क्षमा शर्मा। पिछले दिनों दिल्ली में महिलाओं पर किए गए एक सर्वे में बताया गया कि अब स्त्रियां 30 की उम्र के बाद ही संतान चाहती हैं। 2024 में किए गए एक अन्य सर्वे में पता चला था कि चार में से एक बच्चे को 30 से अधिक उम्र वाली महिला ने जन्म दिया। 30 से 35 वर्ष की माताओं की संख्या 2005 से 2024 तक 2.7 प्रतिशत से बढ़कर 8.9 प्रतिशत हो गई।

20 से 24 साल की उम्र में मां बनने वाली महिलाओं की संख्या 2024 में घटकर 27.1 प्रतिशत रह गई। लंबे समय तक माना जाता रहा है कि महिलाओं की मां बनने की उम्र 30 के बाद ठीक नहीं होती, लेकिन अब वक्त बदल गया है। स्त्रियां अब पढ़ना चाहती हैं। नौकरी करना चाहती हैं। तरक्की के लिए नौकरियां बदलती भी रहती हैं। अपने स्वास्थ्य के ऊपर भी उनका ध्यान बढ़ा है। विवाह उनकी प्राथमिकता में नहीं रहा। यदि विवाह करती भी हैं, तो देर से।

एक जमाने में यदि किसी लड़की की उम्र 30 के पार पहुंच जाती थी, तो मान लिया जाता था कि अब उसका विवाह नहीं होगा या कैसे होगा, क्योंकि इस उम्र तक तो लड़के ही कुंवारे नहीं बैठे रहते, लेकिन अब प्राय: लड़के-लड़कियों के विवाह 30 के बाद की उम्र में हो रहे हैं। इसका एक बड़ा कारण बढ़ता शहरीकरण भी है। फिर विवाह के बाद ये लोग एकदम से बच्चे नहीं चाहते। पहले एक नई जीवनशैली में रचना-बसना चाहते हैं, फिर बच्चों के बारे में सोचते हैं।

इन दिनों मध्यवर्ग में एक बच्चे का चलन भी बढ़ा है। इसका कारण यह कि इन दिनों बच्चे पालना महंगा है। यदि माता-पिता दोनों भी कमाते हैं, तो बताया जाता है कि एक बच्चे की देखभाल, शिक्षा-दीक्षा में ही एक वेतन खर्च हो जाता है। एक बच्चे के बारे में पुरानी अवधारणा थी कि वह अपने को बहुत अकेला महसूस करता है। उसे जीवनभर साथीपन की कमी सालती है। अब यह भी नहीं रहा कि बेटी है, तो बेटा जरूर चाहिए।

कुछ दिन पहले एक अखबार ने उन माता-पिता से बातचीत की थी, जिनके एक बेटा या एक बेटी है। उन अभिभावकों ने बताया था कि उनके एक बच्चे को कभी कोई समस्या नहीं हुई, बल्कि वे जीवन को जीना जल्दी सीख जाते हैं। अपना काम खुद करते हैं। अधिक अनुशासित होते हैं।

अपने देश में उस पीढ़ी को अधिक समय नहीं बीता है, जब घर में पांच-छह भाई-बहन होना मामूली बात थी। घर में आय का साधन एकमात्र कमाने वाले पिता होते थे। सरकारी स्कूलों में पढ़कर भी बच्चे ठीक-ठाक नौकरी पा जाते थे। उनके विवाह भी 30 से पहले हो जाते थे। उन दिनों नौकरी करने वाली स्त्री का मतलब किसी आपदा की मारी कोई स्त्री ही होती थी। स्त्री की पढ़ाई का मतलब उसकी नौकरी या आत्मनिर्भरता नहीं, बल्कि यह माना जाता था कि अगर कहीं दूर-देश ब्याह दी जाए, तो कम से कम चिट्ठी-पत्री लिखकर अपना हाल-चाल तो दे सके।

फिर एक ऐसा दौर भी आया जब देश में अल्ट्रासाउंड के जरिये गर्भ में ही लड़कियों को मारने वालों की बाढ़ आ गई। भ्रूण हत्या पर हालांकि सरकार ने रोक लगा रखी है, लेकिन अब भी यदा-कदा इसकी खबरें आती रहती हैं, लेकिन जैसे-जैसे लड़कियां पढ़ी-लिखीं, आगे बढ़ीं, उन्होंने अपने लिए बनाई गई छवियों को ध्वस्त कर दिया। 1975 में अंतरराष्ट्रीय महिला वर्ष मनाया गया, तब से अपने यहां स्त्रियों के मसले भी जोर-शोर से उठाए गए। उनकी शिक्षा और आत्मनिर्भरता पर अधिक जोर दिया गया। विवाह और बच्चे पहली प्राथमिकता से बहुत पीछे चले गए। आज किसी साधन-संपन्न लड़की से पूछें या किसी गरीब से, सब इस बात पर एकमत हैं कि पहले वे पढ़ना चाहती हैं, नौकरी करना चाहती हैं, उसके बाद ही शादी आदि के बारे में सोचेंगी।

अब हम दो-हमारे दो जैसे नारे कहीं सुनाई नहीं देते। स्त्रियों के नजरिये से देखा जाए, तो यह ठीक मालूम पड़ता है कि एक बच्चा हो, लेकिन विश्व स्तर पर जो बातें दिखाई दे रही हैं, हो सकता है कि भारत को भी 50 साल बाद यही भुगतना पड़े। एक समय में चीन की जनसंख्या दुनिया भर में सबसे ज्यादा थी। वहां की सरकार ने एक बच्चा नीति को सख्ती से लागू किया। अब उसी चीन की हालत क्या है। वहां लगातार युवाओं की कमी हो रही है और वृद्धों की संख्या बढ़ती जा रही है। इस कारण वहां की सरकार युवाओं को तरह-तरह के प्रलोभन दे रही है।

युवा डेटिंग पर जाएं, विवाह करें, बच्चे पैदा करें इसके लिए अधिक छुट्टियां और विशेष पैकेज दिए जा रहे हैं। मातृत्व अवकाश को बढ़ाया जा रहा है। पिताओं को भी छुट्टी दी जा रही है, मगर युवा विशेषकर स्त्रियां, बच्चे नहीं चाहतीं। वे सरकार के किसी प्रलोभन में नहीं फंस रहीं। यही हाल जापान का है। वहां भी कम बच्चे जन्म ले रहे हैं। यूरोप के बहुत से देशों में भी ऐसा है। रूस में सरकार ने घोषणा की थी कि जो स्त्री दस बच्चे पैदा करेगी, उसे मदर हीरोइन कहा जाएगा और दस लाख रूबल का पुरस्कार दिया जाएगा।

नेता कुछ भी कहते रहें, लोग उनकी बात नहीं मान रहे। खास तौर से स्त्रियां कह रही हैं कि वे कोई बच्चे पैदा करने की मशीन हैं! आखिर स्त्रियों के तमाम विमर्शों मे उन्हें इतना जागरूक तो कर ही दिया है कि वे बच्चों के जन्म और उनकी परवरिश के मुकाबले अपने सुख और खुशियों के बारे में पहले सोच रही हैं। विश्व और अपने देश में ऐसे दंपतियों की संख्या भी बढ़ रही है, जो बच्चे चाहते ही नहीं हैं।

(लेखिका साहित्यकार हैं)