जापान के बाद चीन पहुंच रहे भारतीय प्रधानमंत्री पर भारत के साथ-साथ विश्व की भी निगाहें होंगी, क्योंकि एक तो वह सात वर्षों बाद वहां जा रहे हैं और दूसरे ऐसे समय जा रहे हैं, जब अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप की मनमानी टैरिफ नीति से विश्व परेशान है। यद्यपि प्रधानमंत्री मोदी शंघाई सहयोग संगठन (एससीओ) के शिखर सम्मेलन में शामिल होने जा रहे हैं, लेकिन वहां उनकी मुलाकात चीनी राष्ट्रपति शी चिनफिंग से भी होगी और यह स्वाभाविक ही है कि इस दौरान दोनों देशों के संबंधों पर भी बातचीत होगी। यह होनी भी चाहिए, क्योंकि दोनों देशों के बीच कुछ मुद्दे अनसुलझे हुए हैं और उनके कारण संबंधों में अविश्वास एवं खिंचाव है।

देखना यह है कि भारतीय प्रधानमंत्री और चीनी राष्ट्रपति के बीच की मुलाकात दोनों देशों के संबंधों में भरोसा और सहयोग कायम करने में सहायक बनती है या नहीं? जो भी हो, भारत को अपने हितों की पूर्ति के लिए चीन से सुधरते संबंधों का अधिकतम उपयोग करना चाहिए और एससीओ के साथ-साथ ब्रिक्स जैसे मंचों को भी अपने पक्ष में भुनाना चाहिए।

यह इसलिए आवश्यक है, क्योंकि अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने भारत को निशाने पर ले रखा है। वैसे तो चीन भी उनके निशाने पर है, लेकिन भारत के खिलाफ उनकी निगाह कुछ ज्यादा ही टेढ़ी है। यह मानने के अच्छे-भले कारण हैं कि ट्रंप की बेतुकी टैरिफ नीति के कारण ही चीन ने भारत से संबंध सुधारना बेहतर समझा। समय की मांग को देखते हुए भारत ने भी ऐसा ही करना उचित समझा।

भारत के लिए तेज गति से विकास अनिवार्य है। भारत की सर्वोच्च प्राथमिकता तीव्र विकास और जितनी जल्दी संभव हो, चीन के बराबर खड़ा होने की कोशिश होनी चाहिए। इससे ही देश वास्तविक महाशक्ति बनेगा। चूंकि चीन के साथ दशकों से अनसुलझे मुद्दे रातों-रात नहीं हल होने वाले, इसलिए भारत की कोशिश यही होनी चाहिए कि वह तेज विकास और विशेष रूप से मैन्यूफैक्चरिंग में समर्थ बनने में चीन से सीख ले।

भारत इसकी अनदेखी नहीं कर सकता कि तेज आर्थिक विकास के मामले में चीन उससे कहीं आगे है। वह दुनिया का कारखाना तो बना ही हुआ है, आधुनिक तकनीक के मामले में भी अपनी छाप छोड़ रहा है। कुछ मामलों में तो वह अमेरिका को भी चुनौती दे रहा है। इसी कारण अमेरिकी राष्ट्रपति टैरिफ मामले में चीन के प्रति अपेक्षाकृत नरमी दिखाने को विवश हैं। यह ठीक है कि चीन अधिनायकवादी व्यवस्था वाला देश है, लेकिन विकास के मामले में भारत उसके कुछ तौर-तरीकों को तो अपना ही सकता है। अपने द्रुत आर्थिक विकास के लिए भारत को चीन ही नहीं, विश्व के अन्य देशों के श्रेष्ठ उदाहरणों का अनुकरण करने में संकोच नहीं करना चाहिए।