इधर कुआं उधर खाई... ईरान संकट पर चौतरफा घिरा पाकिस्तान, अब आगे क्या होगा?
ईरान में बढ़ते राजनीतिक तनाव और अमेरिकी सैन्य कार्रवाई की आशंकाओं के बीच पाकिस्तान गंभीर रणनीतिक संकट में है। अमेरिका द्वारा पाकिस्तानी धरती के इस्तेम ...और पढ़ें

ईरान संकट पर चौतरफा घिरा पकिस्तान
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डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। ईरान में गहराते राजनीतिक तनाव और अमेरिकी सैन्य कार्रवाई की आशंकाओं के बीच पाकिस्तान खुद को गंभीर रणनीतिक संकट में घिरा महसूस कर रहा है।
एक ओर अमेरिका द्वारा ईरान पर संभावित हमलों के लिए पाकिस्तानी धरती और हवाई क्षेत्र के इस्तेमाल का दबाव है, तो दूसरी ओर डूरंड लाइन पर सक्रिय अफगानिस्तान समर्थित आतंकी संगठन इस मौके का लाभ उठाकर पाकिस्तान सेना पर हमले तेज कर सकते हैं।
ऐसी किसी भी स्थिति में इस्लामाबाद इस्लामिक देशों और घरेलू जनता, दोनों की नजरों में कठघरे में खड़ा हो जाएगा।
अमेरिका के दबाव में पाकिस्तान
सरकारी सूत्रों के अनुसार हालात की नजाकत को देखते हुए सेना प्रमुख जनरल आसिम मुनीर, ISI प्रमुख जनरल आसिम मलिक और सदर्न कमांडर लेफ्टिनेंट जनरल राहत नसीम समेत शीर्ष सुरक्षा अधिकारी लगातार आपात बैठकें कर रहे हैं।
उन्हें आशंका है कि अमेरिका-ईरान युद्ध की स्थिति में पाकिस्तान से लगी ईरानी सीमा अत्यधिक संवेदनशील हो जाएगी और इसका सीधा असर अफगान सीमा पर भी पड़ेगा।डूरंड लाइन पर बढ़ेगा आतंक का खतराखुफिया आकलनों के मुताबिक तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (टीटीपी) और बलूचिस्तान नेशनलिस्ट आर्मी (बीएलए) जैसे संगठन संघर्ष का फायदा उठाकर सुरक्षा बलों पर हमले तेज कर सकते हैं।
डूरंड लाइन पर टीटीपी
गुलाम जम्मू-कश्मीर (पीओजेके) में भी अस्थिरता बढ़ने की आशंका जताई जा रही है। मानव संसाधन की कमी से जूझ रही पाक सरकार पर यह विचित्र दबाव है कि वह आइएसकेपी और लश्कर-ए-तैयबा जैसे समूहों का सहारा लेकर टीटीपी-बीएलए से मुकाबला करे।
अमेरिका के दबाव में फंसता इस्लामाबादशुरुआत में पाकिस्तान को लगा था कि वाशिंगटन की चेतावनियां केवल कूटनीतिक दबाव हैं, लेकिन अब अधिकारियों को सैन्य टकराव की आशंका वास्तविक लगने लगी है।
सूत्रों का कहना है कि संघर्ष की स्थिति में अमेरिका पाकिस्तान के सैन्य अड्डों और हवाई क्षेत्र का उपयोग कर सकता है, जिससे क्षेत्रीय समीकरणों में इस्लामाबाद की स्थिति बेहद कमजोर हो जाएगी।
ट्रंप प्रशासन के साथ रिश्ते सुधारने की कोशिशों में पाकिस्तान यह आकलन नहीं कर पाया कि उसे इसकी भारी कीमत चुकानी पड़ सकती है।
घरेलू नाराजगी और कूटनीतिक दुविधा
तालिबान से संघर्ष के कारण पहले से असंतोष झेल रही पाकिस्तानी जनता अमेरिका को दिए किसी भी परोक्ष समर्थन से और भड़क सकती है।
इससे इस्लामिक देशों के खिलाफ मिलीभगत के आरोप लगेंगे और आंतरिक अस्थिरता बढ़ेगी। इंटेलिजेंस ब्यूरो के सूत्रों के अनुसार जनता चाहती है कि सरकार अमेरिका को लेकर स्पष्ट रुख अपनाए, जबकि एस्टैब्लिशमेंट नए बने संबंधों को जोखिम में डालने से बचना चाहता है।
शरणार्थियों का नया संकटयुद्ध की दशा में ईरान से बड़ी संख्या में शरणार्थियों के पाकिस्तान आने की आशंका है, जो पहले से चरमराई अर्थव्यवस्था और सुरक्षा ढांचे पर भारी दबाव डालेगा।
इस्लामाबाद ने सऊदी अरब और तुर्किए के जरिये कूटनीतिक चैनल खोलकर अपनी चिंताएं साझा की हैं, लेकिन समाधान आसान नहीं दिखता।
डॉ. शकील की रिहाई का मामला
अमेरिकी संसद में पाकिस्तान को 3.3 करोड़ डालर की मदद रोकने का प्रस्ताव अमेरिकी कांग्रेस में पेश वित्त वर्ष 2026 के फंडिंग बिल में पाकिस्तान को दी जाने वाली अमेरिकी सहायता के एक हिस्से को रोकने का प्रस्ताव रखा गया है।
12 जनवरी को रिपब्लिकन सांसद टाम कोल द्वारा पेश विधेयक के मुताबिक पाकिस्तान के लिए निर्धारित राशि में से 3.3 करोड़ डालर तब तक रोके जाएंगे, जब तक अमेरिकी विदेश मंत्री यह प्रमाणित नहीं करते कि डॉ. शकील आफरीदी को जेल से रिहा कर दिया गया है और ओसामा बिन लादेन का पता लगाने में अमेरिका की मदद करने से जुड़े सभी आरोपों से उन्हें बरी कर दिया गया है।
बता दें कि डॉ. आफरीदी को 2011 में पाकिस्तान में हिरासत में लिया गया था। उनकी कैद लंबे समय से अमेरिका- पाकिस्तान संबंधों में एक संवेदनशील मुद्दा बनी हुई है।

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