Radha Ashtami: चंद्र से दमकते ब्रह्मांचल पर प्रकटेंगी रासेश्वरी, 'श्रीराधा' से आलोकित हुआ अष्टदल कमल का 'गर्भ'
Radha Ashtami 2025 बरसाना नगरी रासेश्वरी श्रीराधा के प्राकट्य उत्सव में डूबी है। ब्रह्मांचल पर्वत चमक रहा है और हर गली में राधे-राधे की गूंज है। भक्त उपहार लेकर आ रहे हैं और राधारानी के दर्शन के लिए उत्सुक हैं। रविवार को लाडली जी का अभिषेक होगा और पूरा बरसाना जन्मोत्सव मनाएगा। संध्या में राधारानी का डोला सफेद छतरी के नीचे सजेगा।

रसिक शर्मा, जागरण, बरसाना। बरसाना इन दिनों भक्ति, उत्साह और उमंग का केंद्र बन गया है। समूची नगरी राधानाम की गूंज से आल्हादित है। ब्रह्मांचल पर्वत चंद्रमा सा दमक रहा है। बृषभानु महल सूर्य सा आलोकित है। वातावरण में भक्ति की मादकता और इंतजार की बेचैनी है। जैसे जैसे घड़ियां निकट आ रही हैं, अष्टदल कमल की पंखुड़ियां खिलने को व्याकुल हैं, रासेश्वरी श्रीराधा प्रकट होने वाली हैं।
भक्तों के दिल में बस एक ही पुकार है, राधे-राधे। कोई सखियों के रूप में सज-धजकर आया है तो कोई हाथों में उपहार लेकर। नंदगांव, वृंदावन और दूर-दराज़ के गांवों से आए श्रद्धालु गीतों और समाज गायन से वातावरण गुंजायमान कर रहे हैं। शुक्रवार शाम सूर्यास्त से पहले ही बरसाना की गलियां राधे-राधे के जयघोष से भर उठीं।
श्रद्धालुओं की उमड़ी, हर गली में राधेनाम की गूंज
कुंडों की जल तरंगें, मंदिरों की घंटियां और बैंड-बाजों की थाप, सब मिलकर मानो राधारानी के आगमन का स्वागत कर रहे हों। ढोल-नगाड़ों की गूंज, बधाई गीतों की स्वर लहरियां और भक्तों का नृत्य-सब कुछ जन्म की आहट का उत्सव बन गया। श्रद्धालुओं ने कपड़े, फल, मिठाई, केक, चाकलेट और फ्रूटी तक भेंट अर्पित करने को सहेज रखे हैं।
रविवार की सुबह चार बजे का सभी को इंतजार
बरसाना का रंगीली महल भी भक्ति से सराबोर है। रविवार की सुबह चार बजे का पल सबके इंतजार का है। वैदिक मंत्रोच्चारण के बीच लाडली जी का अभिषेक होगा और समूचा बरसाना जन्मोत्सव के रंग में रंग जाएगा। वहीं रंगीली महल में केक काटकर राधारानी का जन्मोत्सव मनाया जाएगा। रविवार को भादों अष्टमी की शुभ्र बेला में जब जन्माभिषेक की मंगल ध्वनियां गूंजेंगी, तब शीशमहल रत्न-जवाहरात की चमक से नहीं, बल्कि राधा-कृष्ण की अलौकिक आभा से दमकेगा।
पीली पोशाक में सुसज्जित, हीरे-जवाहरात से अभिसिक्त बृषभानु नंदनी की मुस्कान समस्त ब्रजभूमि को आलोकित कर देगी। श्रद्धालु उनकी एक झलक पाने को उमड़े रहते हैं, आंखों में प्रतीक्षा, हृदय में उत्साह और होठों पर बस ‘राधे-राधे’ की अनवरत गूंज। सेवायतों का मधुर बधाई गायन और झूमते भक्तों के सुर वातावरण को ऐसा बना देते हैं कि मानो राधा मुस्करा उठीं।
सफेद छतरी के नीचे राधा रानी
संध्या का क्षण आते ही बरसाना की आभा और भी अद्भुत हो उठती है। मान्यता के अनुसार जिस प्रकार कभी रानी कीरत ने अपनी लाली को स्वयं बाहरी आंगन में लाकर भक्तों को दर्शन दिए थे, उसी परंपरा को जीवित रखने के लिए राधारानी का भव्य डोला श्वेत संगमरमर से निर्मित छतरी पर विराजमान होता है। ज्यों ही डोला प्रकट होता है, श्रद्धालुओं की उमंग लहर बनकर उमड़ती है।
चंद्र से दमकते ब्रह्मांचल पर प्रकटेंगी रासेश्वरी
आरती की जगह गोस्वामी समाज की कन्याओं द्वारा की गई ‘आरता’ रात्रि की शांति को भक्ति के स्वर से प्रज्वलित कर देती है। रजनी की रजत आभा और सफेद छतरी का उजास, जब राधारानी की झलक से मिलते हैं तो मानो चंद्रमा भी अपनी शीतलता बिखेरने के लिए ठहर जाता है। सुबह का शीशमहल और शाम की सफेद छतरी, दोनों ही झलकियां भक्तों के लिए सिर्फ दृश्य नहीं, बल्कि जीवनभर स्मरणीय भक्ति संस्कार बनकर हृदय में बस जाती हैं।
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