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    आसान नहीं है ट्रंप के लिए ग्रीनलैंड को हड़पना, डेनमार्क की संप्रभुता से सीधी टक्कर

    Updated: Sun, 11 Jan 2026 02:00 AM (IST)

    व्हाइट हाउस तक यह कह चुका है कि ग्रीनलैंड पर कब्जे के लिए खरीद, दबाव या सैन्य ताकत हर विकल्प मेज पर है। लेकिन जितनी धमकियों के साथ ट्रंप आगे बढ़ रहे ह ...और पढ़ें

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    आसान नहीं है ट्रंप के लिए ग्रीनलैंड को हड़पना (फोटो- रॉयटर)

    एपी, लंदन। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की राजनीति अगर किसी एक शब्द में समझनी हो, तो वह है दादागिरी। ग्रीनलैंड को लेकर भी वही रुख सामने आया है। ट्रंप ने खुले शब्दों में कह दिया कि अगर यह इलाका प्यार से अमेरिका को नहीं मिला, तो उसे जबरदस्ती लिया जाएगा।

    व्हाइट हाउस तक यह कह चुका है कि ग्रीनलैंड पर कब्जे के लिए खरीद, दबाव या सैन्य ताकत हर विकल्प मेज पर है। लेकिन जितनी धमकियों के साथ ट्रंप आगे बढ़ रहे हैं, उतनी ही सख्त हकीकत यह है कि ग्रीनलैंड को हड़पना उनके लिए आसान नहीं, बल्कि बेहद जोखिम भरा सौदा है।

    डेनमार्क की संप्रभुता से सीधी टक्कर

    ग्रीनलैंड कोई अमेरिकी कालोनी नहीं, बल्कि डेनमार्क का अर्ध-स्वायत्त क्षेत्र है। इसका मतलब साफ है कि ग्रीनलैंड पर कब्जे की कोई भी कोशिश सीधे डेनमार्क की संप्रभुता पर हमला मानी जाएगी। अंतरराष्ट्रीय कानून में किसी संप्रभु देश के क्षेत्र पर जबरन कब्जा सीधा आक्रामक कदम होता है, जिसे दुनिया आसानी से स्वीकार नहीं करती।

    नाटो में टूट का खतरा

    डेनमार्क और अमेरिका दोनों नाटो के सदस्य हैं। अगर अमेरिका ने ग्रीनलैंड को लेकर सैन्य दबाव बनाया, तो यह नाटो के भीतर अभूतपूर्व टकराव होगा। डेनमार्क की प्रधानमंत्री मेटे फ्रेडरिक्सन चेतावनी दे चुकी हैं कि ऐसा कदम नोटो को अस्तित्वगत संकट में डाल सकता है।

    स्थानीय लोगों की असहमति

    ग्रीनलैंड की आबादी भले ही करीब 57 हजार हो, लेकिन उसकी अपनी राजनीतिक पहचान है। वहां के लोग न तो अमेरिका का हिस्सा बनना चाहते हैं और न ही अपनी जमीन बेचने को तैयार हैं। लोकतंत्र का दावा करने वाले अमेरिका के लिए जनता की इच्छा के खिलाफ कब्जा नैतिक रूप से भी कठिन है।

    सैन्य तर्क भी कमजोर

    अमेरिका को 1951 के रक्षा समझौते के तहत ग्रीनलैंड में पहले से सैन्य पहुंच हासिल है और वह अपनी तैनाती बढ़ा सकता है। ऐसे में कब्जे की जिद यह संकेत देती है कि मामला सुरक्षा से ज्यादा विस्तारवाद का है। रूस और चीन के खतरे का तर्क भी विशेषज्ञ बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया गया बताते हैं।

    भारी आर्थिक कीमत

    अगर अमेरिका किसी तरह ग्रीनलैंड पर नियंत्रण कर भी ले, तो उसे भारी कीमत चुकानी होगी। वहां के लोगों को डेनमार्क की नागरिकता, मुफ्त स्वास्थ्य सेवाएं और शिक्षा मिलती हैं। ऐसी सामाजिक व्यवस्था खड़ी करना अमेरिका के लिए न तो सस्ता है और न ही आसान। विशेषज्ञ मानते हैं कि यह सौदा राजनीतिक से ज्यादा आर्थिक सिरदर्द बन सकता है।

    दादागिरी से अलग-थलग पड़ता अमेरिका

    ट्रंप की धमकी और दबाव की राजनीति ग्रीनलैंड को नहीं, बल्कि अमेरिका को ही वैश्विक मंच पर अलग-थलग करने का खतरा पैदा कर रही है। सहयोगियों के बीच अविश्वास, नाटो में दरार और अंतरराष्ट्रीय कानून की अनदेखी, ये सब मिलकर साफ कर देते हैं कि तमाम शोर और ताकत के प्रदर्शन के बावजूद ग्रीनलैंड को हड़पना ट्रंप के लिए आसान नहीं, बल्कि भारी राजनीतिक जोखिम से भरा कदम है।