चारधाम यात्रा का पहला पड़ाव यमुनोत्री और अंतिम पड़ाव बदरीनाथ क्यों... क्या लिखा है पुराणों में
चारधाम यात्रा शुरू होने में अब कुछ ही दिनों का समय बाकी है। अनुमान है कि इस वर्ष भी यात्रा के पूर्व के रिकॉर्ड टूटेंगे। इन सबके बीच हमें यह जानना जरूरी है कि इस यात्रा की शुरुआत यमुनोत्री धाम से क्यों होती है। और क्या वजह है कि बदरनीथ के दर्शन के बाद इसे पूर्ण माना जाता है। पुराणों में इस पर क्या लिखा है।

जागरण संवाददाता, देहरादून। हिमालय की चारधाम यात्रा का प्रथम पड़ाव है यमुनोत्री धाम। यमुना को भक्ति का उद्गम माना गया है, सो पुराणों में सर्वप्रथम यमुना के दर्शन की सलाह दी गई है। अंतर्मन में भक्ति का संचार होने पर ही ज्ञान के चक्षु खुलते हैं और ज्ञान की अधिष्ठात्री हैं साक्षात सरस्वती स्वरूपा गंगा।
ज्ञान ही जीव में वैराग्य का भाव जगाता है, जिसकी प्राप्ति बाबा केदार के दर्शन से ही संभव है। जीवन का अंतिम सोपान है मोक्ष और वह बदरीनाथ धाम के सिवा और कहां मिल सकता है। इसलिए पुराण कहते हैं, जीवन में जब कुछ पाने की इच्छा शेष न रह जाए, तब भगवान बदरी नारायण की शरण में चले जाना चाहिए।
पंजीकरण की स्थिति
धाम | सोमवार | कुल पंजीकरण | ||
यमुनोत्री | 3,696 | 3,10,755 | ||
गंगोत्री | 4,980 | 3,44,278 | ||
केदारनाथ | 9,637 | 6,58,149 | ||
बदरीनाथ | 9,413 | 5,83,747 | ||
हेमकुंड साहिब | 1,004 | 33,450 |
यमुनोत्री
उत्तरकाशी जिले में 10,804 फीट की ऊंचाई पर स्थित यमुनोत्री धाम को चारधाम यात्रा का प्रथम पड़ाव और यमुना नदी का उद्गम माना गया है। हालांकि, यमुना का वास्तविक स्रोत जमी हुई बर्फ की एक झील और हिमनद चंपासर ग्लेशियर है, जोकि समुद्रतल से 4,421 मीटर की ऊंचाई पर कालिंद पर्वत पर स्थित है। यमुनोत्री मंदिर के गर्भगृह में देवी यमुना की काले संगमरमर की मूर्ति विराजमान है। यहां चट्टान से गिरती तप्त जलधाराएं "ओउम्’ सदृश ध्वनि उत्पन्न करती हैं।
गंगोत्री
उत्तरकाशी जिले में 10,300 फीट की ऊंचाई पर ग्रेटर हिमालय रेंज में स्थित गंगोत्री धाम को गंगा का उद्गम माना गया है। हालांकि, गंगा का उद्गम स्रोत यहां से लगभग 19 किमी दूर गोमुख स्थित गंगोत्री ग्लेशियर में 3,892 मीटर की ऊंचाई पर है। मान्यता है कि श्रीराम के पूर्वज एवं रघुकुल के चक्रवर्ती राजा भगीरथ की तपस्या से प्रसन्न होकर शिव कृपा से देवी गंगा ने इसी स्थान पर धरती का स्पर्श किया। यहां शिवलिंग के रूप में एक नैसर्गिक चट्टान भागीरथी नदी में जलमग्न है।
केदारनाथ
रुद्रप्रयाग जिले में 11,657 फीट की ऊंचाई पर मंदाकिनी व सरस्वती नदी के संगम पर स्थित केदारनाथ धाम पंच केदार में से भी एक है। मंदिर के गर्भगृह में स्वयंभू शिवलिंग विराजमान है। मंदिर छह फीट ऊंचे चौकोर चबूतरे पर बना हुआ है। मंदिर में मुख्य भाग मंडप और गर्भगृह के चारों ओर प्रदक्षिणा पथ है। कहते हैं कि आठवीं सदी में चारों दिशाओं में चारधाम स्थापित करने के बाद 32 वर्ष की आयु में आदि शंकराचार्य ने केदारनाथ धाम में ही समाधि ली।
बदरीनाथ
चमोली जिले में 10,277 फीट की ऊंचाई पर अलकनंदा नदी के किनारे स्थित भू-वैकुंठ बदरीनाथ धाम भगवान विष्णु को समर्पित है। इसे देश के पौराणिक चारधाम में सर्वश्रेष्ठ बताया गया है। शंकुधारी शैली में बने 15 मीटर ऊंचे इस मंदिर के शिखर पर गुंबद है और गर्भगृह में श्रीविष्णु के साथ नर-नारायण ध्यानावस्था में विराजमान हैं। शालिग्राम पत्थर से बनी श्रीविष्णु की मूर्ति एक मीटर ऊंची है। मान्यता है कि इसे आदि शंकराचार्य ने आठवीं सदी के आसपास नारद कुंड से मंदिर के गर्भगृह में प्रतिष्ठित किया था।
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