Uttarkashi: जीएसआइ की रिपोर्ट में हुआ खुलासा, मिट्टी की पानी सोखने की क्षमता खत्म होते ही टूटी थी आपदा
भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण (जीएसआइ) के निदेशक डॉ रवि नेगी ने धराली आपदा के कारणों पर अध्ययन साझा किया। उन्होंने बताया कि श्रीकंठ पर्वत क्षेत्र में भारी मात्रा में मलबा जमा था। 3 से 5 अगस्त के बीच भारी वर्षा हुई जिससे खीर गंगा के ऊपरी जलग्रहण क्षेत्र का मलबा ढीला हो गया। लगभग 5500 मीटर की ऊंचाई से यह मलबा 7 किलोमीटर तक बहकर धराली में फैल गया।

सुमन सेमवाल, देहरादून। धराली आपदा के कारणों की थाह लेकर लौटे भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण (जीएसआइ) के निदेशक डा रवि नेगी ने शुक्रवार को अपना अध्ययन साझा किया।
उन्होंने ''''भूस्खलन आपदा जोखिम न्यूनीकरण: विज्ञान और प्रशासन के माध्यम से जागरूकता और प्रतिक्रिया को सुदृढ़ बनाना'''' विषय पर आयोजित कार्यशाला में बताया कि करीब 5500 मीटर की ऊंचाई पर हुई मौसमी घटना ने किस तरह धराली को तबाह कर दिया।
श्रीकंठ पर्वत क्षेत्र में हजारों टन मलबे के ढेर
हरिद्वार बाईपास रोड स्थित होटल प्राइड प्रीमियर सालिटेयर में आयोजित कार्यशाला में धराली आपदा पर प्रस्तुतीकरण देते हुए जीएसआइ निदेशक डा रवि ने कहा कि श्रीकंठ पर्वत क्षेत्र में हजारों टन मलबे के ढेर थे।
मौसम विभाग के वर्षा के आंकड़ों पर गौर करें तो 03 से 05 अगस्त के बीच भारी वर्षा हुई। यह वर्षा औसतन 45 एमएम से अधिक थी। 05 अगस्त को औसत वर्ष 50 एमएम को पार कर गई थी। उच्च हिमालयी क्षेत्रों में मौसम नम रहता है। ऐसे में 35 एमएम की वर्षा भी अत्यधिक होती है।
ऐसे में स्पष्ट होता है कि लगातार तीन दिन की भारी वर्षा ने खीर गंगा के अपर कैचमेंट (ऊपरी जलग्राही क्षेत्र) में मलबे को बेहद ढीला कर दिया था। वर्षा का पानी मलबे में समाता रहा और जब उसकी क्षमता समाप्त हो गई या वह पूरी तरह घुलनशील हो गया था करीब 5500 मीटर की ऊंचाई से लगभग 07 किलोमीटर का सफर तय करते हुए पूरे वेग से धराली में पसर गया।
चूंकि, खीर गंगा कैचमेंट का ढाल औसतन 35 डिग्री का है, ऐसे में घुलनशील अवस्था का मलबा लगभग बहते हुए अंदाज में आया। जिस तरह यह मलबा पंखे के आकार में पूरे धराली को जमींदोज करते हुए पसरा है, उससे भी साफ होता है कि ऊपरी क्षेत्रों में वर्षा के कारण यह पूरी तरह घुलनशील बन गया था।
मिट्टी की प्रकृति की जांच से पता चलेगी क्षमता
एक सवाल के जवाब में जीएसआइ के निदेशक रवि नेगी ने कहा कि खीर गंगा के ऊपरी क्षेत्रों में जमा मलबे की मिट्टी की प्रकृति का पता लगाया जा सकता है। जिससे यह साफ हो सकेगा कि उसके पानी सोखने की क्षमता कितनी है। इसके लिए मिट्टी की प्रकृति की जांच की आवश्यकता होगी।
एवलांच या हिमखंड टूटने के नहीं मिले प्रमाण
जीएसआइ के निदेशक ने प्रस्तुतीकरण के माध्यम से यह भी स्पष्ट किया कि खीर गंगा के उद्गम स्थल श्रीकंठ पर्वत क्षेत्र में हिमखंड टूटने के कोई प्रमाण नहीं मिले। ऐसे में निरंतर भारी वर्षा के अलावा और कोई कारण धराली आपदा के पीछे नजर नहीं आते हैं।
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