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    शक्सगाम घाटी पर चीन के दावों को भारत ने बताया अवैध, कहा- अपने हितों की रक्षा के लिए उठाएंगे कदम

    Updated: Mon, 12 Jan 2026 07:52 PM (IST)

    चीन ने शक्सगाम घाटी पर अपने दावों को दोहराते हुए बुनियादी ढांचा परियोजनाओं को उचित बताया। भारत ने इसे अवैध करार दिया, जोर देकर कहा कि यह भारतीय क्षेत् ...और पढ़ें

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    शक्सगाम घाटी। (फोटो- विकिमीडिया कॉमन्स) 

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    डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। भारत की आपत्तियों के बावजूद चीन ने सोमवार को एक बार फिर शक्सगाम घाटी पर अपने क्षेत्रीय दावों को दोहराते हुए इस बात पर जोर दिया कि इस इलाके में उसकी बुनियादी ढांचा परियोजनाएं बिल्कुल उचित हैं।

    भारत ने शुक्रवार को शक्सगाम घाटी में चीन की अवसंरचना विकास परियोजनाओं की आलोचना करते हुए कहा था कि चूंकि यह भारतीय क्षेत्र है, इसलिए उसके पास अपने हितों की रक्षा के लिए आवश्यक कदम उठाने का अधिकार है। 'हमने तथाकथित चीन-पाक सीमा समझौते को कभी मान्यता नहीं दी'

    गौरतलब है कि काराकोरम-पार क्षेत्र या शक्सगाम वादी लगभग 5,200 वर्ग किमी का इलाका है जो कश्मीर के उत्तरी काराकोरम पर्वतों में शक्सगाम नदी के दोनों ओर फैला हुआ है। यह भारत के जम्मू और कश्मीर राज्य का हिस्सा हुआ करता था। पाकिस्तान ने अवैध रूप से कब्जाए गए भारतीय क्षेत्र में से शक्सगाम घाटी के 5,180 वर्ग किलोमीटर हिस्से को 1963 में अवैध रूप से चीन को सौंप दिया था।

    विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने कहा, “शक्सगाम घाटी भारतीय क्षेत्र है। हमने 1963 में किए गए तथाकथित चीन-पाकिस्तान 'सीमा समझौते' को कभी मान्यता नहीं दी है। हम लगातार यह कहते आए हैं कि यह समझौता अवैध और अमान्य है। हम तथाकथित चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे (सीपीईसी) को भी मान्यता नहीं देते हैं क्योंकि यह भारतीय क्षेत्र से होकर गुजरता है, जिस पर पाकिस्तान का अवैध और जबरन कब्जा है।''

    अपने ही क्षेत्र में बुनियादी ढांचागत गतिविधि आलोचना से परे : माओ

    जायसवाल की टिप्पणियों पर प्रतिक्रिया देते हुए चीनी विदेश मंत्रालय की प्रवक्ता माओ निंग ने यहां एक मीडिया ब्रीफिंग में कहा कि “सबसे पहले तो जिस क्षेत्र का आपने उल्लेख किया है वह चीन का हिस्सा है।'' भारत की आलोचना पर पूछे गए एक सवाल का जवाब देते हुए उन्होंने कहा, ''चीन द्वारा अपने क्षेत्र में की जा रही बुनियादी ढांचागत गतिविधियां आलोचना से परे हैं।''

    माओ ने कहा कि चीन और पाकिस्तान ने 1960 के दशक से सीमा समझौता किया था और दोनों देशों के बीच की सीमा निर्धारित की गई थी। उन्होंने कहा कि यह संप्रभु राष्ट्रों के रूप में चीन और पाकिस्तान का अधिकार है।

    'सीपीईसी से कश्मीर मुद्दे पर चीन के रुख पर नहीं होगा कोई असर'

    सीपीईसी पर भारत की आलोचना के जवाब में माओ ने बीजिंग के पुराने रुख को दोहराया कि यह एक आर्थिक पहल है जिसका उद्देश्य स्थानीय स्तर पर आर्थिक और सामाजिक विकास करना और लोगों के जीवन स्तर में सुधार लाना है।

    उन्होंने कहा, “इस तरह के समझौते और सीपीईसी से कश्मीर मुद्दे पर चीन के रुख पर कोई असर नहीं पड़ेगा और इस संबंध में चीन का रुख अपरिवर्तित है।''

    कश्मीर मुद्दे पर चीन का आधिकारिक रुख, जिसे बीजिंग अक्सर दोहराता है, यह है कि “जम्मू और कश्मीर विवाद इतिहास का हिस्सा है और इसे संयुक्त राष्ट्र चार्टर, संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के संबंधित प्रस्तावों और द्विपक्षीय समझौतों के अनुसार उचित और शांतिपूर्ण तरीके से हल किया जाना चाहिए।''

    शक्सगाम घाटी में चीन के अवसंरचना विकास से संबंधित एक प्रश्न के उत्तर में जायसवाल ने कहा, “जम्मू-कश्मीर तथा लद्दाख भारत के अभिन्न और अविभाज्य अंग हैं। यह बात पाकिस्तानी और चीनी अधिकारियों को कई बार स्पष्ट रूप से बताई जा चुकी है।''

    (समाचार एजेंसी पीटीआई के इनपुट के साथ)