्रीकृष्ण की उंगली पर बांध दिया।

    इस छोटे-से पर अत्यंत प्रेमभरे कार्य से श्रीकृष्ण अत्यंत भावुक हो उठे। उन्होंने उसी क्षण मन ही मन यह संकल्प लिया कि जब भी द्रौपदी संकट में होंगी, वे उसकी रक्षा अवश्य करेंगे। यह संकल्प मात्र एक वचन नहीं, बल्कि एक सजीव रक्षा कवच बन गया। जब महाभारत में कौरवों ने द्रौपदी का चीरहरण करने का प्रयास किया था तब सभा में सभी लोग मौन थे, लेकिन कृष्ण ने अपने वचन को निभाते हुए द्रौपदी की लाज बचाई और द्रौपदी की साड़ी अंतहीन होती गई और कौरव द्रौपदी का चीरहरण करने में विफल हुए।

    कुछ ग्रंथों में यह भी उल्लेख मिलता है कि द्रौपदी ने महाभारत युद्ध से पहले भी श्रीकृष्ण को राखी बांधी थी, और इस बंधन ने दोनों को आत्मिक रूप से और भी जोड़ दिया। यह कथा बताती है कि रक्षाबंधन सिर्फ एक दिन का उत्सव नहीं, बल्कि जीवन भर निभाए जाने वाला एक वादा है। और जब यह वादा आत्मा से जुड़ा हो, तो उसकी शक्ति हर युग और संकट से बड़ी होती है।

    लेखक: दिव्या गौतम, Astropatri.com अपनी प्रतिक्रिया देने के लिए hello@astropatri.com पर संपर्क करें।