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    यूपी के चार सरकारी मेडिकल कॉलेजों में NEET-2025 के दाखिले रद, हाई कोर्ट ने फिर से सीटें भरने का दिया आदेश

    Updated: Sun, 31 Aug 2025 06:52 AM (IST)

    इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ खंडपीठ ने अंबेडकरनगर कन्नौज जालौन व सहारनपुर के सरकारी मेडिकल कॉलेजों में नीट-2025 के तहत हुए दाखिले रद्द कर दिए। इन कॉलेजों में आरक्षित वर्ग के लिए 79% से अधिक सीटें थीं। न्यायालय ने कहा कि राज्य सरकार का विशेष आरक्षण शासनादेश आरक्षण अधिनियम 2006 के विरुद्ध है।

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    यूपी के चार सरकारी मेडिकल कॉलेजों में NEET-2025 के दाखिले रद (हाई कोर्ट फाइल फोटो)

    विधि संवाददाता, लखनऊ। इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ खंडपीठ ने एक महत्वपूर्ण निर्णय देते हुए अंबेडकरनगर, कन्नौज, जालौन व सहारनपुर के सरकारी मेडिकल कॉलेजों में नीट-2025 के तहत हुए दाखिलों को रद कर दिया है।

    इन मेडिकल कॉलेजों में आरक्षित वर्ग के लिए 79 प्रतिशत से अधिक सीटें सुरक्षित की गई हैं। न्यायालय ने कहा कि राज्य सरकार की ओर से जारी विशेष आरक्षण से जुड़े शासनादेश आरक्षण अधिनियम 2006 के विरुद्ध हैं।

    हाई कोर्ट ने दिया ये आदेश

    इस पर राज्य सरकार की ओर से अनुरोध किया गया कि इन मेडिकल कॉलेजों में वर्तमान फॉर्मूले के अनुसार सीटें भरी जा चुकी हैं।

    न्यायालय इससे संतुष्ट नहीं हुआ और आरक्षण से संबंधित शासनादेशों को रद करते हुए आदेश दिया कि आरक्षण अधिनियम 2006 का सख्ती से अनुपालन करते हुए नए सिरे से सीटें भरी जाएं।

    यह निर्णय न्यायमूर्ति पंकज भाटिया की एकल पीठ ने नीट अभ्यर्थी साबरा अहमद की याचिका पर पारित किया है। याची की ओर से अधिवक्ता मोतीलाल यादव ने दलील दी कि याची ने नीट-2025 की परीक्षा दी है, जिसमें उसे 523 अंक मिले और उसकी आल इंडिया रैंक 29,061 रही।

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    पचास फीसदी से अधिक आरक्षण बना वजह

    कहा गया कि शासनादेशों 20 जनवरी 2010, 21 फरवरी 2011, 13 जुलाई 2011, 19 जुलाई 2012, 17 जुलाई 2013 व 13 जून 2015 के जरिये इन मेडिकल कॉलेजों में आरक्षण की सीमा बढ़ाकर 79 प्रतिशत से ज्यादा कर दी गई जो स्पष्ट तौर पर 50 प्रतिशत की सीमा से अधिक आरक्षण न होने संबंधी स्थापित सिद्धांत के विपरीत है।

    इन मेडिकल कॉलेजों में राज्य सरकार के कोटे की कुल 85-85 सीटें हैं, जबकि सिर्फ सात-सात सीटें अनारक्षित श्रेणी के लिए रखी गई हैं। याचिका का राज्य सरकार और चिकित्सा शिक्षा विभाग की ओर से विरोध किया गया।

    दलील दी गई कि इंदिरा साहनी मामले में शीर्ष अदालत यह स्पष्ट कर चुकी है कि 50 प्रतिशत की सीमा अंतिम नहीं है, इससे अधिक आरक्षण दिया जा सकता है।

    हालांकि न्यायालय इस दलील से सहमत नहीं हुई और कहा कि यह सीमा सिर्फ नियमों का पालन करते हुए ही बढ़ाई जा सकती है।