आपदा से छलनी हो रहे उत्तराखंड के पहाड़, रिसर्च में खुलासा; एक वर्ग किमी क्षेत्र में मिले 3500 भूस्खलन
भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण (जीएसआई) की कार्यशाला में दून विश्वविद्यालय ने उत्तराखंड में बढ़ते भूस्खलन पर चिंता व्यक्त की। 2010 से 2021 के बीच प्रति वर्ग किलोमीटर में 3500 भूस्खलन हुए। शोध में सड़क निर्माण में तेजी और अवैज्ञानिक निर्माण को इसका कारण बताया गया। शहरीकरण और नदियों के किनारे निर्माण भी आपदा का कारण बन सकते हैं क्योंकि नदियाँ अपना मार्ग बदल सकती हैं।

जागरण संवाददाता, देहरादून। उत्तराखंड के पहाड़ आपदा से किस कदर छलनी हो रहे हैं, इस पर भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण (जीएसआइ) की कार्यशाला में दून यूनिवर्सिटी के भूविज्ञान विभाग की ओर से प्रस्तुतीकरण दिया गया। साथ ही बताया गया कि शहरीकरण और व्यवसायीकरण की दौड़ किस तरह नागरिकों के जीवन पर भारी पड़ सकती है।
दून यूनिवर्सिटी की वरिष्ठ शोधार्थी नेहा चौहान ने बताया कि वर्ष 2010 से 2021 के बीच राज्य में भूस्खलन की घटनाएं तेजी से बढ़ी हैं। इस अवधि में प्रति वर्ग किलोमीटर में 3500 भूस्खलन पर गए हैं। उन्होंने सड़क निर्माण में तेजी के साथ पहाड़ों के कमजोर होने की कड़ी को भी जोड़ा। वरिष्ठ शोधार्थी नेहा के अनुसार वर्ष 2000 से अब तक राष्ट्रीय राजमार्गों में 490 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई है। सड़क निर्माण में पूरी तरह वैज्ञानिक विधि का प्रयोग न किए जाने से भी नए भूस्खलन जोन बन रहे हैं।
इसके अलावा उन्होंने शहरीकरण और व्यवसायीकरण की दौड़ के दुष्परिणाम भी सामने रखे। बताया कि अधिकरण नगरीकरण फ्लड प्लेन के ऊपर या पूर्व में आई आपदा में बने पंखे के आकार के मलबे के मैदान के ऊपर किया गया है। यह याद रखना होगा कि फ्लड प्लेन और पंखे के आकार के मलबे के मैदान बताते हैं कि यह प्रकृति का क्षेत्र है। नदियों के जलग्राही क्षेत्रों में इस तरह स्थल हमेशा एक जैसे नहीं रह सकते। ऐसे स्थलों पर कभी भी नदी अपने पूर्व रूप में लौट सकती है।
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