संपादकीय: गड्ढों में गिरी व्यवस्था, मौतों के बाद भी नहीं चेत रहा प्रशासन
नोएडा और दिल्ली में खुले गड्ढों में गिरकर हुई मौतों ने प्रशासनिक लापरवाही को उजागर किया है। लेख बताता है कि ऐसी घटनाओं के बावजूद अधिकारी सबक नहीं सीख रहे, जिससे अनावश्यक मौतें हो रही हैं। बैरिकेडिंग और चेतावनी बोर्ड की कमी, साथ ही केवल निलंबन जैसी सतही कार्रवाई, व्यवस्था की विफलता को दर्शाती है। इसे दुर्घटना नहीं, बल्कि 'हत्यारी लापरवाही' बताया गया है, जहां जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही तय नहीं होती।
HighLights
नोएडा-दिल्ली में गड्ढों से मौतें, प्रशासनिक लापरवाही उजागर हुई।
खुले गड्ढों पर बैरिकेडिंग, चेतावनी बोर्ड का अभाव।
जिम्मेदार अधिकारियों पर कठोर कार्रवाई की कमी।
नोएडा में एक कार सवार इंजीनियर की गड्ढे में गिरने से मौत का मामला अभी शांत नहीं हुआ था कि दिल्ली में भी एक बाइक सवार युवक की गड्ढे में गिरकर मौत हो गई। यह गड्ढा दिल्ली जल बोर्ड की ओर से खोदा गया था। नोएडा की तरह दिल्ली के इस गड्ढे के पास भी न तो कोई बैरीकेडिंग थी और न ही किसी तरह का चेतावनी बोर्ड।
इसका मतलब है कि नोएडा की घटना के बाद भी उससे सटी दिल्ली में कोई सबक नहीं सीखा गया। दिल्ली की घटना पर नोएडा की तरह कुछ अधिकारियों को निलंबित कर दिया गया है और मामले की जांच के आदेश भी दे दिए गए हैं। कुछ भी किया जाए, काल के गाल में समा गए युवक की जिंदगी लौटने वाली नहीं। इस युवक की मौत को हादसा कहना घटना की गंभीरता को कम करना होगा। यह हादसा नहीं, एक हत्यारी लापरवाही है। नोएडा और दिल्ली जैसी घटनाएं अपवाद नहीं हैं।
अपने देश में ऐसी घटनाएं रह-रहकर घटती ही रहती हैं। लोग सड़क किनारे खोदे गए गड्ढों या फिर टूटी सड़कों में गिरकर मरते ही रहते हैं। बहुत सी जानलेवा घटनाएं इसलिए होती हैं कि जोखिम भरे स्थान अंधेरे में डूबे होते हैं और वहां लोगों को सावधान करने वाले कोई संकेत भी नहीं होते। जब देश की राजधानी और उससे लगे क्षेत्रों में यह हाल है, तब फिर दूर-दराज के शहरों में कितनी चौकसी बरती जाती होगी, इसका अनुमान सहज ही लगाया जा सकता है।
बड़े शहरों में तो व्यवस्था के नाकारापन और संवेदनहीनता से होने वाली मौतें फिर भी चर्चा में आ जाती हैं और दिखावटी ही सही, कोई कार्रवाई भी हो जाती है, लेकिन छोटे शहरों में किसी के कान पर जूं भी नहीं रेंगती। अपने यहां सड़क, बिजली, पानी उपलब्ध कराने और मार्ग प्रकाश, यातायात आदि की देखभाल करने वाली एजेंसियों की लापरवाही के कारण प्रति वर्ष न जाने कितने लोग जान गंवाते हैं।
आम तौर पर ऐसी मौतों को दुर्घटना करार दिया जाता है और जो लोग अपने स्वजन खोते हैं, वे उसे विधि का विधान मान लेते हैं, लेकिन सच यह है कि नोएडा और दिल्ली सरीखी जानलेवा घटनाएं इसलिए होती रहती हैं, क्योंकि लोगों की मौतों के लिए जवाबदेह कर्मचारी और अधिकारी कभी कठोर दंड के भागीदार नहीं बनते। वे अधिक से अधिक निलंबित होते हैं।
सब जानते हैं कि निलंबन कोई सजा नहीं होती और बर्खास्तगी जैसी कठोर कार्रवाई कठिनाई से ही होती है। जिम्मेदार विभागों पर भारी भरकम जुर्माना भी नहीं लगाया जाता। इसी कारण कोई चेतता नहीं। नतीजा यह है कि घटिया, बेतरतीब और समय खपाऊ निर्माण होता रहता है, जो प्रायः जोखिम को निमंत्रण देता है। यह शर्मनाक स्थिति केवल विकसित भारत के नारे को मुंह ही नहीं चिढ़ाती, बल्कि शासन-प्रशासन के गड्ढों में धंसे होने को भी बयान करती है।













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