विचार: चुनौती का सामना करें भारतीय उद्योग, यूरोपीय संघ और भारत के बीच व्यापार समझौता बहुत महत्वपूर्ण
यूरोपीय संघ के साथ हुए व्यापार समझौते और अमेरिका के साथ होने वाले इसी तरह के समझौते के बाद भारत सरकार के साथ भारतीय कारोबारियों को इस पर विशेष ध्यान देना होगा कि इन समझौतों का अधिक से अधिक लाभ कैसे उठाया जाए। चूंकि यूरोप के देशों ने हर मामले में अपने मानक ऊंचे कर रखे हैं, इसलिए भारतीय कारोबारियों को इस पर गौर करना होगा कि उनके उत्पाद और उनकी सेवाएं वहां के मानकों पर खरी उतर सकें।
HighLights
भारत-यूरोपीय संघ के बीच ऐतिहासिक व्यापार समझौता हुआ
अमेरिका ने भारत से टैरिफ घटाकर व्यापार समझौता किया
भारतीय उद्योगों को उत्पाद गुणवत्ता सुधारने की चुनौती
संजय गुप्त। इस वर्ष गणतंत्र दिवस पर यूरोपीय संघ की अध्यक्ष उर्सुला वान और यूरोपीय परिषद के अध्यक्ष एंटोनियो कोस्टा की दिल्ली में उपस्थिति केवल भारत और यूरोप के बीच के मधुर होते संबंधों को ही नहीं बयान कर रही थी, बल्कि इन संबंधों को आगे बढ़ाने की पहल को भी रेखांकित कर रही थी। अंततः गणतंत्र दिवस के अगले दिन यूरोपीय संघ और भारत के बीच वह व्यापार समझौता हो गया, जिसकी व्यापक चर्चा हो रही थी और जिसे सभी व्यापार समझौतों की जननी कहा जा रहा था।
इस समझौते ने दुनिया भर का ध्यान आकर्षित किया। प्रारंभ में अमेरिका की प्रतिक्रिया बहुत उत्साहजनक नहीं थी, लेकिन जल्द ही अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भी भारत के साथ व्यापार समझौते पर सहमति बन जाने की घोषणा की। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि अमेरिका भारत पर लगाए गए 50 प्रतिशत टैरिफ को 18 प्रतिशत करने जा रहा है।
उनकी इस घोषणा का भारतीय प्रधानमंत्री ने भी स्वागत किया। चूंकि गत दिवस इस समझौते की रूपरेखा सामने आ गई, इसलिए माना जा रहा है कि अगले माह इस पर हस्ताक्षर हो जाएंगे। यूरोपीय यूनियन की तरह अमेरिका से होने वाला व्यापार समझौता इसलिए विशेष है, क्योंकि इसे लेकर असमंजस था कि दोनों देशों के बीच व्यापार समझौता हो पाएगा या नहीं?
भारत-यूरोपीय संघ के बीच व्यापार समझौता इसलिए हो सका, क्योंकि एक ओर जहां भारत अमेरिकी राष्ट्रपति के रवैये से चिंतित था, वहीं दूसरी ओर यूरोप के देश भी। इस समझौते का एक कारण यह भी रहा कि पिछले कुछ समय में भारत ने यूरोप के प्रमुख देशों फ्रांस और जर्मनी के साथ अपने रिश्ते प्रगाढ़ किए हैं।
इसके अलावा हाल के समय में भारत ने ब्रिटेन, न्यूजीलैंड, ओमान और यूएई के साथ भी व्यापार समझौते किए हैं। कुछ अन्य देशों से भी भारत की व्यापार समझौते संबंधी वार्ताएं अंतिम चरण में हैं। इन देशों में कनाडा भी है, जिसके इन दिनों अमेरिका से रिश्ते खराब चल रहे हैं। यूरोप को व्यापार के मामले में भारत का साथ लेना इसलिए आवश्यक महसूस हो रहा था, क्योंकि यहां के देश कई आर्थिक चुनौतियों का सामना कर रहे हैं।
वैसे तो यूरोपीय देश संपन्न हैं, लेकिन उनके यहां छोटी-मोटी चीजों का उत्पादन बंद सा हो गया है और वे हाईटेक उत्पादों और सेवाओं पर ही अधिक केंद्रित हैं। यूरोपीय देश अप्रवासियों के आगमन के चलते सामाजिक उथल-पुथल का भी सामना कर रहे हैं। वहां के कई देशों में अप्रवासियों के खिलाफ मुहिम चल रही है। यूरोप भले ही दो दर्जन से अधिक देशों की एक इकाई हो, पर वहां के कुछ देश अत्यधिक विकसित हैं तो कुछ विकासशील देशों की श्रेणी में आते हैं। ऐसे विकासशील देश भारत से व्यापार को अपने लिए और लाभप्रद मान रहे हैं।
जिस तरह भारत और यूरोपीय संघ के बीच व्यापार समझौते ने सुर्खियां बटोरीं, उसी तरह भारत और अमेरिका के बीच होने वाले व्यापार समझौते को लेकर भी दुनिया भर में चर्चा हो रही है। समझौते पर दोनों देशों के साझा बयान ने चर्चा को और तेज कर दिया है। भारत अमेरिका के साथ यथाशीघ्र व्यापार समझौते के लिए इसलिए प्रयत्नशील था, क्योंकि अमेरिकी राष्ट्रपति की ओर से 50 प्रतिशत टैरिफ लगाए जाने के बाद भारतीय निर्यातक मुश्किल में थे। यह व्यापार समझौता ट्रंप के रवैये के कारण ही अटका हुआ था।
वे इससे खफा थे कि भारत उनके न चाहने के बाद भी रूस से तेल खरीद रहा है। हालांकि पिछले कुछ समय में भारत ने रूस से तेल खरीद में कटौती की थी, लेकिन ट्रंप किसी तरह की नरमी नहीं दिखा रहे थे। पिछले दिनों उन्होंने जब वेनेजुएला पर हमला कर वहां के राष्ट्रपति का अपहरण कर लिया और वहां अपनी कठपुतली सरकार स्थापित कर दी तो स्थितियां तेजी से बदलीं। वेनेजुएला में सत्ता परिवर्तन के बाद ट्रंप ने यह घोषणा की कि अब उसके तेल की बिक्री उनके हिसाब से होगी।
इस घोषणा के कुछ दिनों बाद भारतीय प्रधानमंत्री और वेनेजुएला की राष्ट्रपति के बीच वार्ता भी हुई। इसी वार्ता के चंद दिन बाद ट्रंप ने भारत से व्यापार समझौते पर सहमति बन जाने के साथ यह भी घोषणा की कि अब भारत वेनेजुएला से तेल खरीदेगा और रूस से तेल खरीद बंद करेगा। चूंकि भारत पहले भी वेनेजुएला से तेल खरीदता था, इसलिए यदि वह फिर से उससे तेल खरीद शुरू कर देता है तो इसमें कोई नई-अनोखी बात नहीं, लेकिन देखना यह है कि क्या वह रूस से पूरी तौर पर तेल खरीदना बंद करेगा?
यूरोपीय संघ के साथ हुए व्यापार समझौते और अमेरिका के साथ होने वाले इसी तरह के समझौते के बाद भारत सरकार के साथ भारतीय कारोबारियों को इस पर विशेष ध्यान देना होगा कि इन समझौतों का अधिक से अधिक लाभ कैसे उठाया जाए। चूंकि यूरोप के देशों ने हर मामले में अपने मानक ऊंचे कर रखे हैं, इसलिए भारतीय कारोबारियों को इस पर गौर करना होगा कि उनके उत्पाद और उनकी सेवाएं वहां के मानकों पर खरी उतर सकें।
वे इसकी अनदेखी नहीं कर सकते कि चाहे खाद्य पदार्थ हों या कपड़े अथवा अन्य उत्पाद, उनकी मांग यूरोप-अमेरिका में तभी बढ़ेगी, जब उनकी गुणवत्ता उच्च स्तर की होगी। स्पष्ट है कि विकसित देशों में अपना उत्पाद बेचने के इच्छुक भारतीय उद्योगों को अपने उत्पादों की गुणवत्ता सुधारने पर अतिरिक्त ध्यान देना होगा। माना जा रहा है कि यूरोपीय संघ के साथ व्यापार समझौते पर अमल के बाद भारत से बड़ी मात्रा में गारमेंट्स, एनिमल हसबेंडरी, फिशरीज, मीट आदि का निर्यात बढ़ सकता है।
संभवतः इसी को ध्यान में रखकर बजट में गारमेंट्स, एनिमल हसबेंडरी, फिशरीज और मीट प्रोसेसिंग सेक्टर को बढ़ावा देने के लिए कई महत्वपूर्ण प्रविधान किए गए हैं। इन प्रविधानों का मुख्य उद्देश्य निर्यात बढ़ाने के साथ रोजगार सृजन करना भी है। ऐसा वास्तव में हो, यह सुनिशिचित करना होगा और यह तब होगा, जब हमारे उद्योग शोध एवं विकास पर ध्यान देंगे।
इससे ही उनके उत्पादों की गुणवत्ता बढ़ेगी और यूरोप के साथ अमेरिका में उनकी खपत भी बढ़ेगी। भारत अगर निर्यात में अपना सही मुकाम हासिल नहीं कर पा रहा है तो इसका कारण यही है कि गुणवत्ता के प्रति भारतीय उद्योगों का रवैया ढीला-ढाला है। इस रवैये में सुधार आवश्यक ही नहीं, अनिवार्य है।
[लेखक दैनिक जागरण के प्रधान संपादक हैं]













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