राजीव शुक्ला। सुबह की पहली किरण के साथ जब हम अपने स्मार्टफोन का स्क्रीन अनलॉक करते हैं, तो हम केवल एक उपकरण नहीं खोलते, बल्कि एक ऐसी दुनिया में प्रवेश करते हैं, जो कभी सोती नहीं है। यह डिजिटल दुनिया जितनी चमकदार है, उतनी ही बेरहम भी। आज हमारे जीवन का एक बड़ा हिस्सा डिजिटल मीडिया के गलियारों में बीत रहा है।

हमारी पहचान, रिश्ते और समाज में प्रतिष्ठा अब हमारे पदचिह्नों यानी डिजिटल फुटप्रिंट्स से तय होती है, पर समस्या तब शुरू होती है जब ये पदचिह्न हमारी वर्तमान पहचान के लिए बोझ बन जाते हैं। कल्पना कीजिए एक ऐसे युवक की, जिस पर दस साल पहले एक छोटा आरोप लगा था। अदालत ने उसे ससम्मान बरी कर दिया, लेकिन आज जब कोई कंपनी उसे नौकरी देने के लिए उसका नाम गूगल करती है, तो सबसे ऊपर वही पुरानी गिरफ्तारी की खबर चमकती है। यही वह बिंदु है जहां राइट टू बी फॉरगाटेन यानी भुला दिए जाने का अधिकार विलासिता नहीं, बल्कि जीने के अधिकार का हिस्सा बन जाता है।

डिजिटल मीडिया का दुरुपयोग आज एक महामारी की तरह फैल चुका है। फेक न्यूज, ट्रोलिंग और साइबरबुलिंग ने वर्चुअल स्पेस को एक युद्ध का मैदान बना दिया है। सबसे भयावह रूप तब सामने आता है, जब किसी की निजी जानकारी या तस्वीरें उसकी मर्जी के बिना सार्वजनिक कर दी जाती हैं। इसे डॉक्सिंग कहा जाता है। यह केवल तकनीक का गलत इस्तेमाल नहीं है, बल्कि यह एक इंसान की गरिमा पर सीधा हमला है। जब कोई अपमानजनक सामग्री एक बार वायरल हो जाती है, तो उसे पूरी तरह मिटाना लगभग असंभव हो जाता है। डिजिटल दुनिया में कुछ भी स्थायी रूप से मरता नहीं है, वह बस दबा रहता है और समय-समय पर बाहर आता रहता है।

यहीं पर राइट टू बी फॉरगाटेन की अवधारणा उम्मीद की किरण है। व्यक्ति को यह अधिकार होना चाहिए कि वह अपने पुराने, अप्रासंगिक या गलत डिजिटल रिकॉर्ड्स को हटवा सके। यूरोपीय संघ का एक कानून इस मामले में एक मिसाल है। वहां के एक चर्चित मामले में यह तय हुआ कि अगर कोई जानकारी अब जरूरी नहीं है, तो उसे सर्च रिजल्ट्स से हटाना होगा। भारत में भी इस अधिकार की सुगबुगाहट तेज हुई है। सुप्रीम कोर्ट ने पुट्टास्वामी केस में निजता को मौलिक अधिकार तो माना, लेकिन राइट टू बी फॉरगाटेन अभी भी एक कानूनी धुंध में फंसा हुआ है। दिल्ली हाई कोर्ट ने हाल में माना कि एक व्यक्ति को अपनी पुरानी गलतियों या विवादों से आगे बढ़ने का हक है। क्या हमारे पास इसके लिए कोई ठोस कानून है?

भारत का डिजिटल व्यक्तिगत डाटा संरक्षण अधिनियम, 2023 इस दिशा में एक कदम जरूर है। यह डाटा मिटाने का अधिकार देता है, लेकिन इसमें कई पेच हैं। जब कोई व्यक्ति अपना डाटा हटवाने की मांग करता है, तो उसके सामने अभिव्यक्ति की आजादी और न्यायिक पारदर्शिता की दीवार खड़ी हो जाती है। मिसाल के तौर पर, क्या एक भ्रष्ट नेता यह कह सकता है कि लोग उसके पुराने घोटाले भूल जाएं, क्योंकि अब वह सुधर गया है? निश्चित रूप से नहीं। जनता को जानने का अधिकार और सार्वजनिक हित हमेशा निजी निजता से ऊपर रहेगा, लेकिन एक सामान्य नागरिक, जो किसी झूठे मुकदमे या निजी विवाद का शिकार हुआ है, उसे अदालतों के चक्कर क्यों काटने पड़ें? हमारे वर्तमान कानून में एक ऐसी स्पष्ट प्रक्रिया की कमी है, जो टेक कंपनियों को जवाबदेह ठहरा सके।

इस जटिल समीकरण में अब एआई ने प्रवेश किया है। एआई के दुरुपयोग का सबसे वीभत्स रूप डीपफेक है। आज किसी भी आम इंसान का चेहरा किसी अश्लील वीडियो या भड़काऊ भाषण के साथ जोड़ना बच्चों का खेल बन गया है। एआई एल्गोरिदम आज इतने शक्तिशाली हैं कि वे आपकी पसंद-नापसंद को भांप लेते हैं और आपको उसी दिशा में ले जाते हैं, जो वे चाहते हैं। नफरत भरे कंटेंट पर इंगेजमेंट ज्यादा आती है, इसलिए एल्गोरिदम उसे बढ़ावा देते हैं। यह एआई का वह चेहरा है, जो समाज को बांट रहा है। इसी एआई में समाधान भी छिपा है।

अगर हम एआई को सही नीयत के साथ इस्तेमाल करें, तो यह एक डिजिटल रक्षक बन सकता है। जिस रफ्तार से डिजिटल मीडिया पर डाटा अपलोड होता है, उसे इंसान कभी मॉनिटर नहीं कर सकते। यहां एआई एक फिल्टर की तरह काम कर सकता है। यह आपत्तिजनक कंटेंट, डीपफेक और फेक न्यूज को उसके फैलने से पहले ही पहचान कर ब्लाक कर सकता है। राइट टू बी फॉरगाटेन को लागू करने में एआइ मददगार साबित हो सकता है। जरूरत एक ऐसी नीति की है, जो टेक कंपनियों को बाध्य करे कि वे अपने एआई माडल्स को सुरक्षा और निजता के अनुकूल बनाएं।

भारत को राइट टू बी फॉरगाटेन के लिए एक सशक्त ढांचा तैयार करना होगा। यह केवल कागजी अधिकार न हो, एक ऐसी व्यवस्था हो, जहां एक क्लिक पर पीड़ित की सुनवाई हो। हमें विशेष डिजिटल ट्रिब्यूनल्स की जरूरत है जहां तकनीकी विशेषज्ञ और कानूनी जानकार मिलकर त्वरित फैसले लें। डाटा प्रोटेक्शन बोर्ड को इतनी शक्ति मिलनी चाहिए कि वह उन प्लेटफॉर्म्स पर भारी जुर्माना लगा सके, जो आदेश मिलने के बाद भी डाटा नहीं हटाते। कानून में स्पष्ट करना होगा कि किन परिस्थितियों में डाटा हटाया जा सकता है और कहां सार्वजनिक हित सर्वोपरि होगा?

एक और महत्वपूर्ण सुधार यह होना चाहिए कि टेक कंपनियों के लिए ट्रांसपेरेंसी रिपोर्ट अनिवार्य हो, ताकि पता चले कि उन्होंने कितने अनुरोध स्वीकार किए और कितने खारिज। हमें एक ऐसी डिजिटल संस्कृति विकसित करनी होगी, जहां हम दूसरों की निजता का सम्मान करें। कानून अपना काम करेगा, एआई अपना सुधार करेगा, लेकिन हमें यह समझना होगा कि हर व्यक्ति को एक दूसरा मौका मिलने का हक है। डिजिटल युग में विस्मृति का अधिकार मानवीय गरिमा बचाने की कोशिश है। जब तक हम तकनीक और कानून को मानवीय संवेदनाओं के साथ नहीं जोड़ेंगे, तब तक हम इस डिजिटल पिंजरे में कैद रहेंगे।

(लेखक कांग्रेस के सांसद एवं पूर्व केंद्रीय मंत्री हैं)