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    दादी ने सुनाई 60 साल पहले खुद के बिजनौर के मेले में खोने की कहानी, पोते ने मिलवाया, पहली बार बांधेंगी भाई को राखी

    Updated: Thu, 07 Aug 2025 07:19 PM (IST)

    Bijnor News बिजनौर में 60 साल पहले मेले में खोई मुन्नी देवी को उनके पोते ने परिवार से मिलाया। फिरोजाबाद में पली-बढ़ी मुन्नी देवी को अपने बचपन की यादें ताजा थीं। पोते प्रशांत ने फर्रुखाबाद में रह रहीं दादी की इच्छा पूरी करते हुए उनके पैतृक गांव कंभौर में भाई जगदीश सिंह से मिलवाया। अब मुन्नी देवी पहली बार भाई को राखी बांधेंगी और परिवार के साथ खुशियां मनाएंगी।

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    गांव कंभौर में स्वजन के बीच बैठीं मुन्नी देवी (पीली साड़ी में) बगल में बैठे उनके भाई जगदीश सिंह। जागरण

    अजीत चौधरी, जागरण, बिजनौर। 69 साल की बीमार मुन्नी की सेवा करते हुए उनके पौत्र प्रशांत ने एक कहानी सुनाने के लिए कहा। डबडबाई आंखों से मुन्नी ने अपने पौत्र से कहा...'बेटा मेरी कहानी कोई सुनता नहीं है। मैं आज भी 60 साल पहले उसी मोड़ पर खड़ी हूं।' प्रशांत को दिलचस्पी हुई तो उसने पूरी कहानी सुनाने के लिए कहा।

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    बैल के उपद्रव मचाने से हुई अफरातफरी, परिवार से बिछड़ीं

    भावुक दादी अर्थात मुन्नी ने बताया कि 'मैं बिजनौर के कंभोर गांव की बेटी हूं। नौ साल की थी जब पिता भगवान सिंह समेत परिवार के साथ गंज गंगा मेले में घूमने गई। एक बैल के उपद्रव मचाने से हुई अफरातफरी में परिवार से बिछड़ गई। मैं नौ साल की बच्ची रोती-तड़पती रही, लेकिन परिवार नहीं मिल सका

    पुलिसकर्मी ने फर्रुखाबाद निवासी दंपती को सौंप दिया

    एक पुलिसकर्मी ने मुझे फर्रुखाबाद के पटना गांव निवासी संतानहीन दंपती ललई सिंह को सौंप दिया। यह बताते हुए फफककर रोने लगीं। पौत्र प्रशांत भी रो पड़ा। फिर दादी मुन्नी ने बताया कि ललई सिंह ने पिता के रूप में बहुत प्यार से मुझे पाला। मेरा विवाह फर्रुखाबाद के सरोली गांव निवासी अमन सिंह से किया। मैंने कई बार पिता यानी ललई सिंह और पति अमन सिंह से मेरे गांव बिजनौर ले चलकर पिता व परिवार से मिलाने का अनुरोध किया, लेकिन न जाने क्या छुपाने के चक्कर में कोई मुझे बिजनौर नहीं ले गया। पुत्र...इतनी से मेरी कहानी है जो अंतस में अंतहीन वेदना बनकर बैठी हुई है'। यही कहकर मुन्नी फूट फूटकर रोने लगीं। 

    दादी की गोद में सिर रखकर रो पड़ा

    भावुक प्रशांत जैसे अतीत में गुम सा हो गया। उसने स्वयं को नौ वर्ष की बच्ची के रूप में कल्पना की और परिवार से बिछड़ने का गम सोचकर दादी की गोद में सिर रखकर रो पड़ा। प्रशांत ने दादी का पैतृक घर ढूंढने का फैसला किया। वह दो दिन पहले बिजनौर के गांव कंभौर पहुंचा और मुन्नी देवी के भाई जगदीश सिंह से बात की। उन्हें भी अपनी बहन के खोने का पता था।

    फोन पर बातकर भाई की भी हुईं स्मृतियां 

    प्रशांत ने दादी मुन्नी की फोन पर उनके भाई जगदीश सिंह से बात कराई तो स्मृतियां ताजा हुईं। इसके बाद दोनों रोते हुए देर तक बात करते रहे। भावनाओं के समंदर में तैरते जगदीश सिंह ने सोमवार को अपने पोते को फर्रुखाबाद भेजकर बहन मुन्नी को गांव बुलवाया। यहां स्मृतियों के बादल से खुशी के आंसू बह रहे थे। गांव में मुन्नी देवी से मिलने आने वालों के भी आंसू छलक पड़े।

    पहली बार भाई को बांधेंगी राखी

    मुन्नी देवी के सात भाई थे। अब केवल भाई जगदीश सिंह जीवित हैं। वे इस बार पहली बार अपने भाई जगदीश सिंह को राखी बांधेंगी। मुन्नी देवी घर से गईं थीं तब नौ साल की थीं। अब इससे अधिक आयु के उनके पोती-परपोते घर के आंगन में खेल रहे हैं। मुन्नी देवी अपने स्वजन से मिलकर बेहद खुश हुईं। वो कहती हैं कि मेरा प्रौत्र प्रशांत सूत्रधार बना और आखिरकार भगवान ने मुझे अपने पैतृक घर पहुंचा ही दिया।