डॉ. स्मिता। मोदी सरकार ने भारतीय समाज में जनस्वास्थ्य और गरीबी के अंतःसंबंधों को समझते हुए जिस आयुष्मान भारत योजना का आरंभ किया था, वह निर्धन, पिछड़े और जरूरतमंद वर्गों के लिए वरदान सिद्ध हो रही है। इस योजना के अनेक आयाम हैं। आयुष्मान भारत योजना मात्र एक स्वास्थ्य बीमा योजना नहीं। यह एक व्यक्ति को गरिमापूर्ण जीवन एवं समान अवसर से जोड़ने की एक सामाजिक नीति भी है।

इस योजना का उद्देश्य सामाजिक, आर्थिक रूप से वंचित लोगों को स्वास्थ्य बीमा के माध्यम से उन्हें गुणवत्तापूर्ण जीवन प्रदान करना है। आयुष्मान भारत प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना का उद्देश्य प्रत्येक वर्ग तक उत्तम स्वास्थ्य सेवाओं की पहुंच को सुनिश्चित करना है। सीमांत पर बसे सामाजिक समूहों में इस योजना के सामाजिक प्रभाव के अध्ययन के दौरान इस योजना के आधार तल पर पड़ने वाले प्रभावों का साकार रूप देखने को तो मिला ही, साथ ही इस योजना के बहुल प्रभावों को समझने में मदद भी मिली।

गांवों में अपने फील्ड वर्क के दौरान मैंने पाया कि यह योजना समाज में वंचित वर्गों के जीवन में सकारात्मक प्रभाव डाल रही है। यह योजना स्वास्थ्य बीमा द्वारा उनके जीवन की रक्षा तो कर ही रही है, साथ ही साथ उन्हें गरीबी और कर्ज के दुष्चक्र से भी बचा रही है। इस योजना के चलते गंभीर बीमारियों का निःशुल्क उपचार और बेहतर स्वास्थ्य सुविधाओं के कारण व्यक्तियों की कार्यक्षमता में सुधार और वृद्धि दर्ज की गई है। इससे लोगों का पारिवारिक जीवन सुगम होता है और वे सामाजिक, आर्थिक दायित्वों की पूर्ति में सक्षम होते हैं।

आयुष्मान योजना के सहयोग से लाभार्थी व्यक्ति उचित स्वास्थ्य लाभ के पश्चात अपने सामाजिक-आर्थिक जीवन में पुनः वापस लौट पाता है और गुणवत्तापूर्ण जीवन प्राप्त करता है। इस प्रकार यह योजना स्वास्थ्य सुरक्षा द्वारा व्यक्ति की सामाजिक एवं आर्थिक सहभागिता, दोनों को सकारात्मक रूप से प्रभावित कर रही है। इस योजना का सबसे महत्वपूर्ण प्रभाव यह है कि यह सामाजिक समावेशन एवं स्वास्थ्य संबंधी असमानताओं को कम करने का प्रभावी माध्यम बन रही है।

भारतीय समाज और विशेषतः ग्रामीण समाज में जहां संरचनात्मक असमानताएं व्यापक स्तर पर देखने को मिलती हैं, वहां इस योजना के माध्यम से अस्पतालों की उपलब्धता, स्वास्थ्य संबंधी जागरूकता, सामाजिक भेदभाव से परे व्यापक स्तर पर कमजोर एवं वंचित वर्गों को गुणवत्तापूर्व स्वास्थ्य सेवाएं प्राप्त हो रही हैं। इस योजना के माध्यम से गंभीर बीमारी में निःशुल्क उपचार वंचित समुदाय के जीवन में जीवन की एक नई रोशनी पैदा कर रहा है।

भारत में गरीबी की दर धीरे-धीरे कम होती जा रही है, किंतु अभी भी कुल जनसंख्या का 12.4 प्रतिशत हिस्सा गरीबी रेखा के नीचे वास करता है। इस गरीबी में स्वास्थ्य पर होने वाले खर्च की बड़ी भूमिका होती है। भारत में स्वास्थ्य पर किए जाने वाले संपूर्ण व्यय का 62.6 प्रतिशत लोग अपनी जेब से करते हैं। स्वास्थ्य पर अपनी जेब से किए जाने वाले खर्च में तुलनात्मक रूप से भारत दुनिया का सबसे अग्रणी देश है। स्वास्थ्य पर अपने पास से किए जाने वाले खर्च ने भारत में गरीबी के प्रसार में बड़ी भूमिका निभाई है।

जब कोई निर्धन व्यक्ति बीमार पड़ता है तो कई बार वह सूदखोरों से कर्ज लेता है। समाज के वंचित वर्ग के लोग बड़ी संख्या में कर्ज सूदखोरों और अनौपचारिक मध्यमों से ही लेते हैं। नेशनल सैंपल सर्वे आर्गेनाइजेशन के एक आंकड़े के अनुसार भारत की गरीबी में लगभग 2.61 प्रतिशत की वृद्धि स्वास्थ्य संबंधी खर्चों के कारण होती है।

इलाज की खातिर लिया जाने वाला कर्ज चक्रवृद्धि ब्याज की तरह बढ़ता जाता है। यदि गरीब परिवार का कोई सदस्य लंबे समय तक बीमार रहकर घर या अस्पताल में रहने को बाध्य होता है तो इससे आय सृजन न हो पाने के कारण वह परिवार गरीबी की खाई में धंसता जाता है। भारत सरकार ने इन्हीं स्थितियों को समझते हुए आयुष्मान भारत योजना का आरंभ किया।

आयुष्मान भारत योजना के तहत हर गरीब परिवार को साल भर में पांच लाख रुपये तक का कैशलेस इलाज सरकारी और सूचीबद्ध अस्पतालों में मिलता है। एक आंकड़े के अनुसार अब तक कुल 12.69 करोड़ से अधिक अस्पतालों में भर्ती लोगों के इलाज में 1.92 लाख करोड़ से ज्यादा राशि का इलाज मुहैया कराया जा चुका है। इस योजना के तहत भारत में अब तक कुल 42.31 करोड़ से अधिक आयुष्मान कार्ड जारी किए जा चुके हैं।

इनमें से 49 प्रतिशत कार्ड महिलाओं और 51 प्रतिशत कार्ड पुरुषों के नाम पर बनाए गए हैं। अकेले उत्तर प्रदेश में इस योजना के तहत 5.59 करोड़ से अधिक आयुष्मान कार्ड बनाए जा चुके हैं। गांव की एक बूढ़ी महिला ने बताया कि, 'जब मुझे पेट की बीमारी हुई तो लगा अब नहीं बचेंगे। गरीब के पास अस्पताल जाने की कूव्वत कहां। बेटे को न जाने कहां से आयुष्मान योजना के बारे पता चला। उसे हासिल कर अस्पताल गए तो इलाज हुआ।'

जन स्वास्थ्य की इस योजना ने गांवों और शहरों की झुग्गी बस्तियों तक अपने प्रभाव को फैलाया है। इसने समाज के एक हिस्से को निर्धनता से मुक्त होने में मदद तो की ही है, उन्हें यह भी अहसास कराया है कि सरकार उनकी जरूरतों को समझती है और उनके प्रति संवेदनशील है।

(लेखिका समाजशास्त्री हैं)