बढ़ती कंक्रीट की सतह घटा रही भूजल, बारिश का 70 फीसदी पानी हो जा रहा है बर्बाद

दिल्ली के कई इलाकों में जलसंकट की स्थिति बनी हुई है। केंद्रीय भूजल आयोग (सीजीडब्ल्यूबी) की ताजा रिपोर्ट के मुताबिक दिल्ली में उपलब्ध भूगर्भ जल का भी ल...और पढ़ें
विवेक तिवारी जागरण न्यू मीडिया में एसोसिएट एडिटर हैं। लगभग दो दशक के करियर में इन्होंने कई प्रतिष्ठित संस्थानों में कार् ...और जानिए
नई दिल्ली, विवेक तिवारी। दिल्ली के कई इलाकों में जलसंकट की स्थिति बनी हुई है। केंद्रीय भूजल आयोग (सीजीडब्ल्यूबी) की ताजा रिपोर्ट के मुताबिक दिल्ली में उपलब्ध भूगर्भ जल का भी लगभग पूरी तरह से दोहन हो चुका है। 2023 में 0.38 बिलियन क्यूबिक मीटर ग्राउंड वाटर रीचार्ज हुआ। इनमें से 0.34 बिलियन क्यूबिक मीटर पानी निकाला जा चुका है। ऐसे में स्थितियां और गंभीर हो गई हैं। सीजीडब्ल्यूबी के मुताबिक दिल्ली हर साल औसतन लगभग 0.2 मीटर भूजल खो रही है। इस लिहाज से हर दिन दिल्ली की जमीन के नीचे का पानी 0.05 सेंटीमीटर नीचे जा रहा है। रिपोर्ट बताती है कि यहां के करीब 80 फीसदी स्त्रोत क्रिटिकल या सेमी क्रिटिकल स्थिति में आ चुके हैं। वहीं वैज्ञानिकों ने एक अध्ययन में पाया है कि दिल्ली -एनसीआर में बढ़ती कंकरीट की सतह के चलते ज्यादातर बारिश का पानी बह जाता है जिससे जमीन में पानी रीचार्ज नहीं हो पाता है। TERI की ओर से किए गए एक अध्ययन के मुताबिक दिल्ली में बढ़ती कंक्रीट की सतह के चलते ग्राउंड वाटर रीचार्ज तेजी से घटेगा। 2031 तक बारिश का 70 फीसदी से ज्यादा ज्यादा पानी बह कर नालों के जरिए नदियों में चला जाएगा।
ये अध्ययन यमुना रिवर बेसिन के तहत दिल्ली को चार हिस्सों अलीपुर, नजफगढ़, मेहरौली और ट्रांस यमुना में बांटकर किया गया है। अलीपुर के तहत लगभग 519.11 वर्ग किलोमीटर, नजफगढ़ के तहत 482.69 वर्ग किलोमीटर, मेहरौली को 373.12 वर्ग किलोमीटर और ट्रांस यमुना के 127.39 वर्ग किलोमीटर एरिया को शामिल किया गया है। इस अध्ययन के लिए कैलिब्रेटेड मॉडल का इस्तेमाल किया गया है। अध्ययन में मुख्य रूप से बढ़ती कंकरीट की सतह और ग्राउंड वाटर रीचार्ज को लेकर अध्ययन किया गया है। अध्ययन में शामिल टेरी के वैज्ञानिक चंदर कुमार सिंह कहते हैं कि तेजी से बढ़ते शहरीकरण और बढ़ती कंक्रीट की सतह का असर सीधे तौर पर ग्राउंड वाटर रीचार्ज पर पड़ा है। अध्ययन में पाया गया कि 2005 से 2016 के बीच सबसे ज्यादा शहरीकरण ट्रांस यमुना वाले इलाके में हुआ है। इसके चलते अब हर साल लगभग 65.69 फीसदी बारिश का पानी जमीन में जाने की बजाय नालों के जरिए नदी में बह जाता है। इसी तरह महरौली इलाके में लगभग 49.39 फीसदी बारिश का पानी नालों में बह जाता है। ग्राउंड वाटर के रीचार्ज न होने से आने वाले समय में दिल्ली को गंभीर पानी के संकट से जूझना पड़ सकता है। अध्ययन के मुताबिक 2016 से 2031 के दौरान के बीच ट्रांस-यमुना इलाके में बढ़ती कंक्रीट की सहत के चलते भूगर्भ जल के स्तर में और गिरावट आएगी। इस इलाके में वर्तमान स्थिति की तुलना में 36.25 फीसदी तक ज्यादा बारिश का पानी नालों में जाने का अनुमान है। इसी तरह अलीपुर इलाके में 19.41 फीसदी और नजफगढ़ इलाके में 7.93 फीसदी तक ज्यादा बारिश का पानी नालों में बह जाएगा।
पर्यावरणविद और सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट (सीएसई) की महानिदेशक सुनीता नारायण कहती हैं कि हमारे शहर रहने लायक तभी बने रहेंगे जब शहर में रहने वाले गरीब से गरीब व्यक्ति के लिए भी साफ पेय जल की उपलब्धता हो। पानी की बचत के लिए शहरों के सीवर में बह जाने वाले पानी के प्रबंधन पर भी विचार करना होगा। इसके लिए जल इंजीनियरों को जमीन पर उतरना होगा, फिर से काम करना होगा और फिर से सोचना होगा। यह आज जो दिल्ली और बेंगलुरु की कहानी है, ये कल किसी भी शहर की कहानी हो सकती है।
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