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    Pradosh Vrat 2025: प्रदोष व्रत पर करें इस कथा का पाठ, मिलेगा भगवान शिव का आशीर्वाद

    प्रदोष व्रत का दिन बहुत शुभ माना जाता है। यह दिन भगवान शिव की पूजा के लिए समर्पित है। हिंदू पंचांग के अनुसार वैशाख शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी तिथि 9 मई यानी आज के दिन (Pradosh Vrat 2025) पड़ रही है जो लोग इस व्रत का पालन करते हैं उन्हें इसकी व्रत कथा का पाठ जरूर करना चाहिए जो इस प्रकार है।

    By Vaishnavi Dwivedi Edited By: Vaishnavi Dwivedi Updated: Fri, 09 May 2025 09:43 AM (IST)
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    Pradosh Vrat 2025 Katha: प्रदोष व्रत कथा।

    धर्म डेस्क, नई दिल्ली। भगवान शिव की पूजा के लिए प्रदोष व्रत एक महत्वपूर्ण तिथि है। इस दिन व्रत रखने, पूजा करने और भगवान शिव के मंत्रों का जाप करने का विशेष महत्व है। वहीं, इन सबके साथ इस दिन प्रदोष व्रत की कथा का पाठ करना भी अत्यंत फलदायी माना गया है। ऐसी मान्यता है कि इस कथा को सुनने या पढ़ने से भगवान शिव प्रसन्न होते हैं और अपने भक्तों के सभी कष्टों को दूर करते हैं, तो आइए यहां प्रदोष व्रत कथा (Pradosh Vrat 2025 Katha) का पाठ करते हैं, जो इस प्रकार है।

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    प्रदोष व्रत कथा (Pradosh Vrat 2025 Katha)

    प्रदोष व्रत की कई कथाएं प्रचलित हैं, जिनका पाठ अलग-अलग मनोकामनाओं की पूर्ति के लिए किया जाता है। इनमें से एक कथा के अनुसार, एक बार अंबापुर गांव में एक ब्रह्माणी रहती थी। उसके पति का निधन हो गया था, जिस वजह वह भिक्षा मांगकर अपना जीवन व्यतीत कर रही थी। एक दिन जब वह भिक्षा मांगकर लौट रही थी, तो उसे दो छोटे बच्चे मिलें जो अकेले थे, जिन्हें देखकर वह काफी परेशान हो गई थी। वह विचार करने लगी कि इन दोनों बालक के माता-पिता कौन हैं? इसके बाद वह दोनों बच्चों को अपने साथ घर ले आई। कुछ समय के बाद वह बालक बड़े हो गएं। एक दिन ब्रह्माणी दोनों बच्चों को लेकर ऋषि शांडिल्य के पास जा पहुंची। ऋषि शांडिल्य को नमस्कार कर वह दोनों बालकों के माता-पिता के बारे में जानने की इच्छा व्यक्त की।

    तब ऋषि शांडिल्य ने बताया कि ''हे देवी! ये दोनों बालक विदर्भ नरेश के राजकुमार हैं। गंदर्भ नरेश के आक्रमण से इनका राजपाट छीन गया है। अतः ये दोनों राज्य से पदच्युत हो गए हैं।'' यह सुन ब्राह्मणी ने कहा कि ''हे ऋषिवर! ऐसा कोई उपाय बताएं कि इनका राजपाट वापस मिल जाए।'' जिसपर ऋषि शांडिल्य ने उन्हें प्रदोष व्रत करने की सलाह दी।

    इसके बाद ब्राह्मणी और दोनों राजकुमारों ने शुक्र प्रदोष व्रत का पालन भाव के साथ किया। फिर उन दिनों विदर्भ नरेश के बड़े राजकुमार की मुलाकात अंशुमती से हुई। दोनों विवाह करने के लिए राजी हो गए। यह जान अंशुमती के पिता ने गंदर्भ नरेश के विरुद्ध युद्ध में राजकुमारों की सहायता की, जिससे राजकुमारों को युद्ध में विजय प्राप्त हुई। शुक्र प्रदोष व्रत के प्रभाव से उन राजकुमारों को उनका राजपाट फिर से वापस मिल गया। इससे प्रसन्न होकर उन राजकुमारों ने ब्राह्मणी को दरबार में खास स्थान दिया, जिससे ब्राह्मणी भी सुखी जीवन जीने लगी और भोलेनाथ की बड़ी उपासक बन गई।

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    अस्वीकरण: इस लेख में बताए गए उपाय/लाभ/सलाह और कथन केवल सामान्य सूचना के लिए हैं। दैनिक जागरण तथा जागरण न्यू मीडिया यहां इस लेख फीचर में लिखी गई बातों का समर्थन नहीं करता है। इस लेख में निहित जानकारी विभिन्न माध्यमों/ज्योतिषियों/पंचांग/प्रवचनों/मान्यताओं/धर्मग्रंथों/दंतकथाओं से संग्रहित की गई हैं। पाठकों से अनुरोध है कि लेख को अंतिम सत्य अथवा दावा न मानें एवं अपने विवेक का उपयोग करें। दैनिक जागरण तथा जागरण न्यू मीडिया अंधविश्वास के खिलाफ है।