नीदरलैंड का सुर्ख गुलाब, जापानी कोकोसोमा या खास गुलदाउदी चाहिए ...तो पश्चिम आइये, High Profile युवाओं के श्रम से महक रहे पालीहाउस
नीदरलैंड के लाल गुलाब और जापानी कोकोसोमा जैसे फूलों की मांग बढ़ रही है। उच्च शिक्षित युवा आधुनिक तकनीक का उपयोग करके पालीहाउस में फूलों की खेती कर रहे हैं। अब इन फूलों की मांग केवल बड़े शहरों तक ही सीमित नहीं है, बल्कि छोटे शहरों में भी बढ़ रही है, जिससे युवा किसान पारंपरिक खेती छोड़कर फूलों की खेती की ओर आकर्षित हो रहे हैं।

उच्च शिक्षित युवा आधुनिक तकनीक का उपयोग करके पालीहाउस में फूलों की खेती कर रहे हैं। अब इन फूलों की मांग केवल बड़े शहरों तक ही सीमित नहीं है, बल्कि छोटे शहरों में भी बढ़ रही है। (फाइल फोटो)
जागरण संवाददाता, मेरठ। नवंबर जा रहा है और दिसंबर दस्तक दे रहा है। मौसम में ठंडक की दस्तक और गुलाबी धूप के बीच खेतों में ओस की बूंदे मोती की भांति प्रतीत होती है। यह वही मौसम है, जब खेतों में विभिन्न प्रकार के फूलों की खुशबू महकती और बिखरती है। यह समय फूलों के लिए इसलिए भी विशेष माना जाता है, क्योंकि वैवाहिक कार्यक्रमों के चलते सजावट के लिए फूलों की अच्छी खासी डिमांड बाजार में रहती है।
सहफसली या औद्यानिक खेती करने वाले किसानों के लिए फूलों की खेती वरदान से कम नहीं है। नकदी उपार्जित फसलों में फूलों की एक अलग ही पहचान है। कुछ किसान ऐसे हैं, जो फूलों को सहफसली के रूप में लगाते हैं तो कुछ मुख्य फसल के रूप में फूलों की खेती को साल भर करते हैं। जिलेभर में यह मौसम गुलाब, रजनीगंधा, जरबेरा, ग्लेडियोलस आदि फूलों के विभिन्न रंगों व खुशबू से सराबोर है। इन दिनों खेत में लगे फूलों से लेकर बाजार तक फूलों की महक आकर्षित करने वाली होती है। स्थानीय नवीन मंडी व लोहियानगर मंडी के अलावा फूलों का उत्पादन कर दिल्ली की आजादपुर व गाजीपुर मंडी में भेजा जाता है, जहां फूलों की अच्छी कीमतें मिल जाती हैं। फूलों की विशेष खेती करने वाले कुछ प्रगतिशील किसानों के बारे में विस्तृत जानकारी पेश है...।
नीदरलैंड के टाप सीक्रेट प्रजाति का गुलाब उगा रहे विवेक
आइआइटी रुड़की से एमटेक व बैंकाक से इंटरनेशनल बिजनेस में एमबीए के बाद साकेत मानसरोवर निवासी विवेक विज गुलाब की उम्दा खेती करते हैं। दुबई, फ्रांस व आस्ट्रेलिया में आइटी सेक्टर में उच्च पदों पर नौकरी करने के बाद विवेक स्वदेश लौट आए और मेरठ-करनाल हाईवे पर भूनी चौराहे के पास पालीहाउस में गुलाब की खेती करने लगे।
विवेक कहते हैं कि नीदरलैंड बड़ा फूल उत्पादक देश है। वहां उन्होंने फूलों की खेती की नवीनतम तकनीक सीखी। इसके बाद भूनी चौराहे के पास पालीहाउस यानी सरंक्षित खेती के माध्यम से गुलाब की टाप सीक्रेट प्रजाति का उत्पादन किया। एक बंच में गुलाब के 20 फूल होते हैं। शादी के सीजन अच्छी मांग रहती है। वह गुलाब को दिल्ली के आजादपुर व गाजीपुर मंडी में बेचते हैं।
पीपलीखेड़ा में जापानी फूलों की खेती कर रहे रतन सिंह
खरखौदा के पीपलीखेड़ा में प्रगतिशील किसान रतन सिंह फूलों की खेती करते हैं। लाल रंग का ब्रासिक केल फूल के अलावा मुख्य रूप से जापानी फूल कोकोसोमा उनके खेत में लहलहाता है। गुलदाउदी, ग्लेडियोलस व रजनीगंधा की खुशबू भी उनके खेत में रहती है। वह लगभग 50 बीघा फूलों की खेती कर रहे हैं। आसपास के क्षेत्र में उन्हें फूलों की खेती के लिए जाना जाता है। जापानी फूल कोकोसोमा की खास बात यह है कि यह केवल दो माह की फसल है। यह फूल लाल, पीला व ओरेंज रंग में आता है। रतन सिंह ने 15 वर्ष पूर्व गन्ने की खेती छोड़ दी थी। पांच फूलों का एक बंडल बाजार में 250 रुपये में बिकता है। दिल्ली के अलावा स्थानीय फूल मंडी लोहियानगर में अच्छी कीमतों पर फूल बिक जाता है।
रजनीगंधा फूल की शानदार खेती करते हैं सत्यदेव आर्य
दादरी निवासी किसान सत्यदेव आर्य रजनीगंधा फूल की शानदार खेती करते हैं। यह फूल लूज फ्लावर व कट फ्लावर दो रूप में बाजार में बिकता है। सत्यदेव कहते हैं कि 24 स्पाइकस का एक बंच बनता है, जो कट फ्लावर में बिकता है, वहीं वजन के अनुसार लूज फ्लावर में एक किलो का बंच बनता है। वह पिछले दस वर्षों से रजनीगंधा की खेती कर रहे हैं। बाजार में इसका अच्छा मूल्य मिलता है।
निजी क्षेत्र की नौकरी छोड़ गुलाब की संरक्षित कर रहे दिग्विजय
सरधना क्षेत्र में सलावा निवासी प्रगतिशील किसान दिग्विजय सिंह दस सालों तक निजी क्षेत्र की प्रतिष्ठित कंपनियों में काम करने के बाद गुलाब की खेती कर रहे हैं। उनका कहना है कि एक एकड़ पालीहाउस में डच रोज प्रजाति का गुलाब लगाया था। फूलों का उत्पादन नवंबर से शुरू हो जाता है, जो अगले वर्ष मई जून तक चलता है। दिसंबर व जनवरी माह में फूलों की अच्छी कीमत बाजार में मिलती है। वह पालीहाउस से वर्ष भर में आठ से दस लाख रुपये तक का टर्न ओवर कर लेते हैं। उन्होंने सीवी रमन कालेज भुवनेश्वर से 2006 में बीटेक व 2010 में दिल्ली से एमबीए किया था। पिछले चार वर्षों से सलावा में गुलाब की सरंक्षित खेती कर रहे हैं।
ठेकेदारी छोड़कर जरबेरा की खेती करने लगे प्रदीप कुमार
बागपत रोड स्थित किठौली निवासी प्रदीप कुमार बनारस से काम छोड़कर अपने पैतृक खेती में जुट गए। उन्होंने पालीहाउस लगाकर उसमें जरबेरा फूल की खेती शुरू की। इससे पहले उनके यहां गन्ने की खेती होती थी। प्रदीप का कहना है कि दिसंबर से अप्रैल तक लाखों रुपये कीमत का फूल दिल्ली की मंडी में बेच देते है। वह फूलों की खेती से काफी प्रभावित हैं। उन्होंने ठेकेदारी का काम छोड़कर खेती को ही स्थायी तौर पर अपना रोजगार चुन लिया है।
दिल्ली की आजादपुर व गाजीपुर मंडी में होती है खपत
फूलों की खेती में यदि बाजार की बात की जाए तो दिल्ली से मात्र एक घंटे की दूरी होने के कारण इसका लाभ किसानों को मिलता है। औद्यानिक फसलों में फूल, फल व सब्जी की खेती करने वाले किसान अपने उत्पाद को मेरठ की नवीन मंडी व लोहियानगर मंडी के अलावा दिल्ली में भी अच्छे दाम में बेचते हैं। इसमें मुख्य रूप से फूल है, फूल की कीमत दिल्ली के बाजार में अच्छी खासी होती है। देहरादून से ट्रांसपोर्ट वाहनों का संचालन होता है, जो प्रतिदिन राष्ट्रीय राजमार्ग से होते हुए रास्ते में अनेक स्थानों से फूलों को लेकर दिल्ली की मंडियों में पहुंचाने का कार्य करते हैं। यह व्यवस्था स्वयं फूल वाले किसानों, व्यापारियों व ट्रांसपोर्टर ने संयुक्त रूप से बना रखी है। छह जगह से एक ही वाहन में फूल दिल्ली ले जाना, अलग-अलग किसानों के जाने से अधिक सुलभ व औसत खर्च में संभव हो जाता है।
जिले में फूलों की खेती पर एक नजर
गुलाब : 24 हेक्टेयर
गेंदा : 309 हेक्टेयर
ग्लेडियोलस : 42 हेक्टेयर
जरबेरा : 15 हेक्टेयर
रजनीगंधा : 10 हेक्टेयर

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