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    गृहयुद्ध से ग्रस्त सूडान को हथियार बेचेगा पाकिस्तान! 'मेड इन चाइना' JF-17 से पैसे कमाने की तैयारी

    Updated: Fri, 16 Jan 2026 05:20 PM (IST)

    पाकिस्तान सूडान को 1.5 अरब डॉलर के लड़ाकू विमान और हथियार बेचने की तैयारी में है, जिससे गृहयुद्ध प्रभावित हो सकता है। यह कदम अरब और अफ्रीकी देशों में ...और पढ़ें

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    गृहयुद्ध से ग्रस्त सूडान को हथियार बेचेगा पाकिस्तान मेड इन चाइना JF-17 से पैसे कमाने की तैयारी (फोटो सोर्स- सोशल मीडिया)

    डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। सऊदी अरब से लेकर सूडान और लीबिया तक, पाकिस्तान की सैन्य मौजूदगी और हथियारों की पहुंच लगातार बढ़ रही है। हालिया रिपोर्टों के मुताबिक पाकिस्तान सूडान को लड़ाकू विमान और हथियार बेचने की तैयारी में है। यह डील न सिर्फ सूडान के गृहयुद्ध को प्रभावित कर सकती है, बल्कि अरब दुनिया में पाकिस्तान की भूमिका को भी नया रूप दे सकती है।

    पाकिस्तान और सूडान के बीच लगभग 1.5 अरब डॉलर की डील पर बातचीत चल रही है। रॉयटर्स की रिपोर्ट के अनुसार यह समझौता जल्द अंतिम रूप ले सकता है। सूडान पिछले करीब तीन साल से गृहयुद्ध की आग में झुलस रहा है, जहां सेना और अर्धसैनिक बल रैपिड सपोर्ट फोर्स (RSF) के बीच लड़ाई चल रही है। इस युद्ध में हजारों लोग मारे जा चुके हैं और लाखों बेघर हो चुके हैं। RSF पर महिलाओं और बच्चों तक के साथ यौन हिंसा के गंभीर आरोप लगे हैं।

    यह सौदा पाकिस्तान की उस रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है, जिसके तहत वह अरब और अफ्रीकी देशों में अपने हथियार और सैन्य असर को बढ़ा रहा है। पहले पाकिस्तान मुख्य रूप से अरब देशों की सेनाओं को ट्रेनिंग देता था, लेकिन अब वह सीधे हथियार और लड़ाकू विमान बेचने की दिशा में बढ़ रहा है।

    सऊदी अरब से सैन्य साझेदारी

    पाकिस्तान की बढ़ती सैन्य मौजूदगी की नींव सऊदी अरब के साथ हुए 'स्ट्रैटेजिक म्यूचुअल डिफेंस एग्रीमेंट (SMDA)' से जुड़ी है। यह समझौता पिछले साल सितंबर में हुआ था। इसके बाद खबरें आईं कि सऊदी अरब पाकिस्तान के JF-17 थंडर लड़ाकू विमान में दिलचस्पी दिखा रहा है।

    हालांकि सऊदी अरब के पास पहले से अमेरिका और यूरोप के अत्याधुनिक लड़ाकू विमान हैं और वह F-35 जैसे आधुनिक जेट भी खरीद रहा है। फिर भी विशेषज्ञों का कहना है कि बदलते वैश्विक हालात में सऊदी अरब अपने रक्षा साझेदारों में विविधता चाहता है। पाकिस्तान को एक भरोसेमंद साझेदार माना जा रहा है, खासकर चीन के साथ उसके मजबूत रक्षा सहयोग के कारण।

    JF-17 क्यों है आकर्षक?

    JF-17 थंडर पाकिस्तान और चीन द्वारा मिलकर बनाया गया हल्का और बहुउद्देश्यीय लड़ाकू विमान है। इसका निर्माण पाकिस्तान एयरोनॉटिकल कॉम्प्लेक्स और चीन की चेंगदू एयरक्राफ्ट कंपनी मिलकर करती हैं। इसका नया ब्लॉक-3 वर्जन आधुनिक रडार, इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर सिस्टम और लंबी दूरी की मिसाइलें दागने की क्षमता रखता है।

    एक JF-17 की कीमत लगभग 25 से 30 मिलियन डॉलर है, जो पश्चिमी लड़ाकू विमानों के मुकाबले काफी कम है। यही वजह है कि कम बजट वाले देशों के लिए यह एक किफायती विकल्प बनता है। मई 2025 में भारत-पाकिस्तान के बीच हुए सीमित सैन्य टकराव के बाद इस विमान की चर्चा और बढ़ गई, क्योंकि इसे लड़ाई में परखा हुआ माना जाने लगा।

    सूडान, लीबिया और मुश्किल संतुलन

    रिपोर्टों के मुताबिक पाकिस्तान सूडान की सेना को JF-17 देने की तैयारी में है। वहीं लीबिया में भी विद्रोही नेता खलीफा हफ्तार के साथ हथियार सौदे की खबरें हैं। समस्या यह है कि अरब दुनिया में कई देश अलग-अलग गुटों का समर्थन करते हैं। सूडान में जहां सऊदी अरब सेना के साथ माना जाता है, वहीं यूएई पर RSF को समर्थन देने के आरोप लगते रहे हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि पाकिस्तान को बेहद संभलकर चलना होगा, क्योंकि एक ही तरह के हथियार विरोधी पक्षों तक पहुंचने से कूटनीतिक रिश्ते खराब हो सकते हैं।

    पाकिस्तान अभी भी दुनिया के बड़े हथियार आयातकों में है, लेकिन उसका डिफेंस एक्सपोर्ट तेजी से बढ़ा है। पाकिस्तान के केंद्रीय बैंक के आंकड़ों के अनुसार 2022-23 में हथियार निर्यात 13 मिलियन डॉलर से बढ़कर 400 मिलियन डॉलर से ज्यादा हो गया।

    अनुमान है कि JF-17 से जुड़े मौजूदा और संभावित सौदे पाकिस्तान को 13 अरब डॉलर तक कमा कर दे सकते हैं। इससे विदेशी मुद्रा भंडार को बड़ी राहत मिल सकती है। हालांकि कुछ विशेषज्ञ मानते हैं कि इन डील्स को लेकर फिलहाल ज्यादा चर्चा हो रही है, लेकिन जमीन पर कितनी डील्स पूरी होंगी, यह अभी देखना बाकी है।

    बदलती वैश्विक हथियार राजनीति

    दुनिया अब एक मल्टीपोलर आर्म्स मार्केट की ओर बढ़ रही है। अमेरिका सबसे बड़ा हथियार निर्यातक है, जबकि चीन तेजी से अपनी हिस्सेदारी बढ़ा रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि JF-17 जैसे विमान किसी के खिलाफ नहीं, बल्कि देशों के लिए विकल्प बढ़ाने का जरिया हैं। अमेरिका भी इसे नकारात्मक रूप में नहीं देख रहा, क्योंकि क्षेत्रीय सुरक्षा की जिम्मेदारी अब ज्यादा स्थानीय साझेदारों पर डाली जा रही है।

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