फ्रांस जैसा दोस्त न दूजा, पश्चिमी दबाव के बावजूद भारत के प्रति सहयोग जारी
भारत जहां अतीत में गुटनिरपेक्षता की रणनीति अपनाता था लेकिन अब ‘बहुपक्षीयता’ की राह पर चल रहा है और स्वयं को अमेरिका और चीन से पृथक रखकर स्वतंत्र ‘अग्रणी शक्ति’ बनना चाहता है। स्पष्ट है कि भारत और फ्रांस के वैश्विक दृष्टिकोण में काफी समानता है। यह समानता केवल विचार या दृष्टिकोण तक सीमित नहीं है। पेरिस और नई दिल्ली ने प्रभावी एवं व्यावहारिक सामरिक साझेदारी विकसित की है।
श्रीराम चौलिया। भारत के पचहत्तरवें गणतंत्र दिवस पर फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों के मुख्य अतिथि बनने से एक नया कीर्तिमान स्थापित हुआ है। वह यह कि फ्रांस ने भारत के गणतंत्र दिवस की शोभा बढ़ाने के लिए सर्वाधिक छह बार अपने नेताओं को भेजकर ब्रिटेन और रूस को पछाड़ दिया है और यह सिद्ध किया कि हमारे मित्र राष्ट्रों की गणना में वह ऊंचे पायदान पर विराजमान है। भारत का फ्रांस के प्रति अटूट विश्वास और समानुभूति दोनों देशों के ‘सामरिक स्वायत्तता’ वाले दृष्टिकोण पर आधारित है।
वैसे तो फ्रांस विकसित पश्चिमी लोकतांत्रिक देशों की श्रेणी में आता है, लेकिन उसके दिग्गज प्रणेता और ‘पांचवें गणतंत्र’ के संस्थापक चार्ल्स डी गाल के समय से उसने स्वयं को अमेरिका के अधीन नहीं माना। शीतयुद्ध के समय फ्रांस ने अमेरिका की अवज्ञा करते हुए साम्यवादी चीन और सोवियत संघ के साथ रिश्ते बनाए और अमेरिका-संचालित नाटो गठबंधन की कमान से अपनी सेना और परमाणु शस्त्रागार को अलग रखा।
डी गाल चाहते थे कि फ्रांस यूरोपीय एकता को मजबूत कर स्वतंत्र ‘तीसरे स्तंभ’ के रूप में उभरे, जो अमेरिका और सोवियत संघ की बराबरी कर सके। इस अवधारणा के तहत फ्रांस वर्तमान की दो महाशक्तियों अमेरिका और चीन से दूरी बनाकर यूरोपीय संघ को तीसरे विकल्प के रूप में प्रस्तुत करने का प्रयास कर रहा है।
भारत जहां अतीत में गुटनिरपेक्षता की रणनीति अपनाता था, लेकिन अब ‘बहुपक्षीयता’ की राह पर चल रहा है और स्वयं को अमेरिका और चीन से पृथक रखकर स्वतंत्र ‘अग्रणी शक्ति’ बनना चाहता है। स्पष्ट है कि भारत और फ्रांस के वैश्विक दृष्टिकोण में काफी समानता है। यह समानता केवल विचार या दृष्टिकोण तक सीमित नहीं है। पेरिस और नई दिल्ली ने प्रभावी एवं व्यावहारिक सामरिक साझेदारी विकसित की है।
चाहे आधुनिक हथियार हों, परमाणु ईंधन हो या उन्नत तकनीक, फ्रांस ने बेझिझक दशकों से भारत की अहम जरूरतों की पूर्ति की है। इतिहास में अनेक उदाहरण हैं जब फ्रांस ने अमेरिका के दबाव और प्रतिबंधों की अवहेलना करते हुए भी भारत को आवश्यक सैन्य एवं परमाणु सामग्री मुहैया कराई। 1998 में जब भारत ने परमाणु परीक्षण किए और उसके जवाब में पश्चिमी देशों ने हमारे अंतराष्ट्रीय बहिष्कार का अभियान चलाया, तब केवल फ्रांस ही इकलौती महाशक्ति थी, जिसने भारत को अलग-थलग करने के प्रयासों का समर्थन नहीं किया।
उलटे भारत के साथ सामरिक साझेदारी को बढ़ावा दिया और उसकी प्रगति में कोई अड़चन नहीं आने दी। भारत जैसे स्वाभिमानी देश को जब भी चीन और पाकिस्तान से निपटने के लिए मदद की जरूरत पड़ी तो फ्रांस सदैव तत्पर रहा। इसके विपरीत अमेरिका, ब्रिटेन और अन्य पश्चिमी देश अक्सर ‘संतुलन’ बनाए रखने का दोहरा खेल खेलते रहे। ऐसा करके वे एक तरह से भारत के हितों की अनदेखी ही करते रहे।
वर्ष 2020 में गलवन में चीन के साथ मुठभेड़ के बाद फ्रांस ने राफेल विमानों की आपूर्ति की प्रक्रिया को तेज किया। इससे चीन के आक्रामक इरादों पर अंकुश लगाने में मदद मिली। फ्रांस के विमानों और पनडुब्बियों से भारतीय वायुसेना और नौसेना की मारक एवं रक्षात्मक क्षमताओं में वृद्धि हुई है। रूस के बाद फ्रांस अब भारत का दूसरा सबसे बड़ा सैन्य आपूर्तिकर्ता बन गया है।
रक्षा क्षेत्र में खरीदार-विक्रेता संबंधों से हटकर सह-उत्पादन की ओर बढ़ने का जो लक्ष्य भारत ने रखा है, उसे फ्रांस समझता है। इसी कड़ी में ‘होराइजन 2047’ के अंतर्गत दोनों देशों ने ‘एक साथ संप्रभु रक्षा क्षमताओं का निर्माण’ करने का संकल्प लिया है। अगर अमेरिका जेट इंजन के संयुक्त उत्पादन में 80 प्रतिशत प्रौद्योगिकी हस्तांतरण पर सहमत है तो फ्रांस इस मामले में शत-प्रतिशत हस्तांतरण की पेशकश कर रहा है। इस समय पश्चिमी प्रतिबंधों से जूझ रहे रूस पर अपनी सामरिक निर्भरता घटाने के लिए और रक्षा क्षेत्र में विविधीकरण हेतु फ्रांस हमारा अत्यंत विश्वसनीय मित्र है।
भू-राजनीति में भी फ्रांस भारत का घनिष्ठ मित्र है। हिंद महासागर में फ्रांस को अनदेखा नहीं किया जा सकता। वहां उसके सैन्य अड्डे और कुछ क्षेत्रों पर नियंत्रण है, जिनमें भारतीय सेना को प्रवेश और उपयोग के अधिकार प्राप्त हुए हैं। 2023 में ‘भारत-फ्रांस इंडो-पैसिफिक रोडमैप’ की घोषणा हुई, जिसके अंतर्गत फ्रांस भारत को हिंद-प्रशांत के हर कोने में अपने इलाकों तक पहुंच और सैन्य सुविधाओं को उपलब्ध करा सकता है।
भारत को अग्रणी शक्ति बनने के लिए अपने रणनीतिक दायरे का विस्तार करना होगा और इस अभियान में फ्रांस प्रमुख माध्यम बना हुआ है। हिंद-प्रशांत के पश्चिमी छोर पर भारत ने फ्रांस और सयुक्त अरब अमीरात के साथ त्रिकोणीय सामरिक समीकरण बनाए हैं तो पूर्वी छोर पर आस्ट्रेलिया के साथ वैसा ही एक और त्रिकोणीय गठन किया है। इन विस्तारित रिश्तों से फ्रांस चाहता है कि उसके सामुद्रिक इलाकों में चीन का मंडराता खतरा दूर हो। भारत भी चीन के साथ अपनी प्रतिस्पर्धा में फ्रांस को एक मूल्यवान सहयोगी समझता है।
भारत-फ्रांस सामरिक साझेदारी में सिर्फ एक ही गड़बड़ है और वह यह कि फ्रांस एवं यूरोप की चीन के प्रति सामरिक अस्पष्टता। फ्रांस भले ही हिंद-प्रशांत में भारत और अन्य साझेदारों के साथ कंधे से कंधा मिलकर खड़ा हो, लेकिन हम इसकी अनदेखी नहीं कर सकते कि चीन फ्रांस का अव्वल व्यापारिक भागीदार है। मैक्रों का कहना है कि यूरोप को ताइवान जैसे विवादों में अमेरिका से दूरी बनाए रखनी चाहिए और चीन को उकसाने से परहेज करना चाहिए।
सामरिक स्वायत्तता फ्रांस की ताकत तो है, लेकिन अगर उसके नाम पर फ्रांस और अन्य यूरोपीय देश चीन का भरपूर भू-राजनीतिक प्रतिकार करने से कतराएंगे तो इससे चीन को ही फायदा मिलेगा। भारत-फ्रांस द्विपक्षीय साझेदारी को बहुपक्षीय क्वाड समूह के संग आपसी तालमेल बनाए रखना अत्यावश्यक है। संतोष की बात यह है कि आस्ट्रेलिया और अमेरिका के साथ फ्रांस का कुछ वर्षों पूर्व जो तनाव भड़का था, वह अब शांत हो गया है। यदि भारत और फ्रांस ‘सबका साथ’ वाले महामंत्र का अनुसरण करेंगे तो दोनों देशों की बेमिसाल दोस्ती और अधिक प्रभावशाली बनेगी।
(स्तंभकार शीघ्र प्रकाशित होने जा रही पुस्तक ‘फ्रेंड्स:इंडियाज क्लोजेस्ट स्ट्रैटेजिक पार्टनर्स’ के लेखक हैं)
कमेंट्स
सभी कमेंट्स (0)
बातचीत में शामिल हों
कृपया धैर्य रखें।