मगहर में बंदरों को पकड़कर जंगल में छोड़ने का हाईकोर्ट ने दिया आदेश, हमले में घायल हो चुके हैं कई लोग
मगहर के लाल बंदरों के आतंक से परेशान होकर निवासियों ने हाईकोर्ट में याचिका दायर की। अदालत ने नगर पंचायत को बंदरों को पकड़कर जंगल में छोड़ने का आदेश दिया है। बंदरों ने घरों में उत्पात मचा रखा था, जिससे कई लोग घायल हो चुके थे। शिकायतों के बाद भी कार्रवाई नहीं होने पर याचिका दायर की गई थी। अदालत ने इस मामले में तत्काल कार्रवाई करने का आदेश दिया।

तस्वीर का इस्तेमाल प्रतीकात्मक प्रस्तुतीकरण के लिए किया गया है। जागरण
संवाद सूत्र, मगहर। लाल बंदरों के आतंक से परेशान मगहर कस्बावासियों ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया तो इसके सुखद परिणाम सामने आए। बंदरों के हमले में लोगों के घायल होने और घर की छत और बाहर रखे सामान को नुकसान पहुंचने से आजिज होकर नगर पंचायत लेकर जिले के अन्य अधिकारियों से गुहार लगाई। सब तरफ से निराश लोगों ने इस समस्या के समाधान के लिए कस्बे के जागरूक एवं बुद्धिजीवी नागरिक पुष्पेश नंदन रावत को अपनी पीड़ा बताई। आम लोगों की पीड़ा को देखते हुए रावत ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय में जनहित याचिका दाखिल किया।
चीफ जस्टिस अरुण भंसाली एवं जस्टिस क्षितिज शैलेंद्र की डबल बेंच ने नगर पंचायत को बंदरों को पकड़कर जंगल में छोड़ने का आदेश दिया है।मगहर कस्बे के काजीपुर, मोहनलालपुर, तिवारी टोला, आजाद नगर समेत कई वार्डों में लाल मुंह वाले बंदर वर्षों से उत्पात मचा रहे हैं।
ये बंदर घरों की छतों, गलियों और पेड़ों पर समूह बनाकर रहते हैं तथा घरों की छतों पर सूख रहे कपड़ों को फाड़ने, खाने-पीने की सामग्री छीनकर भाग जाने जैसी घटनाओं को अंजाम देते हैं। इनके हमलों में अब तक दर्जनों लोग घायल हो चुके हैं, जिससे आमजन में भय का माहौल है। राहगीर भी इनके अचानक हमले से गिरकर चोटिल हो जाते हैं।
लगातार शिकायतों के बावजूद एक महीने पहले बंदरों को पकड़ने की कार्रवाई रस्म अदायगी बनकर रह गई। इससे लेकर पुष्पेश नंदन रावत ने पहले नगर पंचायत चेयरमैन, अधिशासी अधिकारी, जिलाधिकारी, प्रभागीय वनाधिकारी, क्षेत्रीय वनाधिकारी, प्रमुख सचिव नगर विकास विभाग और वन विभाग को पत्र भेजकर कार्रवाई की मांग की थी।
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समाधान न मिलने पर उन्होंने 27 नवंबर को जनहित याचिका (पीआइएल) दायर की। सुनवाई के दौरान याची के वरिष्ठ अधिवक्ता रविन्द्र प्रकाश श्रीवास्तव ने अपने तर्क प्रस्तुत किए, जिसके बाद अदालत ने नगर पंचायत के चेयरमैन और अधिशासी अधिकारी को बंदरों को पकड़ने और उन्हें जंगल में छोड़ने का आदेश दिया।

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