विचार: भारतीय आकांक्षाओं को समझे अमेरिका
अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रूबियो का भारत दौरा ऐसे समय में हो रहा है जब व्यापार वार्ता और रूसी तेल खरीद को लेकर भारत-अमेरिका संबंध निर्णायक मोड़ पर हैं
HighLights
रूबियो का भारत दौरा व्यापार, ऊर्जा हितों पर केंद्रित।
रूसी तेल खरीद पर अमेरिका का भारत पर दबाव।
भारत रणनीतिक स्वायत्तता पर कायम, राष्ट्रीय हित सर्वोपरि।
हर्ष वी. पंत। अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रूबियो 17 से 22 अक्टूबर के बीच भारत में होंगे। इस दौरान वे नई दिल्ली के बजाय मुंबई और जामनगर में होंगे। उनके इस कार्यक्रम को लेकर कुछ सवाल भी उठ रहे हैं, पर लगता है फिलहाल उनकी प्राथमिकता ऊर्जा एवं वाणिज्यिक हितों से जुड़ी हुई अधिक है। जो भी हो, उनका यह दौरा तब हो रहा है, जब भारत-अमेरिका संबंध एक निर्णायक मोड़ पर है, जब व्यापार वार्ता अधर में अटकी है और रूसी तेल की खरीद को लेकर वाशिंगटन भारत पर दबाव बढ़ा रहा है।
ऐसे में रूबियो का दौरा काफी हद तक यह तय करेगा कि क्या ट्रंप प्रशासन अपने व्यावहारिक लेनदेन वाले दृष्टिकोण और भारत को दिए जाने वाले रणनीतिक महत्व के बीच अपेक्षित तालमेल बना पाता है या नहीं? सवाल यह भी है कि क्या अमेरिका भारत के साथ ऐसी गहरी साझेदारी बना सकता है, जिसमें नई दिल्ली को दोस्ती निभाने के लिए अपने राष्ट्रीय हितों को ताख पर न रखना पड़े?
भारत अमेरिका के साथ अपने संबंधों की अहमियत भलीभांति समझता है, लेकिन रणनीतिक निकटता का मतलब रणनीतिक अधीनता नहीं है। भारत की विदेश नीति की नींव आज भी 'रणनीतिक स्वायत्तता' पर टिकी है और उसके तमाम वैश्विक गठजोड़ राष्ट्रीय हितों को साधने के माध्यम ही हैं। वाशिंगटन के सामने असल चुनौती इसी बारीक अंतर को समझने की है। भारत अमेरिका के साथ कंधे से कंधा मिलाकर सहयोग को तैयार तो है, पर इस साझेदारी की शर्तें केवल अमेरिकी महत्वाकांक्षाओं से तय नहीं होंगी। उनमें भारतीय प्राथमिकताओं का अक्स भी झलकना चाहिए।
अमेरिका को अपनी 'टैरिफ कूटनीति' की सीमाओं को भी पहचानना होगा। याद रहे कि आर्थिक दबाव सामने वाले को वार्ता के लिए तैयार तो कर सकता है, लेकिन इससे रियायतें सुनिश्चित नहीं हो सकतीं। जरूरत से ज्यादा दबाव का एक नतीजा यह भी हो सकता है कि भारत अपने बाजारों और आपूर्ति शृंखलाओं में विविधीकरण पर जोर दे। ऐसा होने पर वही कारोबारी रिश्ते पटरी से उतर सकते हैं, जिन्हें वाशिंगटन और गहरा करना चाहता है। वार्ता का उद्देश्य परस्पर लाभ पर आधारित सहमति होना चाहिए। उसकी सफलता इस बात से नहीं तय हो सकती कि भारत ने कितनी रियायतें दी हैं।
रूसी कच्चे तेल की भारत द्वारा की जा रही खरीद उसकी 'रणनीतिक स्वायत्तता' की एक बड़ी परीक्षा है। बीते दिनों अमेरिका ने रूसी ऊर्जा उत्पाद खरीदने वाले देशों को आर्थिक रूप से दंडित करने के लिए एक कानून भी बनाया। इन देशों को 18 अक्टूबर तक तय करना होगा कि वे आगे क्या रुख अपनाएंगे? इसकी अवधि समाप्त होने के दौरान ही रूबियो भारत में होंगे।
भारत के लिए ऊर्जा की खरीद राष्ट्रीय सुरक्षा, वाणिज्यिक व्यावहारिकता और घरेलू उपभोक्ताओं के हितों से ही तय होनी चाहिए।
खास तौर से तब और जब रूसी तेल आपूर्ति में विविधता लाने और आयात लागत घटाने में अहम भूमिका निभा रहा हो। भारत के पास ऐसा कोई कारण नहीं है कि वह किसी बाहरी ताकत को अपने ऊर्जा विकल्पों पर उसकी शर्तें थोपने की छूट देने जैसी कोई अनुचित परंपरा स्थापित होने दे। वहीं, अमेरिका द्वारा अपने घरेलू ईंधन संकट के बीच रूसी डीजल की खरीद की ओर कदम बढ़ाने की खबरों ने उसकी भू-राजनीतिक मांगों और राष्ट्रीय प्राथमिकताओं के दोहरे रवैये एवं अंतर्विरोधों को ही उजागर किया है।
जामनगर का पड़ाव रूबियो के दौरे को एक स्पष्ट रणनीतिक और वाणिज्यिक आयाम देता दिखता है। रिलायंस की जामनगर रिफाइनरी रोजाना 14 लाख बैरल तेल का परिशोधन करने में सक्षम है। वैश्विक पेट्रोलियम शोधन और तैयार रिफाइंड उत्पादों के निर्यात में यह एक प्रमुख केंद्र है। अलग-अलग गुणवत्ता वाले कच्चे तेल के परिशोधन की इसकी बेजोड़ क्षमता इसे ऊर्जा विविधीकरण के केंद्र में ले आती है। भारत की ऊर्जा सुरक्षा, वैश्विक तेल बाजार, निजी निवेश और अमेरिकी कारोबारी महत्वाकांक्षाएं आपस में जुड़ती हैं। मार्च 2026 में ट्रंप द्वारा टेक्सास के ब्राउन्सविले क्षेत्र में घोषित रिफाइनरी परियोजना से जुड़े निवेश और उत्पाद खरीद समझौते द्विपक्षीय वाणिज्यिक रिश्तों को और प्रगाढ़ कर सकते हैं।
देखा जाए तो अमेरिका में भारतीय निवेश भारत के बढ़ते आर्थिक दायरे और पहुंच का परिचायक है। इसमें अमेरिकी ऊर्जा प्राथमिकताओं के आगे झुकने की बाध्यता जैसा कोई पहलू नहीं। इसी तरह, अमेरिकी ऊर्जा आपूर्तिकर्ताओं को भी भारतीय बाजार में अपनी हिस्सेदारी सुरक्षित करने के लिए राजनीतिक दबाव पर निर्भर रहने के बजाय प्रतिस्पर्धी कीमतों और आपूर्ति की विश्वसनीयता को आधार बनाना होगा। याद रहे कि मजबूत वाणिज्यिक रिश्ते तभी टिकाऊ हो सकते हैं, जब वे भारत के रणनीतिक विकल्पों का दायरा बढ़ाएं, न कि उन्हें सीमित करें।
रूबियो का दौरा एक ऐसे समय पर हो रहा है, जहां द्विपक्षीय संबंधों से जुड़ी संभावनाएं भी हैं और अनिश्चितताएं भी। व्यापार वार्ताएं अभी किसी मुकाम पर नहीं पहुंची हैं, रूसी तेल पर प्रतिबंधों का मसला भी नाजुक मोड़ की तरफ बढ़ रहा है। दोनों देशों के समक्ष ऊर्जा निवेश और कारोबारी सहयोग को विस्तार देने के ठोस कारण मौजूद हैं। रूबियो का दौरा आगे बढ़ने की राह में कुछ व्यावहारिक रास्ता तो निकाल सकता है, लेकिन इससे दोनों देशों की रणनीतिक प्राथमिकताओं में मौजूद बुनियादी अंतर्विरोध शायद ही मिट पाएं।
भारत अमेरिका के साथ मिलकर काम करने को तैयार तो है, लेकिन अपनी विदेश नीति के मूलभूत सिद्धांतों की कीमत पर नहीं। वाशिंगटन इस पहलू को जितनी जल्दी समझ ले तो सार्थक द्विपक्षीय सहयोग की संभावनाएं उतनी ही बलवती होंगी। इसकी अनदेखी रणनीतिक अवसरों की राह में निरंतर अवरोध पैदा करती रहेगी। भारत-अमेरिका रिश्ते का भविष्य इस बात से तय नहीं होगा कि भारत वाशिंगटन की उम्मीदों के मुताबिक खुद को कितना ढालता है, बल्कि इससे तय होगा कि अमेरिका एक उभरते हुए भारत के साथ ऐसी शर्तों पर संवाद एवं सहयोग स्थापित करने में कितना सफल होता है, जो नई दिल्ली के स्वाभिमान और हितों के अनुकूल हों।
(लेखक ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन में उपाध्यक्ष हैं)




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